चंबल अभ्यारण्य में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, राजस्थान-मध्य प्रदेश के अफसर तलब

अदालत ने चंबल नदी पर बने उस पुल को लेकर भी चिंता जताई है, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश को जोड़ता है। लगातार अवैध खनन से पुल की संरचना और सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
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सारांश
  • राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य में जारी बेकाबू अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब महज कागजी कार्रवाई नहीं चलेगी, अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर बताना होगा कि रेत माफिया पर रोक लगाने के लिए जमीन पर क्या कार्रवाई हुई।

  • इस मामले में कोर्ट ने राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) सहित पांच प्रमुख सचिवों और मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव को 20 मई 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।

  • इन अधिकारियों को बिना रजिस्ट्रेशन वाले वाहनों पर कार्रवाई, दोषी अफसरों पर एक्शन और पिछली गाइडलाइंस के पालन की तय समयसीमा का विस्तृत हलफनामा देना होगा।

  • इसके साथ ही, दोनों राज्यों को जोड़ने वाले चंबल नदी के पुल की सुरक्षा पर मंडराते खतरे को देखते हुए कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को भी पक्षकार बनाया है। प्राधिकरण से पूछा गया है कि पुल की मजबूती के लिए क्या कदम उठाए गए और अवैध परिवहन पर रियल-टाइम निगरानी के लिए वहां सीसीटीवी कैमरे क्यों न लगाए जाएं?

  • सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई दिखाती है कि चंबल में अवैध खनन अब सिर्फ पर्यावरणीय नुकसान का मामला नहीं रहा, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण, बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर प्रश्न बन चुका है।

राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य में चल रहे अवैध रेत खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में राजस्थान और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों को आड़े हाथों लेते हुए उन्हें 20 मई 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने 14 मई, 2026 को साफ कहा कि अब महज कागजी दावों से काम नहीं चलेगा, अफसरों को हलफनामे के साथ खुद जवाब देना होगा।

इस मामले में अदालत ने राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह विभाग), प्रमुख सचिव (खनन एवं भूविज्ञान विभाग), प्रमुख सचिव (वित्त विभाग), प्रमुख सचिव (वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग), प्रमुख सचिव (परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग) को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

अब कागजी जवाब नहीं, अफसरों को कोर्ट में होना होगा पेश

हलफनामे में यह बताना होगा कि 2 अप्रैल, 17 अप्रैल के पिछले आदेशों के बाद अब तक क्या कार्रवाई हुई और बाकी बचे कदमों को कब तक पूरा कर लिया जाएगा।

अदालत ने मध्य प्रदेश के परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को भी निजी तौर पर पेश होने का निर्देश दिया है। उनसे पूछा गया है कि अवैध खनन और रेत ढुलाई में इस्तेमाल हो रहे बिना पंजीकरण वाले वाहनों की पहचान और रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

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उनसे इस बात की भी जानकारी मांगी गई है कि मोटर वाहन अधिनियम (1988) के नियमों को कितना सख्ती से लागू किया गया? साथ ही दोषी अधिकारियों और नियमों को तोड़ने वालों पर अब तक क्या एक्शन लिया गया है? अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि सुधारात्मक कदम और रोकथाम के उपाय किस तय समयसीमा के भीतर लागू किए जाएंगे।

इस मामले में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को भी पक्षकार बनाया गया है। अदालत ने चंबल नदी पर बने उस पुल को लेकर भी चिंता जताई है, जो राजस्थान और मध्य प्रदेश को जोड़ता है। लगातार अवैध खनन से पुल की संरचना और सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है।

एनएचएआई से पूछा: पुल की सुरक्षा के लिए क्या किया?

एनएचएआई को अगली सुनवाई से पहले एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। इसमें बताना होगा कि चंबल नदी पर बने पुल की मजबूती और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं या आगे क्या उपाय किए जाएंगे। अदालत ने यह जानकारी पुल के आसपास जारी अवैध खनन गतिविधियों को देखते हुए मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट ने एनएचएआई से पूछा है कि पुल और उसके आसपास निगरानी के लिए सीसीटीवी क्यों नहीं लगाए जाएं, ताकि अवैध खनन और रेत ढुलाई पर रियल-टाइम में नजर रखी जा सके। एनएचएआई को इसका भी जवाब हलफनामे में देना होगा।

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13 मार्च, 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर अवैध रेत खनन से होने वाले खतरे पर स्वतः संज्ञान लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर है कि घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास से हटा कर अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित किया गया लेकिन अंततः उनका स्थानांतरित किया गया क्षेत्र भी रेत माफिया द्वारा प्रभावित हो गया।

गौरतलब है कि चंबल महज एक नदी नहीं, बल्कि घड़ियाल, डॉल्फिन और कई दुर्लभ जीवों का घर है। इसके किनारों पर हो रहा बेकाबू रेत खनन न केवल नदी की धारा और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि पुलों और आसपास के ढांचे के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती दिखाती है कि अब चंबल में रेत माफिया पर शिकंजा कसने की मांग सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि कानून और सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा भी बन चुकी है।

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