

चंदगढ़ के बुजावडे गांव में वैज्ञानिकों ने केंचुए जैसी दिखने वाली नई उभयचर प्रजाति गेगेनेओफिस चंदगड़ी की खोज की।
नई प्रजाति की पहचान डीएनए जांच और शरीर की बनावट के आधार पर की गई, जिससे इसकी अलग पहचान साबित हुई।
यह दुर्लभ जीव घरों के पास लकड़ियों और गीली पत्तियों के नीचे मिला, जबकि स्थानीय लोग इसे पहले से जानते थे।
प्रजाति का नाम चंदगढ़ में बोली जाने वाली स्थानीय चंदगडी भाषा के सम्मान में रखा गया, जिससे स्थानीय संस्कृति जुड़ी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक उत्तरी पश्चिमी घाट में ऐसी कई अज्ञात प्रजातियां छिपी हो सकती हैं, जिनकी खोज अभी बाकी है।
महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में वैज्ञानिकों को एक ऐसे जीव की नई प्रजाति मिली है, जो देखने में केंचुए या छोटे सांप जैसा लगता है। लेकिन यह जीव वास्तव में एक उभयचर है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम गेगेनेओफिस चंदगाडी रखा है। यह खोज महाराष्ट्र के चंदगढ़ इलाके में हुई है, जो पश्चिमी घाट के उत्तरी हिस्से में आता है। यह शोध रिकार्ड्स ऑफ जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जीव जमीन के अंदर रहने वाले दुर्लभ उभयचरों के समूह से जुड़ा है। इन्हें केसिलियन कहा जाता है। इनके शरीर पर पैर नहीं होते और इनका शरीर लंबा तथा बेलनाकार होता है। इसी कारण आम लोगों को ये केंचुए या सांप जैसे दिखाई देते हैं।
घरों के पास मिट्टी में मिला जीव
नई प्रजाति की खोज अगस्त 2025 में किए गए वैज्ञानिक सर्वे के दौरान हुई। शोधकर्ताओं की टीम ने महाराष्ट्र के चंदगढ़ क्षेत्र के बुजवाडे गांव में कई जगहों की जांच की। यह गांव पश्चिमी घाट के जंगलों और ग्रामीण इलाकों से घिरा हुआ है।
वैज्ञानिकों को ये जीव लकड़ियों के ढेर और गीली पत्तियों के नीचे मिले। खास बात यह है कि इनका ठिकाना गांव के लोगों के घरों से ज्यादा दूर नहीं था। स्थानीय लोगों ने वैज्ञानिकों को बताया कि ऐसे जीव इस इलाके में अक्सर दिखाई देते हैं।
गांव के लोगों ने यह भी बताया कि घरेलू मुर्गियां जमीन खोदते समय इन जीवों को निकाल लेती हैं। मुर्गियां खास तौर पर छोटे और कम उम्र के जीवों को खा जाती हैं। इससे पता चलता है कि यह प्रजाति लंबे समय से इस इलाके में मौजूद है, लेकिन इसकी पहचान अब जाकर वैज्ञानिक रूप से हुई है।
डीएनए जांच से हुई नई प्रजाति की पुष्टि
वैज्ञानिकों ने केवल शरीर की बनावट देखकर इस जीव को नई प्रजाति नहीं माना। इसकी पुष्टि के लिए डीएनए की जांच भी की गई। शोधकर्ताओं ने नई प्रजाति के नमूनों के डीएनए की तुलना पहले से पहचानी जा चुकी दूसरी प्रजातियों से की।
इनमें गेजेनियोफिस महादेईएन्सिस जैसी प्रजातियां भी शामिल थीं। जांच में पता चला कि बुजवाडे में मिले जीवों का आनुवंशिक रूप दूसरी प्रजातियों से अलग है। इससे वैज्ञानिकों को भरोसा हुआ कि यह एक अलग और नई प्रजाति है।
शरीर की बनावट में भी इसके कुछ खास गुण हैं। इसका शरीर पतला और मांस के रंग जैसा है। इसके पूरे शरीर पर छल्ले जैसी रेखाएं होती हैं, जिन्हें वैज्ञानिक एन्युली कहते हैं। इस नई प्रजाति में मुख्य छल्ले पूरे शरीर पर पाए जाते हैं, जबकि दूसरी तरह के छल्ले शरीर के पिछले हिस्से तक ही सीमित रहते हैं। यही खास पहचान इसे आसपास के इलाकों में मिलने वाली दूसरी प्रजातियों से अलग करती है।
स्थानीय भाषा के नाम पर रखा गया नाम
वैज्ञानिकों ने इस नई प्रजाति का नाम स्थानीय संस्कृति से जोड़कर रखा है। चांदगाड़ी नाम चंदगढ़ इलाके में बोली जाने वाली ‘चंदगडी भाषा’ से लिया गया है। यह मराठी की एक स्थानीय बोली है। इस तरह इस जीव का वैज्ञानिक नाम उस क्षेत्र और वहां के लोगों की भाषा को भी सम्मान देता है।
पश्चिमी घाट में छिपी हैं कई और प्रजातियां
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज क्रिप्टिक डायवर्सिटी का अच्छा उदाहरण है। इसका मतलब है कि कई अलग-अलग प्रजातियां देखने में लगभग एक जैसी होती हैं। इसलिए उन्हें लंबे समय तक एक ही प्रजाति समझ लिया जाता है। डीएनए जांच के बाद पता चलता है कि वे वास्तव में अलग-अलग प्रजातियां हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, पश्चिमी घाट का उत्तरी क्षेत्र ऐसे छिपे हुए जीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां कम से कम चार और ऐसी अज्ञात वंश-रेखाएं हो सकती हैं, जिनकी अभी तक वैज्ञानिक पहचान नहीं हुई है।
फिलहाल ‘डेटा डेफिशिएंट’ की श्रेणी
नई प्रजाति के बारे में अभी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। वैज्ञानिकों को यह पता लगाना बाकी है कि इसकी कुल संख्या कितनी है, यह कितने बड़े क्षेत्र में पाई जाती है और इसके प्राकृतिक जीवन के बारे में और क्या जानकारी सामने आ सकती है।
इसी वजह से शोधकर्ताओं ने फिलहाल गेगेनेओफिस चंदगाडी को ‘डेटा डेफिशिएंट’ यानी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होने वाली श्रेणी में रखने की सलाह दी है। आने वाले समय में और सर्वे होने से इस अनोखे जीव की संख्या और इसके फैलाव के बारे में अधिक जानकारी मिल सकती है।
यह खोज एक बार फिर बताती है कि हमारे आसपास की मिट्टी और पत्तियों के नीचे भी प्रकृति के कई ऐसे रहस्य छिपे हो सकते हैं, जिनके बारे में विज्ञान को अभी बहुत कुछ जानना बाकी है।