मार्बल स्लरी पर एनजीटी की सख्ती, मिट्टी-पानी को बचाने के लिए दिए सख्त निर्देश

मार्बल स्लरी के अवैज्ञानिक निपटान से मिट्टी, पानी और लोगों की सेहत पर बढ़ते खतरे को देखते हुए एनजीटी ने सख्त कदम उठाए हैं
मार्बल स्लरी पर एनजीटी की सख्ती, मिट्टी-पानी को बचाने के लिए दिए सख्त निर्देश
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सारांश
  • मार्बल और ग्रेनाइट उद्योग से निकलने वाली स्लरी के अवैज्ञानिक निपटान से मिट्टी, पानी और लोगों की सेहत पर बढ़ते खतरे को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।

  • ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया है कि स्लरी के सुरक्षित उपयोग से जुड़े दिशा-निर्देश तुरंत सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को भेजे जाएं और तीन महीने के भीतर इसकी निगरानी के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए।

  • एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी मार्बल और ग्रेनाइट प्रोसेसिंग इकाइयों को संचालन से पहले पर्यावरणीय अनुमति और स्लरी के सुरक्षित निपटान की ठोस योजना पेश करनी होगी, अन्यथा उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

  • यह आदेश आंध्र प्रदेश में कृषि भूमि पर हो रही मार्बल स्लरी की अवैज्ञानिक डंपिंग से पैदा हो रहे प्रदूषण और खेती व स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को देखते हुए दिया गया है।

देश में मार्बल और ग्रेनाइट उद्योग से निकलने वाले स्लरी (पत्थर की धूल और कीचड़) के अनियंत्रित निपटान पर अब सख्ती शुरू हो गई है।

27 फरवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को निर्देश दिया कि मार्बल और ग्रेनाइट प्रोसेसिंग यूनिट्स से निकलने वाली स्लरी के उपयोग के लिए तैयार दिशा-निर्देशों को तुरंत सभी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) को भेजा जाए।

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इन दिशा-निर्देशों का मकसद यह है कि स्लरी को जमीन या निचले इलाकों में बिना नियंत्रण के फेंकने पर रोक लगाई जा सके।

तीन महीने में ऑनलाइन पोर्टल अनिवार्य

एनजीटी ने कहा है कि हर एसपीसीबी और पीसीसी को तीन महीने के भीतर एक ऑनलाइन पोर्टल तैयार करना होगा। यह पोर्टल स्लरी से जुड़े डाटा प्रबंधन और निगरानी के लिए होगा, ताकि कहीं भी अवैज्ञानिक तरीके से इसका ढेर न लगाया जा सके।

जब तक यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं होती, तब तक देश की सभी मौजूदा मार्बल और ग्रेनाइट प्रोसेसिंग यूनिट्स को वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1981 और जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1974 के नियमों के तहत ‘स्थापना की सहमति’ और ‘संचालन की सहमति’ संबंधित बोर्ड से लेनी होगी।

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साथ ही, किसी भी इकाई को अनुमति देने से पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वह अपनी स्लरी के सुरक्षित उपयोग या निपटान की स्पष्ट योजना प्रस्तुत करे। जिन इकाइयों ने अब तक अनुमति के लिए आवेदन नहीं किया है, उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

आंध्र प्रदेश में बिगड़ते हालात

गौरतलब है कि यह मामला आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले से जुड़ा है, जहां हरिचंद्रपुरम रेलवे स्टेशन के पास कृषि भूमि पर मार्बल स्लरी की बिना वैज्ञानिक तरीके से डंपिंग की जा रही है। यह पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहा है।

निम्माडा, पेड्डाबम्मिडी और येत्तुराल्लापाडु में मार्बल पॉलिशिंग यूनिट्स मार्बल स्लरी बना रही हैं। तंदूर में लगभग 700 पत्थर काटने और पॉलिश करने वाली यूनिट्स हैं, जिन्हें इंडस्ट्रियल एरिया में शिफ्ट कर दिया गया है।

मार्बल स्लरी की डंपिंग का बुरा असर एयर पॉल्यूशन हो रहा है, जिससे मिट्टी में खारापन बढ़ने, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी और पानी के कम रिसने की वजह से इलाके की खेती की ज़मीन के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी असर पड़ रहा है।

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निम्माडा, पेद्दाबम्मिडी और येत्तुरल्लापाडु में स्थित मार्बल पॉलिशिंग इकाइयों से बड़ी मात्रा में स्लरी निकल रही है। वहीं तंदूर में करीब 700 पत्थर काटने और पॉलिशिंग इकाइयां औद्योगिक क्षेत्र में चल रही हैं।

इनसे मिट्टी और पानी और सेहत पर खतरा बढ़ने लगा है। मिट्टी में खारापन बढ़ने, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी और पानी के कम रिसने की वजह से इलाके में कृषि भूमि के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी असर पड़ने लगा है। मार्बल स्लरी के खुले में ढेर लगाने से कई तरह के नुकसान सामने आ रहे हैं। इससे हवा में प्रदूषण बढ़ रहा है। लोगों में सांस और अन्य बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है।

ऐसे में एनजीटी के ताजा आदेश से उम्मीद है कि अब स्लरी के निपटान पर निगरानी कड़ी होगी और पर्यावरण व किसानों को राहत मिलेगी।

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