ओडिशा के जंगल में जहरीला खेल! एनजीटी पहुंचा फ्लाई ऐश विवाद, पड़ताल के लिए संयुक्त समिति गठित

आरोप है कि ग्रामीणों के विरोध के बावजूद अब तक इस डंपिंग को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं और खदान में फ्लाई ऐश डालने का सिलसिला जारी है
ओडिशा के जंगल में जहरीला खेल! एनजीटी पहुंचा फ्लाई ऐश विवाद, पड़ताल के लिए संयुक्त समिति गठित
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सारांश
  • पर्यावरणीय खतरों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दो अहम मामलों में सख्त रुख अपनाया है।

  • ओडिशा के सुंदरगढ़ स्थित पेरुभाड़ी आरक्षित वन में पानी से भरी खदान में फ्लाई ऐश डंपिंग के मामले में एनजीटी ने एनटीपीसी, वेदांता और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है।

  • यह खदान आज आसपास के गांवों के लिए जीवनदायिनी जलस्रोत बन चुकी है, जहां फ्लाई ऐश डालने से पानी, मिट्टी और हवा के जहरीले होने का गंभीर खतरा है। ग्रामीणों के विरोध के बावजूद डंपिंग जारी रहने के आरोप स्थिति को और चिंताजनक बनाते हैं।

  • वहीं, झारखंड में कोयला परिवहन से उड़ती धूल को लेकर भी एनजीटी ने सख्ती दिखाई है। अमड़ापाड़ा से पाकुड़ तक कोयला ढुलाई के दौरान फैल रहे धूल प्रदूषण पर अदालत ने दो सदस्यीय समिति बनाकर जांच के आदेश दिए हैं।

  • यह प्रदूषण न केवल पर्यावरण, बल्कि स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा बन रहा है। दोनों ही मामलों में अब नजर एनजीटी की कार्रवाई और जांच रिपोर्ट पर है, जो पर्यावरणीय जवाबदेही तय करने में अहम होगी।

ओडिशा में सुंदरगढ़ जिले के पेरुभाड़ी आरक्षित वन क्षेत्र में मौजूद पत्थर खदान में फ्लाई ऐश डंपिंग का मामला 23 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में सुनवाई के लिए पहुंचा।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने ओडिशा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) और वेदांता लिमिटेड सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं।

तीन सदस्यीय समिति करेगी जमीनी सच्चाई की पड़ताल

साथ ही, एनजीटी ने एक तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित कर पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं। इस समिति में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), सुंदरगढ़ के कलेक्टर और ओडिशा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल होंगे। समिति को मौके का दौरा कर वास्तविक स्थिति और उठाए गए कदमों पर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।

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गौरतलब है कि फ्लाई ऐश थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाला खतरनाक औद्योगिक कचरा है। इसके निपटान के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारो नोटिफिकेशनों के तहत सख्त प्रावधान किए गए हैं।

सख्त नियम, फिर भी लापरवाही

कानून साफ कहते हैं कि फ्लाई ऐश का निपटान केवल वैज्ञानिक और पर्यावरण के लिए सुरक्षित तरीके से ही किया जा सकता है। इसे खुले में या बिना नियमों के कहीं भी डंप करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने भी मार्च 2019 में इस बारे में दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनके अनुसार फ्लाई ऐश के किसी भी निपटान से पहले अनुमति लेना, जरूरी सुरक्षा उपाय अपनाना और लगातार निगरानी करना अनिवार्य है।

इसके बावजूद, पेरुभाड़ी की जिस खदान को फ्लाई ऐश डंपिंग के लिए चुना गया है, वह कोई साधारण गड्ढा नहीं है। यह खदान समय के साथ पानी से भरकर एक स्थाई जलस्रोत बन चुकी है। आसपास के गांवों के लोग इसी पानी का उपयोग पीने, सिंचाई, नहाने, पशुओं और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए करते हैं।

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इतना ही नहीं, यह खदान आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर स्थित है और आसपास के क्षेत्रों के लिए भूजल रिचार्ज का अहम स्रोत भी है। ऐसे में यहां फ्लाई ऐश और उससे बने घोल (स्लरी) को डालने से पानी, मिट्टी और हवा तीनों जहरीले हो सकते हैं। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने, फसलों को नुकसान होने, पीने के पानी की कमी और लंबे समय तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा है।

नाले से नदी तक फैल सकता है प्रदूषण

मामले में यह भी आशंका जताई गई है कि यदि फ्लाई ऐश का रिसाव हुआ, तो यह डिडगा-तेलजोरा नाले को प्रदूषित करते हुए आगे इब नदी तक पहुंच सकता है, जो इस इलाके की मुख्य नदी है।

चौंकाने वाली बात यह है कि ग्रामीणों और शिकायतकर्ता के विरोध के बावजूद अब तक इस डंपिंग को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं और खदान में फ्लाई ऐश डालने का सिलसिला जारी है। अब सबकी नजर एनजीटी की अगली कार्रवाई और जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है, जो इस गंभीर पर्यावरणीय खतरे की सच्चाई सामने लाएगी।

झारखंड में कोयला परिवहन बना ‘धूल संकट’, एनजीटी ने बनाई जांच समिति

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने 23 अप्रैल 2026 को झारखंड में कोयला लाने-ले जाने से फैल रहे धूल प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत में दाखिल याचिका में कहा गया है कि अमड़ापाड़ा से पाकुड़ के लोटामारा तक, पचवाड़ा कोल ब्लॉक से कोयला ढुलाई के दौरान उड़ने वाली धूल ने पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यही नहीं, यह प्रदूषण स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन रहा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने जांच के लिए दो सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया है। इस समिति में पाकुड़ जिला मजिस्ट्रेट के एक प्रतिनिधि और झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से एक प्रतिनिधि शामिल होंगे।

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समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह साइट का दौरा कर, आवश्यक तथ्य और साक्ष्य एकत्र करे तथा विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य और अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।

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