

मुजफ्फरनगर से दिल्ली तक पर्यावरण संरक्षण के नाम पर कागजी दावों और जमीन पर बनी हकीकत के बीच की खाई सामने आई है।
मुजफ्फरनगर में वर्षों से जमा कचरे के निपटान में लापरवाही पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर पर्यावरणीय मुआवजा वसूलने के निर्देश दिए हैं।
किदवई नगर साइट पर अब भी 2.08 लाख मीट्रिक टन से अधिक लीगेसी वेस्ट मौजूद है और ट्रिब्यूनल ने माना कि इसे हटाने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए।
वहीं दिल्ली के हस्तसाल गांव में मास्टर प्लान के तहत हरित क्षेत्र के लिए निर्धारित जमीन पर कथित अतिक्रमण का मामला एनजीटी पहुंचा है।
आरोप है कि आरक्षित जमीन पर कब्जा बढ़ाया जा रहा है और स्थायी ढांचे खड़े किए गए हैं।
6 अगस्त 2026 के दो अलग-अलग आदेशों में एनजीटी ने एक ओर कचरा प्रबंधन में जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर डीडीए से हरित क्षेत्र की जमीन की मौजूदा स्थिति और कथित अतिक्रमण पर जवाब मांगा।
दोनों मामले बताते हैं कि पर्यावरणीय नियमों की असली परीक्षा कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर होती है।
मुजफ्फरनगर में वर्षों से जमा कचरे का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। इसके बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने नगर पालिका परिषद के ढुलमुल रवैये को लेकर सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी 2024 से मुजफ्फरनगर में ठोस कचरे के अवैध निपटान और किदवई नगर स्थित कचरा निपटान संयंत्र की निगरानी कर रहा है।
हालांकि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद पुराने कचरे (लीगेसी वेस्ट) को हटाने के मामले में खास प्रगति नहीं हुई है। ऐसे में एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है।
6 अगस्त 2026 के अपने आदेश में एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को निर्देश दिया कि पुराने जमा कचरे के निपटान में लापरवाही बरतने और उसे साइट पर जमा होने देने के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ पर्यावरणीय मुआवजा (ईसी) वसूलने की उचित कार्रवाई की जाए।
हालांकि, एनजीटी ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए की जानी चाहिए।
दो साल बाद भी जस का तस कचरे का पहाड़
इस मामले में 3 जुलाई 2024 को एनजीटी ने नगर पालिका के दावे पर भी सवाल उठाए थे। उस समय नगर पालिका परिषद ने बताया था कि किदवई नगर साइट पर 2,24,655 मीट्रिक टन लीगेसी वेस्ट का वैज्ञानिक तरीके से निपटान किया जा चुका है और अब केवल 'कुछ मात्रा' में कचरा बचा है।
लेकिन सुनवाई के दौरान नगर पालिका के वकील ने बताया कि साइट पर करीब 5 लाख मीट्रिक टन लीगेसी वेस्ट अब भी पड़ा हुआ है। इस पर एनजीटी ने सवाल उठाया कि यदि इतनी बड़ी मात्रा में कचरा मौजूद था तो जवाब में केवल 'कुछ मात्रा'” शेष होने की भ्रामक जानकारी क्यों दी गई।
पीठ ने यह भी कहा था कि बचे हुए कचरे को हटाने और रोजाना निकलने वाले कचरे के उपचार एवं प्रसंस्करण के लिए नगर पालिका की ओर से कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है।
नगर पालिका के दावों पर एनजीटी ने उठाए सवाल
अब करीब दो साल बाद भी स्थिति बहुत नहीं बदली है। 29 अक्टूबर से 3 नवंबर 2024 के बीच किए सर्वे और आकलन के मुताबिक किदवई नगर कचरा निपटान संयंत्र में करीब 2,08,574.976 मीट्रिक टन लीगेसी वेस्ट मौजूद था। इसे हटाने की समयसीमा 30 अप्रैल 2028 तय की गई है।
एनजीटी ने हालिया सुनवाई में नगर पालिका परिषद द्वारा 3 अगस्त 2026 को पेश जवाबी हलफनामे पर भी सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि इसमें 3 नवंबर 2024 के बाद साइट पर जमा हुए लीगेसी वेस्ट की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि लीगेसी वेस्ट हटाने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं।
देखा जाए तो कचरे के इस पहाड़ की समस्या सिर्फ जमीन घेरने तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक खुले में पड़ा ठोस कचरा आसपास के पर्यावरण, मिट्टी, पानी और हवा पर भी दबाव डालता है। ऐसे में एनजीटी की सख्ती अब इस बात पर केंद्रित है कि जिम्मेदारी तय हो, पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई हो और वर्षों से जमा कचरे के निपटान की प्रक्रिया सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर भी दिखाई दे।
हस्तसाल: कागजों में ग्रीन एरिया, जमीन पर कब्जे का आरोप, एनजीटी ने डीडीए से मांगा जवाब
दिल्ली के उत्तम नगर स्थित हस्तसाल गांव में मास्टर प्लान के तहत हरित क्षेत्र के लिए निर्धारित जमीन पर कथित अतिक्रमण का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पहुंच गया है। 6 अगस्त 2026 को एनजीटी ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) से इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
आवेदक के मुताबिक, हस्तसाल गांव में खसरा संख्या 52/10, 52/11, 53/6 और 53/15 की जमीन मास्टर प्लान में हरित क्षेत्र के रूप में दर्ज है।
आवेदक के वकील ने एनजीटी के समक्ष मास्टर प्लान का हवाला देते हुए इस जमीन के ग्रीन एरिया के लिए आरक्षित होने का दावा किया। ट्रिब्यूनल को बताया गया कि यह जमीन अधिग्रहित की जा चुकी थी और एलएसी/एलएमडी विभाग, दिल्ली सरकार ने इसे डीडीए को सौंप दिया था। इसके बाद 15 मई 1970 को जमीन डीडीए के उद्यान विभाग को ट्रांसफर कर दी गई थी।
आवेदक की मुख्य शिकायत है कि इस जमीन के एक हिस्से पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है। आरोप है कि कब्जाधारी धीरे-धीरे अपना कब्जा बढ़ा रहे हैं और जमीन पर स्थाई ढांचे भी खड़े कर दिए गए हैं।
मामले में अब डीडीए का जवाब अहम होगा। एनजीटी के निर्देश के बाद यह स्पष्ट होना बाकी है कि हरित क्षेत्र के लिए निर्धारित इस जमीन की मौजूदा स्थिति क्या है और कथित अतिक्रमण के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है।