

2023 की बाढ़ ने दिल्ली को यह सिखाया था कि केवल बढ़ता जलस्तर ही नहीं, बल्कि तैयारी में चूक भी बड़े संकट को जन्म दे सकती है।
अब 2026 के मानसून से पहले दिल्ली सरकार का दावा है कि सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र के सभी 77 बड़े नालों से 31.05 लाख मीट्रिक टन गाद हटाकर सफाई कर ली है।
यह जानकारी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश रिपोर्ट में दी गई है, जबकि अन्य नालों की जिम्मेदारी एमसीडी और पीडब्ल्यूडी के पास है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह तैयारी इस बार राजधानी को जलभराव और बाढ़ से बचा पाएगी?
2023 की त्रासदी पर गठित संयुक्त बाढ़ प्रबंधन समिति ने पाया था कि यमुना के जलग्रहण क्षेत्र में रिकॉर्ड बारिश, चेतावनी प्रणाली की विफलता और प्रशासनिक कमियां बाढ़ के प्रमुख कारण बने थे।
इन्हीं सबक से सीख लेते हुए अब यमुना के वैज्ञानिक अध्ययन, हाई-रिजॉल्यूशन जियोस्पेशियल डेटा और आधुनिक मॉडलिंग के जरिए दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन योजना तैयार की जा रही है। लेकिन दिल्लीवासियों के लिए असली कसौटी सरकारी दावे नहीं, बल्कि यह मानसून होगा, जो तय करेगा कि तैयारियां कागजों तक सीमित रहीं या वास्तव में राजधानी को सुरक्षित बना सकीं।
2023 की वो खौफनाक बरसाती रातें आज भी दिल्लीवालों के जहन में ताजा हैं, जब उफनती यमुना का मटमैला पानी घरों, सड़कों और जिंदगियों में घुस आया था। सवाल यह है कि क्या 2026 में दिल्ली फिर उसी दर्द को दोहराएगी, या इस बार प्रशासनिक तैयारियों में वाकई कोई दम है?
हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली सरकार के 'सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग' (आईएंडएफसी) ने मानसून से पहले अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी 77 बड़े नालों की सफाई का काम पूरा कर लिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मानसून से पहले नालों से 31.05 लाख मीट्रिक टन गाद (सिल्ट) निकाली जा चुकी है।
वहीं, दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधीन आने वाले अन्य नालों की सफाई की जिम्मेदारी संबंधित विभागों को सौंपी गई है। इस मामले में 3 अगस्त, 2026 को एनजीटी में सुनवाई हुई है।
हालांकि इस बीच सवाल वही पुराना है, क्या जो नाले सरकारी आंकड़ों में साफ हुए हैं, उनका असर जमीन पर भी दिखेगा?
आखिर क्यों डूबी थी 2023 में दिल्ली?
यह पूरा मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा एक समाचार रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेने के बाद सामने आया था। इस समाचार रिपोर्ट के मुताबिक 2023 की त्रासदी का मुख्य कारण प्रशासनिक अनदेखी और सही समय पर सटीक चेतावनी न मिल पाना था।
इस खबर के मुताबिक 2023 में केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और दिल्ली सरकार यमुना के बढ़ते जलस्तर का समय रहते सही अनुमान लगाने में विफल रहे थे, जिससे राजधानी को अभूतपूर्व बाढ़ का सामना करना पड़ा।
इसी के बाद गठित संयुक्त बाढ़ प्रबंधन समिति (जीएफएमसी) ने भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए कई अहम सिफारिशें की थीं।
इस बारे में संयुक्त बाढ़ प्रबंधन समिति की रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। रिपोर्ट के मुताबिक यमुना के कैचमेंट एरिया में पांच दिनों में हुई कुल बारिश के विश्लेषण से पता चला कि 2023 में ओल्ड दिल्ली रेलवे ब्रिज के कैचमेंट एरिया में हुई बारिश, 1978 की ऐतिहासिक बाढ़ के दौरान दर्ज बारिश की तुलना में 23.8 फीसदी अधिक थी।
समिति ने यमुना नदी के विभिन्न जलवैज्ञानिक निगरानी केंद्रों के जलस्तर विश्लेषण और जलग्रहण क्षेत्र में हुई बारिश के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि 9 से 13 जुलाई 2023 के बीच हुई भारी ही दिल्ली और यमुना किनारे के अन्य क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़ का प्रमुख कारण थी।
भविष्य की तैयारी: तकनीक का सहारा, पर अड़चनें बरकरार
एनजीटी को बताया गया है कि यमुना में आने वाली बाढ़ के प्रबंधन की योजना तैयार करने के लिए पुणे स्थित सेंट्रल वाटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन (सीडब्ल्यूपीआरएस) को हाइब्रिड मॉडल के माध्यम से नदी का वैज्ञानिक अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई है। इस अध्ययन की रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।
हालांकि, अध्ययन के दौरान 100 वर्ष में एक बार आने वाली संभावित बाढ़ (1:100 वर्ष) का कंटूर लाइन्स के आधार पर विस्तृत फ्लडप्लेन मानचित्र तैयार करने में तकनीकी कठिनाइयां सामने आईं। सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े आवश्यक विश्लेषण के लिए पर्याप्त नहीं थे।
इस कमी को दूर करने के लिए नवंबर 2025 में हुई निगरानी समिति की बैठक में एयरबस से उच्च-रिजॉल्यूशन भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) डेटा खरीदने का निर्णय लिया गया। इसके लिए माइक्रोनेट स्पेसटेक एलएलपी को कार्य सौंपा जा चुका है और आवश्यक डेटा सीडब्ल्यूपीआरएस, पुणे को उपलब्ध करा दिया गया है।
एक बड़ा सवाल: क्या सुरक्षित है दिल्ली?
प्रशासनिक मशीनरी अब सैटेलाइट डेटा और रिपोर्टों का सहारा ले रही है, जो एक सराहनीय कदम है। लेकिन दिल्ली की जनता के लिए कागजी आंकड़े और तकनीकी रिपोर्टें तब तक बेमानी हैं, जब तक कि मूसलाधार बारिश में उनके घर और सड़कें सुरक्षित न रहें।
ऐसे में देखना यह होगा कि एनजीटी की सख्ती और नई तकनीकों का यह मेल, क्या इस मानसून में दिल्ली को राहत दे पाता है या नहीं।