

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नर्मदा नदी के संरक्षण पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी संबंधित एजेंसियों को निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया है।
एनजीटी ने कहा कि नर्मदा के किनारे रहने वाली आबादी का जीवन इस नदी पर निर्भर है, इसलिए किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सुनवाई के दौरान संबंधित अधिकारियों ने एनजीटी को बताया कि जबलपुर के भेड़ाघाट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का कार्य 2023 में 100 फीसदी पूरा हो चुका है और यह प्लांट पूरी क्षमता पर काम कर रहा है।
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से उनके वकील ने बताया कि जबलपुर शहर में कुल 16 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जिनमें से 12 चालू हैं, जबकि शेष रखरखाव के दौर से गुजर रहे हैं।
हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने नर्मदा के किनारे डेयरियों द्वारा अतिक्रमण, बिना ट्रीट किए नदी में छोड़े जा रहे गंदे पानी और ठोस कचरे के सीधे नदी में डाले जाने का गंभीर मुद्दा भी उठाया है।
मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा के पुनर्जीवन को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी की केंद्रीय पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति शियो कुमार सिंह ने 28 जनवरी 2026 को कहा कि नर्मदा के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए जारी निर्देशों का पालन सभी संबंधित एजेंसियों को पूरी ईमानदारी से करना होगा।
नर्मदा के किनारे रहने वाली बड़ी आबादी का जीवन इस नदी पर निर्भर है, ऐसे में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
अधिकरण ने निर्देश दिया कि ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन हो रहा है या नहीं इसकी समीक्षा पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव (प्रिंसिपल सेक्रेटरी) हर तीन महीने में करें, ताकि जमीनी स्तर पर बेहतर परिणाम सामने आ सकें।
सुनवाई के दौरान संबंधित अधिकारियों ने एनजीटी को बताया कि जबलपुर के भेड़ाघाट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का कार्य 2023 में 100 फीसदी पूरा हो चुका है और यह प्लांट पूरी क्षमता पर काम कर रहा है। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से उनके वकील ने बताया कि जबलपुर शहर में कुल 16 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जिनमें से 12 चालू हैं, जबकि शेष रखरखाव के दौर से गुजर रहे हैं।
बोर्ड की ओर से यह भी बताया गया कि नदी के विभिन्न स्थानों से लिए गए जल के नमूनों की जांच की गई है और पानी की गुणवत्ता तय मानकों के भीतर पाई गई है।
नर्मदा पर आदेश, अब अमल की परीक्षा
हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने नर्मदा के किनारे डेयरियों द्वारा अतिक्रमण, बिना ट्रीट किए नदी में छोड़े जा रहे गंदे पानी और ठोस कचरे के सीधे नदी में डाले जाने का गंभीर मुद्दा भी उठाया है।
इस पर एनजीटी ने 1 सितंबर 2025 के अपने पूर्व आदेश (कीर्ति कुमार सदाशिव भट्ट बनाम नर्मदा जल संसाधन विभाग व अन्य) का हवाला देते हुए कहा कि सभी निर्देशों का अक्षरशः और भावना के अनुरूप पालन किया जाना चाहिए।
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि नर्मदा के तटवर्ती जिलों के जिलाधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि नदी की गुणवत्ता और प्रवाह बनाए रखा जाए, किसी भी स्थिति में बिना साफ किए गन्दा पानी या ठोस कचरा नदी में न जाए और नदी क्षेत्र में कोई अतिक्रमण न हो।
इसके साथ ही बाढ़ क्षेत्र (फ्लड जोन) के स्पष्ट सीमांकन के निर्देश भी अदालत द्वारा दिए गए हैं।
एनजीटी ने पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया है कि वे ट्रिब्यूनल द्वारा जारी सभी निर्देशों के अनुपालन की ताजा स्थिति से जुड़ी जानकारी एकत्र करें। इसमें संबंधित विभागों, विभिन्न एजेंसियों, नगर निगम आयुक्तों और जिलाधिकारियों द्वारा किए गए कार्यों का ब्यौरा शामिल होगा। यह समेकित रिपोर्ट तीन महीनों के भीतर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल के रजिस्ट्रार को सौंपनी होगी।
एनजीटी के इस अल्टीमेटम ने साफ कर दिया है कि नर्मदा के भविष्य पर किसी भी स्तर पर की गई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और कीमत जिम्मेदार अधिकारियों को चुकानी पड़ेगी।