भारतीय वैज्ञानिकों की खोज: मानव जीवन में सोचने-सीखने वाली स्मार्ट तकनीक की क्रांति

यह शोध भविष्य में कम ऊर्जा वाले, सीखने वाले कंप्यूटर बनाकर चिकित्सा, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोजमर्रा की तकनीक को बेहतर बना सकता है।
शिक्षा और शोध में सुधार: अनुकूलनीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शिक्षा और विज्ञान में प्रयोगात्मक सीखने और जटिल समस्याओं के समाधान के नए अवसर देंगे।
शिक्षा और शोध में सुधार: अनुकूलनीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शिक्षा और विज्ञान में प्रयोगात्मक सीखने और जटिल समस्याओं के समाधान के नए अवसर देंगे।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • ऊर्जा की बचत: स्मार्ट मॉलिक्यूलर डिवाइस कम ऊर्जा में कार्य कर सकते हैं, जिससे भविष्य के कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अधिक टिकाऊ बनेंगे।

  • तेज और बुद्धिमान कंप्यूटिंग: यह तकनीक कंप्यूटिंग को तेज और सीखने योग्य बनाएगी, जिससे एआई और डेटा प्रोसेसिंग अधिक कुशल होंगे।

  • स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार: सीखने वाले इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम से चिकित्सा उपकरण और डायग्नोस्टिक टूल्स अधिक सटीक, अनुकूल और रोगी के अनुकूल बन सकते हैं।

  • शिक्षा और शोध में सुधार: अनुकूलनीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शिक्षा और विज्ञान में प्रयोगात्मक सीखने और जटिल समस्याओं के समाधान के नए अवसर देंगे।

  • रोजमर्रा के जीवन और स्मार्ट तकनीक: इलेक्ट्रॉनिक्स और मॉलिक्यूलर तकनीक मिलकर स्मार्ट होम, स्मार्ट डिवाइस और व्यक्तिगत तकनीक को अधिक बुद्धिमान और अनुकूल बनाएंगे।

पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक यह सपना देखते रहे हैं कि सिलिकॉन से आगे बढ़कर ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाए जाएं जो बिल्कुल नए तरीके से काम करें। इसी सोच से मॉलिक्यूलर इलेक्ट्रॉनिक्स का विचार जन्मा, जहां बहुत छोटे अणुओं से सर्किट बनाए जाते हैं। विचार बहुत सुंदर था, लेकिन व्यवहार में यह आसान नहीं निकला।

असली उपकरणों में अणु अकेले नहीं रहते, बल्कि भीड़ की तरह एक-दूसरे के साथ क्रिया करते हैं। इलेक्ट्रॉन और आयन इधर-उधर चलते हैं, सतहें समय के साथ बदलती हैं और छोटे-से बदलाव से भी व्यवहार पूरी तरह बदल सकता है। इसलिए इन उपकरणों को समझना और नियंत्रित करना कठिन रहा।

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इसी दौरान एक दूसरा क्षेत्र सामने आया - न्यूरोमॉर्फिक कंप्यूटिंग। इसका लक्ष्य ऐसे हार्डवेयर बनाना है जो इंसानी दिमाग से प्रेरित हों। दिमाग में याद रखना, गणना करना और सीखना - ये तीनों काम एक ही पदार्थ में होते हैं। लेकिन आज के ज्यादातर न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम ऐसे बनाए जाते हैं जो सीखने की नकल तो करते हैं, पर उनके पदार्थ खुद सीखने वाले नहीं होते।

अब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च ने इन दोनों समस्याओं को एक साथ जोड़ने का रास्ता दिखाया है।

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आईआईएससी की नई खोज

आईआईएससी के सेंटर फॉर नैनो साइंस एंड इंजीनियरिंग में असिस्टेंट प्रोफेसर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने ऐसे बेहद छोटे मॉलिक्यूलर उपकरण बनाए हैं जो हालात के अनुसार अपना व्यवहार बदल सकते हैं। एक ही डिवाइस कभी मेमोरी की तरह काम कर सकता है, कभी लॉजिक गेट, कभी एनालॉग प्रोसेसर और कभी बिल्कुल दिमाग की सिनेप्स की तरह सीखने वाला तत्व बन जाता है।

एडवांस मैटेरियल्स नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों में इतनी ज्यादा लचीलापन बहुत ही दुर्लभ है। यहां रसायन विज्ञान और गणना केवल उदाहरण नहीं, बल्कि असली काम करने का तरीका बन जाते हैं।

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रुथेनियम रसायन का कमाल

इस खोज के पीछे खास तरह की रसायन विज्ञान है। शोधकर्ताओं ने रुथेनियम नामक धातु पर आधारित 17 अलग-अलग मॉलिक्यूल बनाए। इन मॉलिक्यूल्स की बनावट और उनके आसपास मौजूद आयनों में छोटे बदलाव करके यह देखा गया कि इलेक्ट्रॉनों का व्यवहार कैसे बदलता है।

नतीजा चौंकाने वाला था। एक ही मॉलिक्यूलर सिस्टम अलग-अलग परिस्थितियों में अलग काम करने लगा। कभी यह डिजिटल तरीके से ऑन-ऑफ की तरह व्यवहार करता है, तो कभी एनालॉग तरीके से धीरे-धीरे बदलता है। इसका मतलब है कि एक ही डिवाइस कई तरह की इलेक्ट्रॉनिक भूमिकाएं निभा सकता है।

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इस रसायन संश्लेषण और डिवाइस बनाने और उन्हें जांचने वाले शोधकर्ता ने कहा कि हमें हैरानी हुई कि एक ही प्रणाली में इतनी बहुमुखी क्षमता छिपी थी। सही रसायन और वातावरण मिलने पर यह याद रख सकता है, गणना कर सकता है और यहां तक कि सीख और भूल भी सकता है।

मॉलिक्यूल से फंक्शन तक का सिद्धांत

मॉलिक्यूलर इलेक्ट्रॉनिक्स की एक बड़ी कमी हमेशा से मजबूत सिद्धांत की रही है। इस टीम ने इस दिशा में भी बड़ा कदम उठाया। उन्होंने क्वांटम केमिस्ट्री और कई-कण भौतिकी पर आधारित एक सैद्धांतिक मॉडल बनाया, जो यह बता सकता है कि किसी मॉलिक्यूल की संरचना से डिवाइस का व्यवहार कैसे निकलेगा।

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इस सिद्धांत से यह समझा गया कि इलेक्ट्रॉन मॉलिक्यूलर फिल्म में कैसे चलते हैं, मॉलिक्यूल कैसे ऑक्सीडेशन-रिडक्शन से गुजरते हैं और काउंटर-आयन कैसे अपनी जगह बदलते हैं। ये सभी प्रक्रियाएं मिलकर तय करती हैं कि डिवाइस कब स्विच करेगा, कब स्थिर रहेगा और कितनी देर तक याद रखेगा।

भविष्य का बुद्धिमान हार्डवेयर

इस शोध का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अब मेमोरी और गणना को एक ही पदार्थ में जोड़ा जा सकता है। इसका सीधा मतलब है ऐसे न्यूरोमोर्फिक हार्डवेयर का रास्ता खुलना, जहां सीखना मशीन के सॉफ्टवेयर में नहीं, बल्कि उसके पदार्थ में ही छिपा हो।

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शोध के मुताबिक, टीम अब इन मॉलिक्यूलर पदार्थों को सिलिकॉन चिप्स पर लगाने की दिशा में काम कर रही है। भविष्य में इससे ऐसे एआई हार्डवेयर बन सकते हैं जो कम ऊर्जा खपत करें और अपने आप सीख सकें।

जैसा कि शोधकर्ता ने शोध के हवाले से कहा है कि यह काम दिखाता है कि रसायन विज्ञान केवल कंप्यूटिंग के लिए सामग्री नहीं देता, बल्कि खुद कंप्यूटिंग का वास्तुकार बन सकता है।

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