नदियों में नहीं बहेगा जहरीला रंगीन पानी, आईआईटी मद्रास ने कपड़ा उद्योग के लिए खोजा किफायती समाधान

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह स्वदेशी तकनीक जहरीले रंगों और रसायनों से भरे दूषित जल को साफ कर कपड़ा उद्योग को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने में मदद करेगी
कपडा उद्योग से निकलने वाले दूषित पानी में रंग, भारी धातुएं, एसिड, क्षार और अन्य जहरीले रसायन मौजूद होते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
कपडा उद्योग से निकलने वाले दूषित पानी में रंग, भारी धातुएं, एसिड, क्षार और अन्य जहरीले रसायन मौजूद होते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने कपड़ा उद्योग से निकलने वाले जहरीले रंगीन दूषित जल को साफ करने के लिए एक किफायती और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक विकसित की है, जिसका सफल परीक्षण तमिलनाडु के तिरुपुर जिले में किया गया है।

  • यह तकनीक ‘इलेक्ट्रोकेमिकल ओजोन ऑक्सीडेशन प्रोसेस’ और ‘कैपेसिटिव डीआयोनाइजेशन’ को मिलाकर काम करती है, जिससे रंग, जहरीले रसायन और नमक प्रभावी ढंग से हटाए जा सकते हैं। सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें क्लोरीन का उपयोग नहीं होता, जिससे हानिकारक और कैंसरकारी उप-उत्पाद बनने का खतरा खत्म हो जाता है।

  • परीक्षणों में यह तकनीक रंग हटाने में 96 फीसदी और प्रदूषण भार कम करने में 60 फीसदी तक सफल रही है। साथ ही, यह पारंपरिक रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) प्रणाली की तुलना में कम ऊर्जा खर्च करती है और कुल उपचार लागत में करीब 25 फीसदी की कमी लाती है।

  • कपड़ा उद्योग, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है, बड़ी मात्रा में प्रदूषित जल छोड़ता है, जो नदियों और भूजल के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। ऐसे में यह नई तकनीक न केवल प्रदूषण कम करने में मददगार साबित हो सकती है, बल्कि कपड़ा उद्योग को स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है, जो टेक्सटाइल फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले केमिकल युक्त रंगीन पानी को बेहद कम खर्च में साफ करने में सक्षम है। इस तकनीक का सफल ट्रायल तमिलनाडु के तिरुपुर जिले में किया जा चुका है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह तकनीक न केवल प्रदूषण को कम करेगी, बल्कि पानी को दोबारा उपयोग लायक बनाने में भी मददगार साबित होगी।

भारत में कपड़ा उद्योग देश की अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब पांच फीसदी का योगदान देता है, जबकि औद्योगिक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 7 फीसदी और निर्यात आय में लगभग 12 फीसदी है।

हालांकि, इस आर्थिक विकास की बड़ी पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी पड़ रही है। वैश्विक स्तर पर देखें तो साफ पानी के हो रहे प्रदूषण में करीब 20 फीसदी हिस्सा अकेले कपड़ा उद्योग का माना जाता है, खासकर रंगाई और फिनिशिंग प्रक्रियाओं के कारण बड़ी मात्रा में दूषित पानी निकलता है।

कपड़ा उद्योग की आर्थिक चमक के पीछे छिपा पर्यावरणीय संकट

इन उद्योगों से निकलने वाले दूषित पानी में रंग, भारी धातुएं, एसिड, क्षार और अन्य जहरीले रसायन मौजूद होते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।

यह दूषित पानी लंबे समय से नदियों, झीलों और भूजल के लिए भी बड़ा खतरा बना हुआ है। रंग और रसायनों से भरा यह पानी न केवल जल की स्वच्छता और पारदर्शिता को प्रभावित करता है, बल्कि जलीय जीवों, इंसानों और पूरे पर्यावरण के लिए जोखिम भी पैदा करता है।

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कपडा उद्योग से निकलने वाले दूषित पानी में रंग, भारी धातुएं, एसिड, क्षार और अन्य जहरीले रसायन मौजूद होते हैं, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

इससे पानी में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तक प्रभावित होती है, जो जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद जरूरी है।

यही वजह है कि भारत सरकार ने इसके लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज यानी फैक्ट्रियों से एक बूंद भी गंदा पानी बाहर न जाने देने का नियम बनाया है।

हालांकि, मौजूदा तकनीकों से इस दूषित पानी को साफ करना काफी महंगा पड़ता है और इसमें भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है। साथ ही इसके लिए बड़े संयंत्रों की जरूरत पड़ती है और इसका कार्बन फुटप्रिंट भी काफी अधिक होता है। इसी चुनौती का प्रभावी और किफायती समाधान आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है।

'इलेक्ट्रोकेमिकल ओजोन ऑक्सीडेशन प्रोसेस' नाम की यह तकनीक कपड़ा उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' प्रणाली की तुलना में अधिक किफायती, कम ऊर्जा खर्च करने वाली और पर्यावरण के लिए ज्यादा सुरक्षित मानी जा रही है।

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला स्तर पर 500 मिलीलीटर से लेकर 50 लीटर तक के नमूनों पर परीक्षण किए। इसके बाद तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों में परखने के लिए तमिलनाडु के तिरुपुर जिले स्थित कुन्नंकलपलायम कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) में 2023 के दौरान पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया गया।

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इस परियोजना का नेतृत्व आईआईटी मद्रास की प्रोफेसर इंदुमति एम नांबी ने किया। यह केंद्र कपड़ा और रंगाई इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित पानी को साफ कर जीरो लिक्विड डिस्चार्ज मानकों को प्राप्त करने में मदद करता है। परीक्षणों में यह तकनीक रंग हटाने में 96 फीसदी और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) कम करने में 60 फीसदी तक सफल रही।

क्या है ‘इलेक्ट्रोकेमिकल ओजोन ऑक्सीडेशन प्रोसेस’?

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें क्लोरीन का इस्तेमाल नहीं होता। आमतौर पर क्लोरीन आधारित प्रक्रियाओं से कैंसर पैदा करने वाले हानिकारक यौगिक बनने का खतरा रहता है। वहीं यह नई तकनीक बिना जहरीले उप-उत्पाद पैदा किए पानी को साफ करती है।

अपनी खोज पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर इंदुमति ने प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी दी है कि, “इस तकनीक में उन्नत ऑक्सीकरण प्रक्रिया ‘इलेक्ट्रोकेमिकल ओजोन ऑक्सीकरण प्रक्रिया’ (ईसीओओपी) को ‘कैपेसिटिव डीआयोनाइजेशन’ (सीडीआई) तकनीक के साथ जोड़ा गया है, जिससे कार्बनिक प्रदूषकों और नमक को प्रभावी ढंग से हटाया जा सकता है।“

ईसीओओपी प्रक्रिया कपड़ा उद्योग के गंदे पानी में मौजूद गहरे रंगों और जहरीले केमिकल्स को तोड़ने में बेहद असरदार है।

इसकी खास बात यह है कि यह बिना स्लज पैदा किए प्रदूषकों को पूरी तरह खत्म कर देती है। वहीं, सीडीआई तकनीक पानी से नमक हटाने का काम करती है और इसमें रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) की तुलना में कम ऊर्जा खर्च होती है।

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आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने पाया कि किसी रंगाई इकाई से निकलने वाले कुल अपशिष्ट जल में महज 10 फीसदी हिस्सा ऐसा होता है, जिसमें अत्यधिक घुलित ठोस पदार्थ (टीडीएस) मौजूद रहते हैं। इसे ‘डाई बाथ’ कहा जाता है। बाकी 90 फीसदी पानी धुलाई से निकलने वाला होता है, जिसमें टीडीएस का स्तर अपेक्षाकृत कम रहता है।

इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने अलग-अलग तरह के अपशिष्ट जल के लिए अलग उपचार रणनीति तैयार की है।

जेब पर भी हल्की: 25 फीसदी तक घटेगा खर्च

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस नई प्रणाली से रंगाई प्रक्रिया से निकलने वाले गंदे पानी को अलग करके उसका उपचार किया जाता है, जिससे रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) सिस्टम पर पड़ने वाला दबाव करीब 75 फीसदी तक घट जाता है। इससे उपचार संयंत्र की लागत कम होती है और कार्बन उत्सर्जन भी घटता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें क्लोरीन का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए कैंसर पैदा करने वाले हानिकारक रसायन बनने का खतरा भी नहीं रहता।

अध्ययन से पता चला है कि यह नई तकनीक जल शोधन संयंत्रों में रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) यूनिट्स की जरूरत को काफी कम कर देती है। इससे कुल उपचार लागत में करीब 25 फीसदी की कमी आती है, जबकि आरओ ढांचे पर होने वाला खर्च 75 फीसदी तक घट जाता है।

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प्रोफेसर नांबी ने जानकारी दी है कि यह तकनीक बिना कीचड़ (स्लज) पैदा किए रंग और अन्य जहरीले कार्बनिक प्रदूषकों को खत्म कर देती है। इसके साथ “कैपेसिटिव डीआयोनाइजेशन” तकनीक का उपयोग नमक हटाने के लिए किया गया है, जो पारंपरिक आरओ तकनीक की तुलना में कम ऊर्जा खर्च करती है।

शुरुआती सफलता के बाद शोधकर्ताओं ने इस प्रणाली की क्षमता बढ़ाकर 400 लीटर प्रतिदिन कर दी है। अब इसे अलग-अलग उद्योगों के दूषित पानी के उपचार के लिए और बेहतर बनाने पर काम चल रहा है।

आईआईटी मद्रास की टीम भविष्य में इस तकनीक को छोटे रंगाई उद्योगों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है, खासकर उन इकाइयों तक जहां महंगे आरओ सिस्टम मौजूद नहीं हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक न केवल जल प्रदूषण कम करने में मदद करेगी, बल्कि कपड़ा उद्योग को अधिक पर्यावरण-अनुकूल, स्वच्छ और पर्यावरण के प्रति जवाबदेह बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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