बिहार: नदियों की बिगड़ती सेहत पर सरकार अलर्ट, सैदपुर से शुरू हुआ एक्शन

गंगा सहित अन्य नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर बिहार सरकार ने सख्ती दिखाते हुए सैदपुर एसटीपी मामले में जवाबदेही तय करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • बिहार से हरियाणा तक पर्यावरणीय लापरवाही पर अब न्यायिक सख्ती साफ नजर आ रही है। गंगा समेत नदियों की बिगड़ती सेहत पर बिहार सरकार ने सैदपुर एसटीपी से कार्रवाई की शुरुआत की है। सीवेज ट्रीटमेंट प्रोजेक्ट्स की जवाबदेही तय करते हुए प्रोजेक्ट डायरेक्टर्स से स्पष्टीकरण मांगा है। साथ ही सैदपुर एसटीपी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की सेवाएं समाप्त कर दी हैं।

  • गौरतलब है कि हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि बिहार की करीब-करीब सभी प्रमुख नदियां नहाने के लिए भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या तो बेहद कम हैं या फिर ठीक से काम नहीं कर रहे।

  • जानकारी मिली है कि बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सैदपुर एसटीपी में खामियों को लेकर तोशिबा वॉटर सॉल्यूशंस पर 1.096 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया था।

  • वहीं दूसरी तरफ झज्जर में सीमेंट फैक्ट्री से हो रहे प्रदूषण के मामले में एनजीटी का कड़ा रुख औद्योगिक इकाइयों को चेतावनी देता है कि नियमों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। दोनों मामलों का सार यही है: पर्यावरणीय उल्लंघनों पर अब सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि जवाबदेही और कार्रवाई का दौर शुरू हो चुका है, हालांकि असली कसौटी यही होगी कि क्या यह सख्ती जमीनी सुधार में बदलती है।

बिहार में गंगा और अन्य नदियों की बिगड़ती हालत को लेकर अब प्रशासन सख्त रुख में नजर आ रहा है। राज्य सरकार ने ऑपरेशन और मेंटेनेंस के तहत चल रहे सीवेज ट्रीटमेंट प्रोजेक्ट्स की जवाबदेही तय करते हुए प्रोजेक्ट डायरेक्टर्स से स्पष्टीकरण मांगा है।

इसके साथ ही सैदपुर एसटीपी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। साथ ही, इस परियोजना से जुड़े ठेकेदार तोशिबा वॉटर सॉल्यूशंस से भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। यह जानकारी राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) द्वारा 11 अप्रैल 2026 को दायर जवाब में सामने आई है। इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया है।

दरअसल, 26 फरवरी 2024 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि बिहार की करीब-करीब सभी प्रमुख नदियां नहाने के लिए भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या तो बेहद कम हैं या फिर ठीक से काम नहीं कर रहे।

कई जगहों पर पानी की गुणवत्ता न सिर्फ मानकों से खराब है, बल्कि फीकल कॉलीफॉर्म के बढ़ते स्तर के कारण नहाने के मानकों को भी पूरे नहीं कर रही।

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राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने अपनी पिछली रिपोर्ट में एनजीटी को की गई कार्रवाई की जानकारी दी थी। साथ ही एनएमसीजी द्वारा 29 जनवरी, 2025 को बिहार के शहरी आवास विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, बिहार अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर और बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (बीएसपीसीबी) के मेंबर सेक्रेटरी को जारी किए गए निर्देशों के बारे में जानकारी दी थी।

तोशिबा वॉटर सॉल्यूशंस पर लगाया गया है 1.096 करोड़ का जुर्माना

इन निर्देशों के बाद बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सैदपुर एसटीपी में खामियों को लेकर तोशिबा वॉटर सॉल्यूशंस पर 1.096 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया था। यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि प्लांट से निकलने वाला पानी तय मानकों पर खरा नहीं उतर रहा था।

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देखा जाए तो गंगा की सफाई महज योजनाओं और बैठकों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने और सख्त कार्रवाई से ही संभव है।

हालांकि सैदपुर एसटीपी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर पर गिरी गाज इस बात का संकेत है कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन असली चुनौती यह है कि क्या ये सख्ती जमीनी बदलाव ला पाएगी, या नदियां यूं ही प्रदूषण का बोझ उठाती रहेंगी?

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झज्जर में प्रदूषण का ‘सीमेंट कनेक्शन’: एनजीटी ने जेके सीमेंट से मांगा जवाब

हरियाणा में झज्जर जिले के झारली गांव में सीमेंट फैक्ट्री से हो रहे प्रदूषण के मामले ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 16 अप्रैल 2026 को इस मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों और जेके सीमेंट वर्क्स को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

इन सभी से अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले अपना पक्ष रखने को कहा गया है। इस मामले में अगली सुनवाई 3 अगस्त 2026 को होनी है।

यह याचिका गांव के एक स्थानीय निवासी द्वारा दायर की गई है, जिसने फैक्ट्री पर पर्यावरणीय नियमों के गंभीर उल्लंघन के आरोप लगाए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, रेड कैटेगरी में आने वाली यह औद्योगिक इकाई लगातार हवा और पानी को प्रदूषित कर रही है। सीमेंट धूल के बेकाबू उत्सर्जन से आसपास के इलाकों में सांस लेना मुश्किल हो गया है।

इसके अलावा, आवेदक के वकील ने सुनवाई के दौरान यह भी आरोप लगाया है कि सीमेंट इंडस्ट्री ने प्रदूषण की वास्तविक स्थिति छिपाने के लिए घने पेड़ों के पास एयर सैंपलर लगाए हैं, जिससे रीडिंग कम दिखाई दे।

क्या कुछ लगे हैं आरोप

कोर्ट को बताया गया कि आवेदक ने एक प्राइवेट सोर्स से सैंपल का विश्लेषण करवाया था, जिसमें कहा गया है कि वहां वायु गुणवत्ता इंडस्ट्री के आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक खराब पाई गई है।

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यह भी आरोप है कि फैक्ट्री परिसर में कच्चा माल खुले में रखा जाता है, जिससे धूल लगातार उड़ती रहती है। इसके अलावा कच्चा माल खुले ट्रकों में ले जाया जाता है, वहां पक्की सड़कें नहीं हैं, नतीजन आसपास के खेतों पर गिरती धूल ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

गौरतलब है कि हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी) ने इस फैक्ट्री को पहले ही दो बार कारण बताओ नोटिस जारी कर चुका है, लेकिन उसपर भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

देखा जाए तो यह मामला महज एक गांव की परेशानी से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह औद्योगिक लापरवाही और पर्यावरणीय निगरानी की कमजोरियों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब सबकी नजरें एनजीटी की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, अब देखना यह है कि क्या प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी, या यह मामला कागजों में सिमट कर रह जाएगा?

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