क्या जंगली जीवों ने सीख लिया है इंसानों में फर्क करना, जानें क्या कहता है भारतीय अध्ययन

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा की नई रिसर्च बताती है कि जंगली जीव हर इंसान से नहीं डरते, बल्कि असली खतरे को पहचान कर ही प्रतिक्रिया देते हैं
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
Published on
सारांश
  • क्या जंगल के जानवर हर इंसान से बराबर डरते हैं? भारतीय वैज्ञानिकों की नई रिसर्च इस आम धारणा को चुनौती देती है।

  • इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) के शोधकर्ताओं ने तीन दशकों के अध्ययनों का विश्लेषण कर पाया कि जंगली जीव इंसानों में भी फर्क करना सीख चुके हैं। वे सबसे अधिक सतर्कता और डर शिकारियों या मछली पकड़ने वालों की मौजूदगी में दिखाते हैं, जबकि पर्यटकों, शोधकर्ताओं या सामान्य लोगों के प्रति उनका व्यवहार अपेक्षाकृत सहज रहता है।

  • अध्ययन के अनुसार, लगातार डर में रहने से जानवरों का भोजन, ऊर्जा, प्रजनन और जीवित रहने की क्षमता प्रभावित होती है, जिसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुंच सकता है।

  • शोध में यह रोचक तथ्य भी सामने आया कि कई छोटे जंगली जीव बड़े शिकारियों से बचने के लिए इंसानी बस्तियों और सड़कों के आसपास शरण लेते हैं, लेकिन यही रणनीति उन्हें सड़क दुर्घटनाओं का शिकार भी बना सकती है।

भले ही इंसान को धरती का सर्वोच्च शिकारी यानी 'सुपर-प्रिडेटर' कहा जाता है। लेकिन क्या जंगल का हर जीव इंसान को देखकर डरता है? क्या वे हर इंसान को एक जैसा खतरा मानते हैं? वैज्ञानिकों की मानें तो ऐसा नहीं है। जंगली जीव भी खतरे को पहचानते हैं। वे समझते हैं कि सामने खड़ा इंसान उन्हें मारने आया है या सिर्फ देखने। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग हो सकती है।

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि जंगली जानवर हर इंसान को एक जैसा खतरा नहीं मानते। वे सबसे ज्यादा डर उन लोगों से महसूस करते हैं, जो उनका शिकार करते हैं, जबकि पर्यटकों और शोधकर्ताओं की मौजूदगी पर उनकी प्रतिक्रिया कहीं कम होती है।

यह भी पढ़ें
कबूतर से लेकर बंदर तक...क्यों इतने बोल्ड, बेखौफ और आक्रामक हो रहे हैं शहरों में रहने वाले जीव?
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा की इस नई रिसर्च में सामने आया है कि जंगली जीव इंसानों में भी फर्क करना सीख चुके हैं।

तीन दशकों की रिसर्च और आंकड़ों के विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि जानवर इंसान को देखकर केवल तभी खौफ में आते हैं, जब उन्हें अपनी जान का सीधा खतरा महसूस होता है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल इकोलॉजी लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।

इस अध्ययन में यह समझने का प्रयास किया गया है कि अलग-अलग प्रजातियों के जंगली जीव इंसानों की मौजूदगी पर अपना व्यवहार किस तरह बदलते हैं।

शिकारियों को देखते ही बढ़ जाती है सतर्कता

आईआईएससी के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता शॉन डिसूजा के मुताबिक, जिन इलाकों में शिकार या मछली पकड़ने जैसी गतिविधियां होती हैं, वहां जानवर अधिक सतर्क रहते हैं।

यह भी पढ़ें
बढ़ते शहरीकरण के साथ इंसानों के करीब आते वन्यजीव, क्या सीखना होगा नई प्रजातियों के साथ रहना
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट

वे बार-बार आसपास का जायजा लेते हैं और भोजन करने में कम समय बिताते हैं। इसके विपरीत, जहां केवल पर्यटक, शोधकर्ता या आम लोग मौजूद होते हैं, वहां जानवरों का व्यवहार इतना भयभीत नहीं होता। कई बार वे सामान्य गतिविधियां भी जारी रखते हैं।

सड़कें और बस्तियां भी बन सकती हैं सुरक्षित ठिकाना

अध्ययन में एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया है कि कई परिस्थितियों में सड़कें और मानव बस्तियां कुछ जंगली जीवों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह बन जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, बड़े शिकारी जीव अक्सर इंसानों के आसपास आने से कतराते हैं। ऐसे में छोटे शिकार बनने वाले जानवरों को इन इलाकों में खतरा कम महसूस होता है।

ऐसे में छोटे शाकाहारी जानवर खुद को बड़े शिकारियों से बचाने के लिए इंसानी इलाकों के आसपास शरण ले लेते हैं। इसके चलते सड़क किनारे घास के खुले क्षेत्र भी उनके लिए भोजन का अच्छा स्रोत बन जाते हैं। सड़कों के किनारे उगी हरी घास भी छोटे जानवरों को आकर्षित करती है। हालांकि, यह बेफिक्री उनके लिए नई मुसीबत ले आती है, अक्सर वे तेज रफ्तार गाड़ियों का शिकार हो जाते हैं।

डर की कीमत: कैसे बदल रही है कुदरत की लय?

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जानवरों के भोजन करने, सतर्क रहने और आवाजाही के व्यवहार का विश्लेषण किया। उनका कहना है कि हर पल खतरे पर नजर रखने में जो समय और ऊर्जा खर्च होती है, उससे भोजन जुटाने और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मिलने वाला समय घट जाता है। अगर कोई जानवर लगातार डर के साये में जीता है, तो उसकी ऊर्जा, प्रजनन क्षमता और जीवित रहने की संभावना भी प्रभावित हो सकती है।

यह भी पढ़ें
इंसानी शोर से खतरे में पक्षियों का जीवन चक्र, घट रही प्रजनन से लेकर जीवित रहने की क्षमता
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट

यही बदलाव धीरे-धीरे पूरी वन्यजीव आबादी और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल सकते हैं।

क्या इससे सुलझेगा मानव-वन्यजीव संघर्ष?

वैज्ञानिकों के मुताबिक जंगली जानवर खतरे की तीव्रता और उसकी नियमितता को समझकर अपना व्यवहार बदल लेते हैं। यदि खतरा लगातार और गंभीर हो, तो वे लंबे समय तक सतर्क रहते हैं। लेकिन यदि इंसानों की मौजूदगी से उन्हें वास्तविक नुकसान नहीं पहुंचता या खतरा अनुमानित होता है, तो वे धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार अपनाने लगते हैं।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस और अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर कार्तिक शंकर का मानना है कि यह शोध इंसान-वन्यजीव संघर्ष को बेहतर ढंग से समझने और उसका समाधान खोजने में मदद कर सकता है। उनका कहना है कि कुछ परिस्थितियों में सीमित और वैज्ञानिक आधार पर किए गए नियंत्रणात्मक उपाय जंगली जानवरों को मानव बस्तियों से दूर रखने में प्रभावी हो सकते हैं।

हालांकि, ऐसे उपायों का निर्णय स्थानीय परिस्थितियों, वैज्ञानिक साक्ष्यों और संरक्षण के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें
जंगल में बढ़ते इंसानी दखल से खतरे में पूर्वी हिमालय के पक्षियों का भविष्य: स्टडी
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समझने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी हैं कि अलग-अलग प्रजातियां अलग-अलग परिस्थितियों में इंसानों के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। साथ ही यह भी जानना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जानवर केवल इंसानों की मौजूदगी के अभ्यस्त हो रहे हैं या फिर समय के साथ उनके व्यवहार और विकासक्रम (इवोल्यूशन) में भी स्थायी बदलाव आ रहे हैं।

यह अध्ययन याद दिलाता है कि जंगल के जीव हर इंसान को एक जैसा नहीं देखते। वे खतरे को पहचानते हैं, उसका आकलन करते हैं और उसी के अनुसार अपना व्यवहार बदलते हैं। यानी प्रकृति में डर भी सोच-समझकर पैदा होता है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in