

शुरुआती बड़े अनाज के दाने इंसानी चयन का नतीजा नहीं, बल्कि बेहतर पानी और अनुकूल पर्यावरण का प्रभाव हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने जौ और गेहूं के दानों में आकार का अंतर स्थिर कार्बन समस्थानिकों से पानी की उपलब्धता से जोड़ा है।
दक्षिणी लेवांत के पुरातात्विक स्थलों पर मिले बड़े दाने, शुरुआती खेती में आनुवंशिक बदलाव की धारणा पर सवाल उठाते हैं।
अध्ययन के अनुसार, पौधों में आनुवंशिक चयन से पहले पर्यावरणीय परिस्थितियों ने अनाज के आकार को प्रभावित किया होगा।
खेती का विकास अचानक नहीं हुआ, बल्कि शिकारी-संग्रहकर्ताओं और पौधों के बीच लंबे पर्यावरणीय संबंधों से धीरे-धीरे कृषि समाज बने।
करीब 11 हजार साल पहले दक्षिण-पश्चिम एशिया में इंसानों ने धीरे-धीरे जंगली पौधों को उगाना शुरू किया। गेहूं, जौ, दालों और फल देने वाले पौधों की देखभाल बढ़ने लगी। लंबे समय में यही बदलाव खेती और कृषि समाजों के विकास का आधार बना।
अब प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने खेती की शुरुआत को समझने के पुराने विचारों पर सवाल उठाया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती दौर में अनाज के दाने बड़े होने का कारण जरूरी नहीं कि इंसानों का चुनाव या पौधों में आनुवंशिक बदलाव हो। इसके बजाय, पानी और मौसम जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों ने दानों के आकार को प्रभावित किया हो सकता है।
बड़े दाने को माना जाता था खेती का संकेत
जंगली गेहूं और जौ के पौधों में आमतौर पर छोटे दाने होते हैं। इसके अलावा, उनके पौधे की एक संरचना, जिसे ‘रैचिस’ कहा जाता है, पकने के बाद आसानी से टूट जाती है। इससे जंगली पौधे के बीज जमीन पर गिर जाते हैं और प्राकृतिक रूप से फैलते हैं।
इंसानों के लिए यह व्यवस्था सुविधाजनक नहीं थी। खेती करने वालों के लिए ऐसे पौधे ज्यादा उपयोगी थे जिनके बीज पकने के बाद भी पौधे से जुड़े रहें। धीरे-धीरे ऐसे पौधों का चयन हुआ जिनमें मजबूत रैचिस था। यही बदलाव आगे चलकर घरेलू यानी पालतू फसलों की पहचान बना।
पुरातत्वविदों को शुरुआती नवपाषाण काल के कुछ स्थलों पर बड़े आकार के अनाज के दाने मिले थे। इसलिए लंबे समय से माना जाता रहा कि ये दाने इस बात का संकेत हैं कि इंसान उस समय बड़े दानों वाले पौधों का चयन कर रहे थे। लेकिन नई जांच इस तस्वीर को बदल रही है।
दो पुरातात्विक स्थलों से मिला सुराग
शोधकर्ताओं ने दक्षिणी लेवांत के दो महत्वपूर्ण स्थलों, एल-हेम्मेह और शरारा, से मिले अनाज का अध्ययन किया। यहां शुरुआती दौर में जौ और एमर गेहूं के पौधों में अभी भी जंगली पौधों जैसी विशेषताएं मौजूद थीं। इन पौधों में बीज गिराने वाली कमजोर रैचिस संरचना बनी हुई थी। इसका मतलब है कि उस समय तक इन फसलों में घरेलू पौधों की एक महत्वपूर्ण पहचान विकसित नहीं हुई थी।
फिर भी एक दिलचस्प बात सामने आई। एक ही जगह से मिले अनाज के दानों के आकार में काफी अंतर था। कुछ दाने बिल्कुल जंगली अनाज जैसे छोटे थे, जबकि कुछ दाने बाद में मिलने वाले घरेलू अनाज जितने बड़े थे।
पानी ने बढ़ाया दानों का आकार
वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने के लिए जले हुए अनाज के दानों में मौजूद स्थिर कार्बन समस्थानिकों का अध्ययन किया। पौधे जिस वातावरण में बढ़ते हैं, खासकर उन्हें कितना पानी मिलता है, उसका असर उनके कार्बन समस्थानिकों पर पड़ता है। अध्ययन में पाया गया कि बड़े जौ के दानों में ऐसे संकेत मिले जो बताते हैं कि वे अपेक्षाकृत अधिक नमी वाली परिस्थितियों में उगे थे। दूसरी ओर, छोटे दाने ज्यादा सूखी परिस्थितियों में उगे थे।
इससे वैज्ञानिकों को एक महत्वपूर्ण सुराग मिला। संभव है कि बड़े दाने इसलिए नहीं बने क्योंकि इंसानों ने जानबूझकर बड़े दानों वाले पौधों को चुना था। वे केवल इसलिए बड़े हुए क्योंकि उन्हें बढ़ने के लिए ज्यादा पानी मिला था।
आनुवंशिक बदलाव शायद बाद में आया
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस समय पौधों में दिखाई दे रहा बड़ा आकार ‘विकासात्मक लचीलापन’ यानी पर्यावरण के अनुसार पौधे की विशेषताओं में बदलाव का परिणाम हो सकता है। इसका मतलब है कि पौधे के जीन बदले बिना भी अच्छी परिस्थितियों में उसके दाने बड़े हो सकते हैं।
इस निष्कर्ष से खेती के शुरुआती इतिहास को समझने का तरीका बदल सकता है। संभव है कि बड़े दानों के लिए आनुवंशिक चयन बाद में शुरू हुआ हो। पहले इंसानों ने ऐसे पौधों को पसंद किया होगा जिनके बीज पकने के बाद भी पौधे से जुड़े रहते थे। इसके बाद बड़े और अधिक उपयोगी दानों के लिए चयन तेज हुआ होगा।
खेती अचानक शुरू नहीं हुई
इस अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि खेती और पौधों का घरेलूकरण अचानक शुरू हुई प्रक्रिया नहीं थी। यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई।
शुरुआती शिकारी-संग्रहकर्ता अपने आसपास के पौधों और जमीन का प्रबंधन करते थे। वे अपने पर्यावरण को बदलते और उसका उपयोग अपनी जरूरत के अनुसार करते थे। इसी लंबे संबंध ने आगे चलकर खेती के विकास के लिए परिस्थितियां तैयार कीं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस कहानी में इंसानों की भूमिका जरूर महत्वपूर्ण थी, लेकिन प्रकृति की भूमिका भी उतनी ही अहम थी। पानी, मिट्टी और मौसम ने पौधों के विकास को प्रभावित किया।
इसलिए किसी पुरातात्विक स्थल पर बड़े अनाज के दाने मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां उस समय घरेलू फसलों का विकास शुरू हो चुका था। कृषि की शुरुआत इंसान और प्रकृति के बीच लंबे और जटिल बदलावों का परिणाम थी।