समुद्र के खारे पानी में छिपा है लिथियम का खजाना, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक

90 फीसदी तक लिथियम निकालने में मिली सफलता, बैटरी उद्योग के लिए खुल सकती हैं नई राहें
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से करीब 90 प्रतिशत लिथियम निकालने की नई तकनीक विकसित की है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से करीब 90 प्रतिशत लिथियम निकालने की नई तकनीक विकसित की है।प्रतीकात्मक छवि, साभार आईस्टॉक
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सारांश
  • भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से करीब 90 प्रतिशत लिथियम निकालने की नई तकनीक विकसित की है।

  • नई तकनीक में सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट से मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे अवांछित तत्वों का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हटाया गया।

  • इस प्रक्रिया में एक लीटर समुद्री पानी के लिए केवल 100 मिलीलीटर विलायक इस्तेमाल हुआ, जिससे रसायनों की खपत घट सकती है।

  • वैज्ञानिकों ने पांच बार परीक्षण के दौरान करीब 90 प्रतिशत लिथियम रिकवरी बनाए रखी, जिससे विलायक के दोबारा उपयोग की संभावना बढ़ी।

  • यह तकनीक भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण के लिए लिथियम की उपलब्धता बढ़ा सकती है, लेकिन व्यावसायिक उपयोग से पहले परीक्षण जरूरी हैं।

दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अक्षय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। इन सबके पीछे एक बेहद अहम धातु है - लिथियम। इसे आधुनिक ऊर्जा व्यवस्था की रीढ़ भी कहा जाता है। लेकिन बढ़ती मांग के साथ लिथियम की आपूर्ति और इसके खनन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की चिंता भी बढ़ रही है। ऐसे में भारत के वैज्ञानिकों ने समुद्र के खारे पानी में छिपे इस कीमती खजाने को निकालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी रासायनिक तकनीक विकसित की है, जिससे प्राकृतिक समुद्री पानी में घुले लिथियम का करीब 90 प्रतिशत तक निकाला जा सकता है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में अतिरिक्त रासायनिक पदार्थों की जरूरत कम पड़ती है और विलायक का इस्तेमाल भी काफी कम मात्रा में किया जाता है। यह शोध टैलंटा नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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समुद्र में लिथियम का विशाल भंडार

समुद्र केवल मछलियों और समुद्री जीवों का घर नहीं है, बल्कि इसमें कई मूल्यवान खनिज भी घुले हुए हैं। दुनिया के महासागरों में लिथियम की कुल मात्रा अरबों टन होने का अनुमान है। हालांकि इतनी बड़ी मात्रा में मौजूद होने के बावजूद इसे निकालना आसान नहीं है।

समुद्री पानी में लिथियम की सांद्रता बहुत कम होती है। इसके मुकाबले मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे तत्व कहीं अधिक मात्रा में मौजूद रहते हैं। यही तत्व लिथियम को अलग करने की प्रक्रिया को कठिन बना देते हैं। अब तक कई तकनीकों में महंगे रसायनों, अधिक विलायक और जटिल प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ती रही है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से करीब 90 प्रतिशत लिथियम निकालने की नई तकनीक विकसित की है।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने समुद्री पानी से करीब 90 प्रतिशत लिथियम निकालने की नई तकनीक विकसित की है।स्रोत: टैलंटा पत्रिका
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पहले पानी की सफाई, फिर लिथियम की तलाश

नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने सबसे पहले समुद्री पानी को एक खास रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा। इसमें सोडियम हाइड्रॉक्साइड और सोडियम कार्बोनेट की मदद से पानी का पीएच स्तर क्रमशः बढ़ाया गया। इससे मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे अवांछित तत्वों को हटाने में मदद मिली।

शोध के अनुसार, इस प्रक्रिया में इन बाधा पैदा करने वाले तत्वों का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हटाया जा सका, जबकि लिथियम को काफी हद तक पानी में बनाए रखा गया। यह कदम बेहद अहम है, क्योंकि लिथियम को नुकसान पहुंचाए बिना दूसरे तत्वों को हटाना ही इस तकनीक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

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इसके बाद वैज्ञानिकों ने डाइबेंजोइलमीथेन नामक कार्बनिक पदार्थ को मिथाइल आइसोब्यूटाइल कीटोन यानी एमआईबीके नाम के विलायक में मिलाकर इस्तेमाल किया। इस मिश्रण ने लिथियम को अलग करने में मदद की।

कम विलायक में ज्यादा काम

इस तकनीक की एक खासियत इसका कम विलायक इस्तेमाल करना है। शोधकर्ताओं ने 0.1 का ऑर्गेनिक-टू-एक्वियस अनुपात हासिल किया। इसका मतलब है कि एक लीटर उपचारित पानी के लिए लगभग 100 मिलीलीटर कार्बनिक विलायक इस्तेमाल किया गया।

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पुरानी तकनीकों में अक्सर अतिरिक्त रसायनों की जरूरत पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है और रासायनिक कचरा भी पैदा होता है। नई व्यवस्था में एमआईबीके विलायक के साथ-साथ लिथियम से बने रासायनिक कॉम्प्लेक्स को स्थिर रखने में भी भूमिका निभाता है। इससे अलग से कुछ सहायक रसायन मिलाने की जरूरत कम हो जाती है।

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि पानी और विलायक को कितनी देर तक मिलाया जाता है, इसका परिणाम पर बड़ा असर पड़ता है। सही समय तक मिश्रण करने से लिथियम का निष्कर्षण बेहतर रहता है।

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पांच बार इस्तेमाल के बाद भी असरदार

लिथियम को विलायक से अलग करने के लिए पतले नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल किया गया। इस प्रक्रिया से लिथियम एक अलग घोल में पहुंच जाता है और कार्बनिक विलायक को दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा सकता है।

पांच चक्रों तक किए गए परीक्षणों में लिथियम की रिकवरी करीब 90 प्रतिशत बनी रही। इससे पता चलता है कि विलायक का पुनः उपयोग संभव है। हालांकि, हर चक्र में विलायक की लगभग 10 प्रतिशत मात्रा के भौतिक नुकसान की बात भी सामने आई है, जिसकी भरपाई करनी पड़ सकती है।

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प्रयोगशाला से उद्योग तक अभी बाकी है सफर

इस तकनीक की संभावनाएं बड़ी हैं, लेकिन इसे व्यावसायिक स्तर पर अपनाने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे। लंबे समय तक इस्तेमाल, ऊर्जा की खपत, रसायनों की लागत, समुद्री पर्यावरण पर असर और बड़े पैमाने पर उत्पादन की व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा। अधिक समय तक मिश्रण करने पर स्थायी झाग जैसी परतें बनने की समस्या भी सामने आ सकती है।

फिर भी, यह शोध भविष्य के लिए उम्मीद जगाता है। अगर इस तकनीक को बड़े पैमाने पर किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सका, तो समुद्र लिथियम का एक अतिरिक्त स्रोत बन सकता है। इससे पारंपरिक खनन पर दबाव कम करने और इलेक्ट्रिक वाहनों तथा ऊर्जा भंडारण के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

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समुद्र में छिपे इस खजाने तक पहुंचने की राह अभी लंबी है, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों का यह प्रयास दिखाता है कि स्वच्छ ऊर्जा का भविष्य केवल जमीन के नीचे ही नहीं, समुद्र की गहराइयों में भी तलाशा जा सकता है।

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