

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के थुनाग में जून-जुलाई 2025 में आई विनाशकारी बाढ़ सिर्फ बादल फटने और भारी बारिश का नतीजा नहीं थी। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने दिखाया है कि नदी के प्राकृतिक रास्ते और बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण, बेतरतीब निर्माण और पहाड़ी भूगोल ने आपदा की मार को और बढ़ा दिया।
नदी के बेहद करीब बनी इमारतें सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं, जबकि कुछ दूरी और ऊंचाई पर स्थित कई कमजोर मकान भी सुरक्षित बच गए।
बाढ़ से पहले ही थुनाग में 85.2 मिलीमीटर बारिश हो चुकी थी और 30 जून तथा 1 जुलाई को क्रमशः 119.4 और 216.8 मिलीमीटर बारिश ने हालात बिगाड़ दिए। तेज बारिश के बाद महज 30 से 60 मिनट में पानी तेजी से फैल गया।
अध्ययन के मुताबिक 205 इमारतें बाढ़ की चपेट में आईं और मॉडल ने नुकसान का 95.34 फीसदी सटीक आकलन किया। घरों, दुकानों, सड़कों, खेतों और पशुशालाओं को भारी नुकसान हुआ और थुनाग में प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान 6.2 से 7.8 करोड़ रुपये आंका गया।
अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश साफ है—बादल फटना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन नदी के रास्ते में निर्माण करना या न करना हमारे हाथ में जरूर है।
हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले के थुनाग में पिछले साल बादल फटने से अचानक आई बाढ़ सिर्फ तेज बारिश का नतीजा नहीं थी। नदी के प्राकृतिक रास्ते में अतिक्रमण, बेतरतीब निर्माण और पहाड़ी भूगोल ने इस आपदा को और विनाशकारी बना दिया था।
इस बारे में भारतीय शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि जिन घरों और इमारतों का निर्माण नदी के बेहद करीब किया गया था, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जबकि थोड़ी ऊंचाई पर स्थित कई इमारतें काफी हद तक सुरक्षित रहीं।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड रेजिलिएंस ने 29 जून से 1 जुलाई 2025 के बीच थुनाग में बादल फटने से उत्पन्न बाढ़ का विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल जियोमैटिक्स, नेचुरल हैजर्डस एंड रिस्क में प्रकाशित हुए हैं।
इस अध्ययन में शोधकर्ता महेश शर्मा के साथ-साथ दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सायंतन मंडल और इम्पीरियल कॉलेज ऑफ लंदन से जुड़े शोधकर्ता शुभम अवस्थी शामिल थे।
क्या पहाड़ों पर बढ़ती आपदाओं के लिए सिर्फ प्रकृति जिम्मेदार है?
स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि थुनाग में नदी के प्राकृतिक गलियारे में घरों और व्यावसायिक इमारतों के साथ-साथ रिटेनिंग वॉल और सड़क तटबंध बनाए गए हैं। इन कृत्रिम रुकावटों ने बादल फटने के बाद आए पानी के बहाव का रास्ता संकरा कर दिया।
नतीजन पानी की गहराई और रफ्तार दोनों बढ़ गईं। तेज बहाव ने नदी के किनारों को काटते हुए अपने रास्ते में आने वाली संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।
सबसे अहम बात यह रही कि इमारत कितनी मजबूत थी, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि वह नदी के बहाव के कितनी करीब थी। नदी के बिल्कुल किनारे बनी इमारतों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जबकि कुछ दूरी और ऊंचाई पर बने कच्चे मकान भी सुरक्षित बच गए।
पहले से भीगी थी जमीन, फिर बरसा आसमान
रिपोर्ट से पता चला है कि बाढ़ आने से पहले 26 से 29 जून के बीच थुनाग में करीब 85.2 मिलीमीटर बारिश हो चुकी थी। यानी जमीन पहले ही काफी गीली थी और उसमें अतिरिक्त पानी सोखने की क्षमता घट चुकी थी।
इसके बाद 30 जून को एक ही दिन में 119.4 मिलीमीटर बारिश हुई। अगले दिन यानी 1 जुलाई को बारिश बढ़कर 216.8 मिलीमीटर तक पहुंच गई। इस तरह दो दिनों में करीब 336.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई। अध्ययन के मुताबिक, यही लगातार और तेज बारिश बाढ़ के लिए बेहद खतरनाक साबित हुई।
सीधी भाषा में समझें तो पहाड़ पहले से ही पानी से भरे थे और फिर थोड़े समय में इतनी ज्यादा बारिश हुई कि पानी के पास नीचे उतरने और बहने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
कुछ ही मिनटों में बदल गया पूरा मंजर
कंप्यूटर मॉडल की मदद से किए अध्ययन से पता चला कि तेज बारिश का पानी पहाड़ी ढलानों से तेजी से नीचे आया और नालों तथा नदी में जमा होने लगा। बाढ़ का फैलाव बहुत तेज था।
बारिश के चरम के बाद शुरुआती 30 से 60 मिनट में ही पानी तेजी से फैल गया। ऐसे में जहां नदी का रास्ता संकरा था या निर्माण के कारण पानी के बहने की जगह कम हो गई थी, वहां पानी की गहराई और बहाव की ताकत दोनों बढ़ गईं। कई जगह पानी की गहराई कई मीटर तक पहुंच गई थी।
205 इमारतें डूबीं, मॉडल ने 95.34 नुकसान को सही पहचाना
अध्ययन में सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों, जमीनी आंकड़ों और बाढ़ के कंप्यूटर मॉडल को मिलाकर इमारतों पर पड़े असर का आकलन किया है। मॉडल के अनुसार इस दौरान 205 इमारतें बाढ़ की चपेट में आईं। इनमें 160 पक्के और 55 कच्चे या मिले-जुले मकान शामिल थे। मॉडल के अनुमान की सरकारी पोस्ट-डिजास्टर सर्वे से तुलना करने पर 95.34 फीसदी की सटीकता मिली।
अध्ययन के मुताबिक, इन सभी प्रत्यक्ष नुकसानों को मिलाकर थुनाग में आर्थिक नुकसान करीब 6.2 से 7.8 करोड़ रुपए रहा। यह केवल प्रत्यक्ष और आसानी से दर्ज किए जा सकने वाले नुकसान का अनुमान है। हालांकि वास्तविक नुकसान इससे ज्यादा हो सकता है।
हिमालय नीति अभियान के आकलन के अनुसार हिमाचल के सराज क्षेत्र में 30 जून 2025 की रात हुई भारी बारिश के बाद पूरे सराज में करीब 500 करोड़ रुपए की निजी व सरकारी सम्पतियों का नुकसान पहुंचा है। वहीं केवल थुनाग में 100 से 150 करोड़ रुपए का अनुमानित नुकसान हुआ है l
सवाल सिर्फ बादल फटने का नहीं, विकास के तरीके का भी है
यह रिपोर्ट थुनाग के पहाड़ों इलाकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। भले ही भारी बारिश और बादल फटना प्राकृतिक घटनाएं हैं।
लेकिन उनका असर कितना विनाशकारी होगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि हमने नदियों और नालों के आसपास कितना निर्माण किया है, पानी को बहने के लिए कितनी जगह छोड़ी है और पहाड़ी ढलानों के साथ कितनी छेड़छाड़ की है।
खास बात यह है कि सरकारी नुकसान के आंकड़ों का इस्तेमाल मॉडल को पहले से सही करने के लिए नहीं किया गया। मॉडल तैयार होने के बाद वास्तविक नुकसान के आंकड़ों से उसका मिलान किया गया।
बाढ़ ने घरों के साथ-साथ दुकानों, मवेशियों के रहने की जगह, सड़कों, पुलों, पानी की पाइपलाइनों और खेतों को भी नुकसान पहुंचाया। अध्ययन में करीब 63 मवेशियों के मारे जाने और मवेशियों के करीब 47 शेड के नष्ट होने का उल्लेख है। बाजार में करीब 14 दुकानें पूरी तरह नष्ट हो गई। खेतों में मिट्टी का कटाव हुआ और साथ ही फसलें भी प्रभावित हुईं थी।
कितना सही है पहाड़ों पर बढ़ता इंसानी दखल
अध्ययन साफ तौर पर दर्शाता है कि भारी बारिश बाढ़ का मुख्य कारण थी, लेकिन नदी का संकरा होना और बाढ़ क्षेत्र में मानवीय दखल नुकसान बढ़ने के प्रमुख कारण थे।
अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उपग्रह आधारित हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग का एक ऐसा ढांचा भी विकसित किया है, जिसका इस्तेमाल हिमालय के उन दुर्गम इलाकों में बाढ़ के जोखिम का आकलन करने में किया जा सकता है, जहां जमीनी स्तर पर पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं होते।
हालांकि भले ही यह मॉडल कितने सटीक हों, लेकिन इस सचाई को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वैज्ञानिक तकनीकें तब तक बेअसर रहेंगी जब तक हम पहाड़ों के साथ जीना नहीं सीखेंगे।
पहाड़ों के लिए बड़ा सबक
थुनाग की यह तबाही हमें याद दिलाती है कि पहाड़ों में नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं है। नदी का अपना रास्ता और अपना क्षेत्र है। जब उस रास्ते पर घर, सड़कें और दूसरी संरचनाएं खड़ी कर दी जाती हैं, तो आपदा के समय वही निर्माण सबसे बड़ी कमजोरी बन सकते हैं।
इसलिए भविष्य की योजनाओं में नदी के प्राकृतिक रास्ते और बाढ़ क्षेत्र को खाली रखना, निर्माण पर सख्ती, सुरक्षित जगहों पर बस्तियों का विकास और बाढ़ की पहले से चेतावनी देने वाली व्यवस्था जरूरी है। क्योंकि बादल फटना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन बाढ़ के रास्ते में निर्माण करना या न करना हमारे हाथ में जरूर है।