

देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए दो मामलों ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और पर्यावरण-सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच टकराव को उजागर कर दिया है।
नवी मुंबई के खारघर स्थित कैंसर संस्थान ने एनजीटी में दाखिल रिपोर्ट में आरोप लगाया है कि अस्पताल के आसपास जारी पत्थर खनन और ब्लास्टिंग से इमारतों में दरारें पड़ रही हैं, अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण प्रभावित हो रहे हैं और धूल के कारण कैंसर मरीजों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
संस्थान ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति मरीजों की सुरक्षा और इलाज की गुणवत्ता दोनों को जोखिम में डाल रही है।
वहीं, ओडिशा के कोरापुट स्थित बल्लाडा बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर भी विवाद गहरा गया है। एनजीटी की पूर्वी पीठ ने परियोजना को मिली वन एवं पर्यावरणीय मंजूरियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए फिलहाल एकतरफा रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि खनन क्षेत्र की जैव विविधता का सही आकलन नहीं किया गया, संकटग्रस्त वन्यजीवों की मौजूदगी छिपाई गई और वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी कर मंजूरियां दी गईं। दोनों मामले इस सवाल को सामने लाते हैं कि विकास की कीमत आखिर पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से कितनी वसूली जा सकती है।
नवी मुंबई के खारघर स्थित एडवांस्ड सेंटर फॉर ट्रीटमेंट, रिसर्च एंड एजुकेशन इन कैंसर (एक्ट्रेक) ने 1 जून, 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सौंपी अपनी ताजा रिपोर्ट में संस्थान के आसपास चल रही पत्थर खनन गतिविधियों पर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक खदानों में विस्फोट से पैदा होने वाले कंपन परिसर की इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अनियंत्रित खनन से उठने वाली धूल अक्सर तय मानकों से कहीं अधिक होती है। यह जहरीली हवा वहां तैनात डॉक्टरों और स्टाफ के लिए तो खतरनाक है ही, साथ ही कीमोथेरेपी करा रहे उन कैंसर मरीजों के फेफड़ों के लिए जानलेवा साबित हो रही है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से बेहद कमजोर होती है।
एक्ट्रेक ने चेतावनी दी है कि अस्पताल में मौजूद अत्याधुनिक और बेहद संवेदनशील चिकित्सा उपकरण जैसे प्रोटॉन बीम थेरेपी और रेडियोथेरेपी एक्सीलरेटर को सुचारू रूप से चलाने के लिए पूरी तरह कंपन-मुक्त वातावरण की जरूरत होती है। लगातार होने वाले ये धमाके इन मशीनों की सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।
इस रिपोर्ट के साथ संस्थान ने जुलाई 2025 की एक 'स्ट्रक्चरल ऑडिट रिपोर्ट' भी सबमिट की है, जो इन दावों को और पुख्ता करती है। इसमें आसपास की इमारतों को हुए नुकसान का भी जिक्र है। ऑडिट के मुताबिक, पहाड़ियों के सबसे करीब स्थित 'पारिजात बिल्डिंग' इस अंधाधुंध ब्लास्टिंग का सबसे पहला शिकार बनी है।
लगातार होने वाले कंपन और शॉक वेव्स के कारण इस इमारत की आंतरिक दीवारों में गहरी दरारें आ चुकी हैं, फर्श अंदर से खोखले होकर उखड़ रहे हैं, छतों का प्लास्टर गिर रहा है और बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा है। साथ ही नींव में भी कमजोरी के संकेत दिखाई देने लगे हैं।
यह मामला सिर्फ पर्यावरण से जुड़े नियमों के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर देश के एक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान के अस्तित्व और हजारों कैंसर पीड़ितों की जिंदगी से जुड़ा है। जब अस्पताल की मजबूत इमारतें और अत्याधुनिक मशीनें ही इस ब्लास्टिंग से सुरक्षित नहीं हैं, तो वहां जिंदगी की जंग लड़ रहे मरीजों का भविष्य क्या होगा? एनजीटी की आगामी कार्रवाई ही अब यह तय करेगी कि विकास की इस अंधी दौड़ में इंसानी जान की कीमत कितनी बची है।
कोरापुट बॉक्साइट खनन मामला: एनजीटी ने एकतरफा रोक से किया इनकार
ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित बल्लाडा बॉक्साइट खदानों को दी गई प्रशासनिक और पर्यावरणीय मंजूरियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई अब तेज हो गई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने इस मामले में दायर याचिका पर 27 मई 2026 को अहम सुनवाई की। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने इस चरण पर किसी भी पक्ष को सुने बिना एकतरफा अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रतिवादियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना कोई एकपक्षीय राहत नहीं दी जा सकती। अब इस मामले में अगली सुनवाई 1 जुलाई, 2026 को होगी।
कानूनी प्रक्रिया और मंजूरियों को चुनौती
याचिकाकर्ताओं ने 23 दिसंबर 2024 को जारी स्टेज-I और 16 अप्रैल 2026 को जारी स्टेज-II की मंजूरियों को चुनौती दी है, जिनके आधार पर 7 मई 2026 को वन भूमि को खनन के लिए डाइवर्ट (स्थानांतरित) करने का अंतिम आदेश जारी किया गया था।
आरोप है कि खनन परियोजना चलाने वाली कंपनी कलिंगा एल्युमिना ने प्रस्तावित खनन क्षेत्र में जंगलों और जैव विविधता का सही आंकलन नहीं किया। उनका कहना है कि कंपनी ने जंगलों में मौजूद दुर्लभ और संकटग्रस्त वन्यजीवों की जानकारी छिपाई, जिसके चलते उसे ऐसी मंजूरी मिल गई जो वास्तविक तथ्यों के सामने आने पर संभवतः नहीं मिलती।
याचिकाकर्ताओं का यह भी आरोप है कि मंजूरी जारी करने से पहले वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के पालन पर कोई विचार नहीं किया गया।
उनके अनुसार, इससे पूरी मंजूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि वनवासी समुदायों के वनाधिकार दावों का निपटारा किए बिना और उनकी पूर्व सहमति प्राप्त किए बिना इस परियोजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए थी। ऐसे में जारी की गई स्वीकृतियां कानूनी रूप से वैध नहीं मानी जा सकती।
विवादों में घिरे इस प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि काफी बड़ी है। ओडिशा सरकार के इस्पात एवं खान विभाग ने 1 मार्च 2023 को एक ई-नीलामी के जरिए कोरापुट जिले की नंदपुर तहसील के बल्लाडा गांव में स्थित इस खदान को 50 वर्षों के लिए लीज पर देने का आशय पत्र जारी किया था।
कुल 144.945 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस विशाल बॉक्साइट ब्लॉक को 'मुंद्रा एल्युमिनियम लिमिटेड' के पक्ष में आवंटित किया गया था, जिसका नाम अब बदलकर 'कलिंगा एल्युमिना लिमिटेड' कर दिया गया है। आगामी 1 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर अब उद्योग जगत और पर्यावरणविदों दोनों की निगाहें टिकी हैं।