राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन उजाड़ रहे घड़ियालों का प्राकृतिक आवास, सुप्रीम कोर्ट ने लिया मामले का स्वतः संज्ञान

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और राज्य सरकारों को ठोस कार्रवाई के आदेश दिए हैं
चंबल नदी के नजदीक बसे मुरैना के अटार गांव के पास बीहड़ों में मिट्टी का भारी कटाव हो रहा है। इस कटाव को रोकने के लिए बनाए गए चेकडैम असफल साबित हो रहे हैं
चंबल नदी के नजदीक बसे मुरैना के अटार गांव के पास बीहड़ों में मिट्टी का भारी कटाव हो रहा है। इस कटाव को रोकने के लिए बनाए गए चेकडैम असफल साबित हो रहे हैं
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राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन के कारण दुर्लभ प्रजाति और खतरे में माने जाने वाले घड़ियालों के प्राकृतिक आवासों की क्षति वाली रिपोर्ट्स पर गौर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया है।

चंबल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं में मौजूद है। यहां खासतौर से घड़ियालों का प्रजनन स्थल मौजूद है।

13 मार्च, 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर अवैध रेत खनन से होने वाले खतरे पर स्वतः संज्ञान लिया है।

अदालत ने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर है कि घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास से हटा कर अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित किया गया लेकिन अंततः उनका स्थानांतरित किया गया क्षेत्र भी रेत माफिया द्वारा प्रभावित हो गया। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा घड़ियालों को स्थानांतरित किया गया था।

सामाजिक और पर्यावरण रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है कि अवैध रेत खनन न केवल रेत पर अंडे देने वाली प्रजातियों के आवास को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि नदी के स्वरूप और जल धारण क्षमता को भी प्रभावित कर रहा है।

अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, रेत खनन गतिविधियां संगठित और योजनाबद्ध हैं। अधिकांश खनन ट्रैक्टर-ट्रॉली से नदी के तल से रेत निकाल कर आसपास के खेतों में डंप की जाती है और फिर ट्रकों के माध्यम से अन्य स्थानों पर भेजी जाती है। रेत माफिया ऐसे वाहनों का प्रयोग करते हैं जिनके पंजीकरण नंबर नहीं दिखते, जिससे वन विभाग अपराधियों को पकड़ने में असमर्थ रहता है।

अभयारण्य में जलस्तर कम होने और वर्षा की कमी के कारण नदी के रेत के किनारे पूरे वर्ष खुला रहता है, जिससे माफिया सालभर अवैध खनन कर पाते हैं।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य लगभग 1800 किमी क्षेत्र में फैला है और यह भारत का पहला और एकमात्र त्रि-राज्यीय नदीय संरक्षित क्षेत्र है। मध्य प्रदेश में यह अभयारण्य 20 दिसंबर 1978 को घोषित किया गया था।

घड़ियालों के अलावा, यहां कई प्रजातियों के जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनमें मर्स मगर, कई प्रकार के मीठे पानी के कछुए, स्मूथकोटेड ओटर्स, गंगेटिक नदी डॉल्फिन, इंडियन स्किमर, ब्लैक-बैली टर्न, सारस क्रेन और ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस क्षेत्र में अवैध रेत खनन पर निगरानी और कार्रवाई के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित राज्य सरकारों को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया है।

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