नई जिंक स्लरी बैटरी से बदलेगी सौर और पवन ऊर्जा भंडारण की तस्वीर

वैज्ञानिकों ने जिंक स्लरी आधारित नई फ्लो बैटरी विकसित की है, जो सौर और पवन ऊर्जा का लंबे समय तक सुरक्षित, सस्ता और प्रभावी भंडारण करने में सहायक होगी।
परीक्षण में बैटरी ने 99.94 प्रतिशत कूलॉम्बिक दक्षता हासिल की और 5,500 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी बेहतर प्रदर्शन किया।
परीक्षण में बैटरी ने 99.94 प्रतिशत कूलॉम्बिक दक्षता हासिल की और 5,500 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी बेहतर प्रदर्शन किया।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • वैज्ञानिकों ने जिंक स्लरी आधारित नई फ्लो बैटरी विकसित की, जो नवीकरणीय ऊर्जा के लंबे समय तक भंडारण में सहायक होगी।

  • नई बैटरी में जिंक के सूक्ष्म कण तरल माध्यम में बहते रहते हैं, जिससे ऊर्जा का संग्रहण और उपयोग अधिक प्रभावी बनता है।

  • परीक्षण में बैटरी ने 99.94 प्रतिशत कूलॉम्बिक दक्षता हासिल की और 5,500 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों के बाद भी बेहतर प्रदर्शन किया।

  • यह तकनीक सौर और पवन ऊर्जा की अनियमित उपलब्धता की समस्या कम कर बिजली आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय बना सकती है।

  • शोधकर्ता अब बड़े स्तर पर बैटरी विकसित कर इसकी क्षमता, सुरक्षा और व्यावसायिक उपयोग बढ़ाने पर काम कर रहे हैं।

दुनिया तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। सौर पैनल और पवन टरबाइन से बनने वाली बिजली का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। हालांकि इन स्रोतों से हर समय समान मात्रा में बिजली नहीं मिलती। धूप और हवा कम होने पर बिजली उत्पादन भी घट जाता है। ऐसे में अतिरिक्त बिजली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए बेहतर बैटरी की जरूरत है। इसी दिशा में चीन के वैज्ञानिकों ने एक नई जिंक स्लरी बैटरी विकसित की है, जो भविष्य में ऊर्जा भंडारण की बड़ी समस्या का समाधान बन सकती है।

पुराने सिस्टम से अलग है नई तकनीक

यह नई बैटरी चीन के फुदान विश्वविद्यालय और चीनी विज्ञान अकादमी के शोधकर्ताओं ने तैयार की है। इसका अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर एनर्जी में प्रकाशित हुआ है।

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सामान्य जिंक बैटरियों में जिंक धातु एक स्थिर इलेक्ट्रोड के रूप में लगी रहती है। बार-बार चार्ज और डिस्चार्ज होने के कारण यह धीरे-धीरे खराब होने लगती है, जिससे बैटरी की क्षमता कम हो जाती है। नई तकनीक में इस समस्या का अलग तरीके से समाधान किया गया है।

बहने वाली जिंक स्लरी पर आधारित है बैटरी

नई बैटरी में जिंक को एक जगह स्थिर रखने के बजाय उसके बेहद छोटे कणों को एक विशेष चालक तरल में मिलाकर स्लरी तैयार की गई है। यह स्लरी लगातार एक भंडारण टैंक और बैटरी सेल के बीच घूमती रहती है।

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चार्जिंग के दौरान जिंक आयन धातु जिंक में बदल जाते हैं और ऊर्जा सुरक्षित हो जाती है। वहीं, बिजली की जरूरत पड़ने पर यही प्रक्रिया उलटी दिशा में चलती है और बैटरी ऊर्जा वापस उपलब्ध करा देती है। चूंकि जिंक मिश्रण लगातार बहता रहता है, इसलिए इसे फ्लोइंग जिंक स्लरी बैटरी नाम दिया गया है।

तीन हिस्सों से बनी है मजबूत प्रणाली

शोधकर्ताओं ने इस बैटरी में तीन प्रमुख हिस्सों का उपयोग किया है। पहला, नैनो आकार के जिंक कण, जो ऊर्जा को संग्रहित करते हैं। दूसरा, खोखले कार्बन का एक विशेष ढांचा, जो बिजली के प्रवाह को बनाए रखता है। तीसरा, विशेष रासायनिक घोल, जो जिंक की सतह को सुरक्षित रखता है और अनचाही रासायनिक प्रतिक्रियाओं को रोकता है। इन तीनों की मदद से जिंक के कण आपस में चिपकते नहीं हैं। साथ ही बैटरी लंबे समय तक स्थिर और प्रभावी ढंग से काम करती रहती है।

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परीक्षण में मिला शानदार प्रदर्शन

शोधकर्ताओं के अनुसार, नई बैटरी ने शुरुआती परीक्षणों में बेहद अच्छे परिणाम दिए हैं। इसकी कूलॉम्बिक दक्षता 99.94 प्रतिशत रही। इसका मतलब है कि चार्ज करते समय दी गई लगभग पूरी ऊर्जा दोबारा प्राप्त की जा सकती है।

परीक्षण के दौरान बैटरी 5,128 घंटे तक लगातार संचालित होती रही। इसके अलावा जिंक-मैंगनीज डाइऑक्साइड बैटरी ने 5,500 बार चार्ज और डिस्चार्ज होने के बाद भी अपनी 81.1 प्रतिशत क्षमता बनाए रखी। यह दर्शाता है कि यह तकनीक लंबे समय तक उपयोग के लिए काफी टिकाऊ हो सकती है।

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नवीकरणीय ऊर्जा को मिलेगा बड़ा सहारा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अतिरिक्त सौर और पवन ऊर्जा को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके तो बिजली आपूर्ति अधिक भरोसेमंद बन सकती है। इससे कोयला, डीजल और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी। बिजली की मांग बढ़ने पर संग्रहीत ऊर्जा का आसानी से उपयोग किया जा सकेगा।

जिंक धातु की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह आसानी से उपलब्ध है, अपेक्षाकृत सस्ती है और सुरक्षित भी मानी जाती है। इसलिए बड़े स्तर पर ऊर्जा भंडारण के लिए यह तकनीक आर्थिक रूप से भी फायदेमंद साबित हो सकती है।

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अब बड़े स्तर पर होगा परीक्षण

शोधकर्ताओं का कहना है कि फिलहाल यह तकनीक प्रयोगशाला स्तर पर सफल रही है। अब उनका लक्ष्य इसे बड़े आकार की बैटरियों में विकसित करना है ताकि वास्तविक परिस्थितियों में इसकी क्षमता और विश्वसनीयता का परीक्षण किया जा सके।

इसके साथ ही वैज्ञानिक स्लरी की संरचना, रासायनिक प्रक्रिया और पूरे सिस्टम को और बेहतर बनाने पर भी काम करेंगे। इससे बैटरी की ऊर्जा क्षमता, सुरक्षा और कार्यक्षमता में और सुधार होने की उम्मीद है।

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यदि भविष्य में यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर सफल होती है, तो सौर और पवन ऊर्जा का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होगा। इससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा, बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर बनेगी और कार्बन उत्सर्जन कम करने के वैश्विक प्रयासों को भी नई मजबूती मिलेगी।

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