ओडिशा: 104 खदानें सक्रिय, सभी के पास वैध अनुमति, प्रदूषण नियंत्रण के भी किए हैं उपाय: एसपीसीबी रिपोर्ट

रिपोर्ट का दावा है कि इन खदानों में वायु और जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी उपाय लागू किए हैं और ठोस कचरे के प्रबंधन के लिए योजना बनाई गई है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) की 25 अप्रैल 2026 को जारी रिपोर्ट राज्य में खनन गतिविधियों और प्रदूषण नियंत्रण की स्थिति की एक अहम तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2026 तक ओडिशा के चार जिलों में 104 खदानें सक्रिय हैं।

  • इनमें अंगुल में 17 कोयला, जाजपुर में 11 क्रोमाइट और सुंदरगढ़ व क्योंझर में 75 लौह व मैंगनीज खदानें शामिल हैं। जानकारी दी गई है कि इन सभी खदानों के पास ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ जैसी वैध अनुमति है और वायु व जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी उपाय लागू किए गए हैं।

  • रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ठोस कचरा प्रबंधन, सतही बहाव (रन-ऑफ) नियंत्रण और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) जैसी व्यवस्थाएं हर खदान में मौजूद हैं और उनकी नियमित जांच भी होती है।

  • हालांकि, बोर्ड यह भी मानता है कि इन उपायों की प्रभावशीलता स्थिर नहीं है और समय के साथ बदलती रहती है। यही वजह है कि एसपीसीबी निगरानी को मजबूत रखते हुए नई तकनीकों और अतिरिक्त शर्तों के जरिए सुधार लागू करता रहता है।

ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) ने 25 अप्रैल 2026 को ओडिशा के चार जिलों में मौजूद खदानों के बारे में स्थिति रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सौंपी है। यह खदाने पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन कर रही हैं या नहीं रिपोर्ट में इस पर प्रकाश डाला है।

रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2026 तक इन जिलों की 104 खदानों में खनन जारी है। इनमें अंगुल में 17 कोयला खदानें, जाजपुर में 11 क्रोमाइट खदानें और सुंदरगढ़ व क्योंझर में 75 लौह व मैंगनीज खदानें शामिल हैं।

रिपोर्ट कहती है कि इन सभी 104 खदानों के पास संचालन की वैध अनुमति (कंसेंट टू ऑपरेट) है। साथ ही रिपोर्ट का दावा है कि इन खदानों में वायु और जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी उपाय लागू किए हैं।

नियमों के दायरे में खनन का दावा

हर खदान में ठोस कचरे के प्रबंधन की योजना और सतही बहाव (रन-ऑफ) को संभालने की व्यवस्था मौजूद है, जिनकी समय-समय पर फिजिकल जांच की जाती है। कोयला और क्रोमाइट खदानों में लगाए गए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) भी चल रहे हैं।

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हालांकि, रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि प्रदूषण नियंत्रण उपायों की प्रभावशीलता (ऑपरेशनल एफिशिएंसी) लगातार बदलती रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड निगरानी बनाए रखता है और खनन विभाग व विशेषज्ञ संस्थानों के साथ मिलकर लगातार सुधार की कोशिशें करता रहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, नई तकनीकों और सुधारों को लागू कराने के लिए एसपीसीबी खदानों को दिए जाने वाले ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ में अतिरिक्त शर्तें जोड़ता है और उनके पालन के लिए समय-सीमा तय करता है। इन शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं इसकी नियमित समीक्षा की जाती है और जरूरत पड़ने पर आगे कड़े सुधार भी किए जाते हैं।

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रिपोर्ट में नियम, तकनीक और निगरानी की मजबूत तस्वीर दिखती है, लेकिन असल सवाल यही है कि क्या इन उपायों से जमीन पर प्रदूषण सच में घट रहा है, या खनन की तेज रफ्तार के बीच नियंत्रण सिर्फ दावों तक सीमित है?

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