

उडुपी अध्ययन में खुलासा, शहरीकरण से मेंढकों की संख्या नहीं बल्कि उनकी प्रजातियों के गुण और आवास बदल रहे हैं।
विशेष जरूरत वाले मेंढक जंगलों में सुरक्षित जबकि अनुकूलन क्षमता वाली प्रजातियां शहरों में भी जीवित।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष, शहरों का विस्तार जैव विविधता घटाने के बजाय मेंढक समुदायों की संरचना में बदलाव ला रहा है।
लेटराइट पठारों में मिले संकेत, छोटे प्राकृतिक आवास बचाकर शहरी क्षेत्रों में भी मेंढकों का संरक्षण संभव।
उडुपी शोध बताता है, बेहतर शहरी योजना से विकास और जैव विविधता संरक्षण दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है।
आम धारणा है कि शहरों के फैलाव से जंगल और जीव-जंतु खत्म होने लगते हैं। लेकिन कर्नाटक के उडुपी में किए गए एक नए अध्ययन ने शहरीकरण और जैव विविधता के संबंध को एक अलग नजरिए से समझाया है। अर्बन इकोसिस्टम्स पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, शहरों के बढ़ने से हमेशा प्रजातियों की संख्या कम नहीं होती, बल्कि कई बार यह तय होता है कि किस तरह के जीव उस क्षेत्र में रह पाएंगे।
पश्चिमी घाट की तलहटी में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि शहरीकरण मेंढकों की प्रजातियों को उनके खास गुणों के आधार पर प्रभावित करता है। कुछ विशेष प्रकार के मेंढक, जिन्हें रहने और प्रजनन के लिए खास परिस्थितियों की जरूरत होती है, शहरों से दूर प्राकृतिक इलाकों में ज्यादा पाए गए। वहीं, सामान्य परिस्थितियों में रहने वाले मेंढक शहरी क्षेत्रों में भी खुद को ढालने में सफल रहे।
शहरीकरण बना रहा है ‘प्राकृतिक छंटाई’
शोधकर्ताओं के अनुसार, शहरीकरण केवल प्रजातियों की संख्या घटाने वाला कारण नहीं है, बल्कि यह एक तरह का ‘गुणों का फिल्टर’ बन जाता है। इसके कारण कुछ विशेष गुणों वाले जीवों के लिए शहरों में रहना मुश्किल हो जाता है।
पेड़ों पर रहने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, बड़े आकार वाले और विशेष प्रजनन प्रक्रिया वाले मेंढक कम शहरी इलाकों में अधिक मिले। इन प्रजातियों को जंगल, नमी और छोटे प्राकृतिक आवासों की जरूरत होती है।
इसके विपरीत, ऐसे मेंढक जो अलग-अलग वातावरण में आसानी से रह सकते हैं, वे शहरों और बदले हुए इलाकों में भी पाए गए। वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय में इससे मेंढक समुदायों में एकरूपता बढ़ सकती है, क्योंकि केवल कुछ सामान्य प्रजातियां ही अधिक संख्या में बच पाती हैं।
23 जगहों पर किया गया अध्ययन
यह शोध कर्नाटक के उडुपी जिले के लेटराइट पठारी क्षेत्रों में किया गया। ये चट्टानी इलाके पश्चिमी घाट की जैव विविधता के लिए अहम माने जाते हैं। यहां कई स्थानीय और दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन कई बार इन्हें बेकार जमीन मानकर खेती, निर्माण और खनन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
शोध में उडुपी शहर के केंद्र से जंगलों की ओर 23 स्थानों का चयन किया गया। इनमें आठ जंगल क्षेत्र, 13 शहरी क्षेत्र और दो शहर-जंगल के बीच के क्षेत्र शामिल थे।
2018-19 के दो मानसून के मौसमों में शोधकर्ताओं ने 19 प्रजातियों के 947 मेंढकों का रिकॉर्ड तैयार किया। अध्ययन में पाया गया कि शहर, जंगल और बीच के क्षेत्रों में प्रजातियों की कुल संख्या में बहुत बड़ा अंतर नहीं था, लेकिन वहां रहने वाली प्रजातियों में काफी बदलाव था।
छोटे प्राकृतिक स्थानों की बड़ी भूमिका
शोधकर्ताओं ने बताया कि छोटे-छोटे प्राकृतिक स्थान मेंढकों के जीवन के लिए बेहद जरूरी हैं। पत्तियों की परत, चट्टानों की दरारें और बारिश के बाद बनने वाले छोटे जल स्रोत मेंढकों को छिपने, नमी बनाए रखने और प्रजनन में मदद करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, मेंढक पर्यावरण में बदलाव के अच्छे संकेतक माने जाते हैं। तापमान और नमी में मामूली बदलाव भी उनके जीवन को प्रभावित कर सकता है। इंडिराना प्रजाति के कुछ मेंढकों के उदाहरण से शोधकर्ताओं ने बताया कि वे गीली चट्टानी जगहों पर निर्भर रहते हैं। अगर ऐसी छोटी जगहें खत्म हो जाती हैं तो इसका असर पूरी प्रजाति पर पड़ सकता है।
छोटे शहरों में प्रकृति बचाने की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि उडुपी जैसे छोटे शहरों में अभी भी प्राकृतिक क्षेत्र, जंगल और पवित्र उपवन मौजूद हैं। ये स्थान न केवल स्थानीय जीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद करते हैं।
वैज्ञानिकों ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरों की योजना बनाते समय पेड़-पौधों और छोटे प्राकृतिक आवासों को बचाने पर ध्यान देना चाहिए। शहर केवल सड़क और इमारतों से नहीं बनते, बल्कि उनमें मौजूद प्राकृतिक स्थान भी उनकी पहचान का हिस्सा होते हैं।
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अध्ययन केवल एक शहर और सीमित समय पर आधारित है। इसलिए इसके निष्कर्षों को सभी शहरों पर लागू करने से पहले अन्य क्षेत्रों में भी लंबे समय तक अध्ययन की जरूरत है।
यह शोध संकेत देता है कि सही योजना के साथ शहरी विकास और जैव विविधता संरक्षण दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है।