नई खोज: ऐसा डिस्प्ले जो खुद धूप से ऊर्जा भी बनाए और रोशनी भी दे सके

नई पेरोव्स्काइट तकनीक: एक ही डिवाइस सूरज की रोशनी से बिजली बनाए और एलईडी की तरह रोशनी दे, ऊर्जा दक्षता में बड़ी क्रांति की संभावना
डिवाइस ने 26.7 प्रतिशत सौर ऊर्जा दक्षता और 31 प्रतिशत एलईडी प्रकाश दक्षता हासिल कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
डिवाइस ने 26.7 प्रतिशत सौर ऊर्जा दक्षता और 31 प्रतिशत एलईडी प्रकाश दक्षता हासिल कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • नई पेरोव्स्काइट तकनीक से एक ही डिवाइस सूरज की रोशनी से बिजली बनाता और एलईडी की तरह प्रकाश उत्सर्जित करता है।

  • वैज्ञानिकों ने स्पंज जैसी नैनो संरचना विकसित कर ऊर्जा हानि कम की और प्रकाश-विद्युत रूपांतरण दक्षता बढ़ाई।

  • डिवाइस ने 26.7 प्रतिशत सौर ऊर्जा दक्षता और 31 प्रतिशत एलईडी प्रकाश दक्षता हासिल कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

  • नई संरचना प्रकाश फंसने की समस्या हल कर फोटॉन पुनर्चक्रण बढ़ाती है, जिससे ऊर्जा उपयोग अधिक प्रभावी होता है।

  • यह तकनीक भविष्य में स्मार्ट डिस्प्ले और ऊर्जा बचत उपकरणों को अधिक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा दिखाती है।

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है जो भविष्य में मोबाइल, टीवी और अन्य डिस्प्ले को पूरी तरह बदल सकती है। यह तकनीक न केवल स्क्रीन को रोशनी देने में सक्षम है, बल्कि जब स्क्रीन का उपयोग नहीं हो रहा हो तो यह आसपास की रोशनी (जैसे सूरज की रोशनी) से खुद ऊर्जा भी बना सकती है।

यह शोध एक नई प्रकार की सामग्री पर आधारित है जिसे “पेरोव्स्काइट” कहा जाता है। यह सामग्री बहुत सस्ती, लचीली और अत्यधिक कुशल मानी जाती है। अब तक इसे अलग-अलग रूप में सोलर सेल और एलईडी के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन दोनों को एक साथ एक ही डिवाइस में करना बहुत मुश्किल माना जाता था। यह शोध जौल नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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पेरोव्स्काइट क्या है और यह क्यों खास है

पेरोव्स्काइट एक खास तरह की क्रिस्टल संरचना वाली सामग्री है। पिछले लगभग दस वर्षों में यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण नई तकनीकी सामग्रियों में से एक बन चुकी है। यह इसलिए खास है क्योंकि यह कम लागत में बनाई जा सकती है। अलग-अलग रंगों की रोशनी को नियंत्रित कर सकती है।

बहुत अधिक दक्षता के साथ सूरज की रोशनी को बिजली में बदल सकती है। एलईडी की तरह रोशनी भी पैदा कर सकती है। इसी वजह से वैज्ञानिक इसे भविष्य की ऊर्जा और डिस्प्ले तकनीक के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।

स्रोत: जौल पत्रिका

सबसे बड़ी चुनौती: दो विपरीत जरूरतें

इस तकनीक की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सोलर सेल और एलईडी की जरूरतें एक-दूसरे से बिल्कुल उलटी होती हैं। सोलर सेल को मोटी परत चाहिए ताकि वह ज्यादा से ज्यादा सूरज की रोशनी सोख सके और उसे बिजली में बदल सके।

लेकिन एलईडी को बहुत पतली परत चाहिए, ताकि उसके अंदर बनने वाली रोशनी आसानी से बाहर निकल सके। इस वजह से अब तक दोनों तकनीकों को एक साथ जोड़ना लगभग असंभव माना जाता था।

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नई खोज: “स्पंज जैसी संरचना” का उपयोग

इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका अपनाया। उन्होंने पेरोव्स्काइट के अंदर छोटे-छोटे स्पंज जैसे ढांचे बनाए। यह ढांचा एल्यूमिना नामक पदार्थ से बना है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया कि यह बहुत छोटे-छोटे छिद्रों वाला होता है, जिससे रोशनी और इलेक्ट्रॉन आसानी से गुजर सकें।

इस संरचना को बनाने में दो तरह के नैनोपार्टिकल्स का उपयोग किया गया जिन्हें विपरीत चार्ज देकर आपस में जोड़ा गया। इससे एक प्राकृतिक “स्पंज जैसी बनावट” तैयार हुई। इस डिजाइन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह रोशनी को सही दिशा में मोड़ भी सकता है और बिजली के प्रवाह को रोकता भी नहीं है।

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ऊर्जा की बर्बादी में बड़ी कमी

पुरानी तकनीकों में रोशनी अक्सर अंदर ही फंस जाती थी और गर्मी में बदलकर नष्ट हो जाती थी। नई संरचना में यह समस्या काफी हद तक कम हो गई है। अब ऊर्जा कम बर्बाद होती है और डिवाइस अधिक कुशल हो गया है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि ऊर्जा के नुकसान की दर बहुत कम होकर लगभग सिलिकॉन सोलर सेल के स्तर तक पहुंच गई है, जो आज की सबसे उन्नत तकनीकों में से एक है।

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प्रदर्शन में रिकॉर्ड तोड़ सुधार

इस नई डिवाइस ने दो अलग-अलग मोड में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। जब इसे सोलर सेल की तरह इस्तेमाल किया गया, तो इसने लगभग 26.7 प्रतिशत दक्षता से सूरज की रोशनी को बिजली में बदला। यह पेरोव्स्काइट तकनीक में उस समय का विश्व रिकॉर्ड माना गया।

जब इसे एलईडी की तरह चलाया गया, तो इसने लगभग 31 प्रतिशत दक्षता से बिजली को रोशनी में बदला। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर एक ही डिवाइस में दोनों काम इतने अच्छे स्तर पर करना संभव नहीं माना जाता था।

रोशनी को “दुबारा इस्तेमाल” करने की क्षमता

इस तकनीक की एक और खास बात है “फोटॉन रीसाइक्लिंग”। इसका मतलब है कि अगर कोई रोशनी डिवाइस के अंदर फंस जाती है, तो वह नष्ट होने के बजाय फिर से उपयोग हो सकती है और दोबारा प्रकाश में बदल सकती है। इससे ऊर्जा की बचत और दक्षता दोनों बढ़ जाती हैं।

भविष्य में क्या बदल सकता है

इस खोज का सबसे बड़ा असर भविष्य की तकनीक पर पड़ सकता है। ऐसे डिस्प्ले बनाए जा सकते हैं जो दिन में या कमरे की रोशनी से खुद बिजली बना सकें और जब जरूरत हो तब खुद ही रोशनी भी दें। इसका मतलब यह है कि मोबाइल और टीवी जैसे उपकरणों की बैटरी लाइफ काफी बढ़ सकती है।

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एक नई दिशा की शुरुआत

यह शोध दिखाता है कि अब तक जिस सीमा को असंभव माना जाता था, वह असल में सही डिजाइन और इंजीनियरिंग से बदली जा सकती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यह सिर्फ एक बेहतर सोलर सेल या एलईडी नहीं है, बल्कि एक नई तरह की तकनीकी सोच है, जिसमें ऊर्जा को बनाने और इस्तेमाल करने दोनों को एक ही सिस्टम में जोड़ दिया गया है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक ऊर्जा और डिस्प्ले दोनों क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है।

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