

नया वैश्विक अध्ययन बताता है कि टाइप-टू डायबिटीज के कई मुख्य जैविक कारण खून के बाहर शरीर के अंगों में होते हैं।
शोध में पाया गया कि डायबिटीज से जुड़े 85 प्रतिशत अहम जीन रक्त परीक्षण में दिखाई ही नहीं देते।
अग्न्याशय, लीवर, मांसपेशियां और चर्बी जैसे ऊतकों की भूमिका डायबिटीज के विकास में बेहद महत्वपूर्ण पाई गई।
अलग-अलग देशों और नस्लों के लोगों को शामिल करने से नए और पहले छिपे हुए डायबिटीज जोखिम जीन सामने आए।
टाइप-टू डायबिटीज आज दुनिया की सबसे आम बीमारियों में से एक है। करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं। अब तक इस बीमारी को समझने के लिए ज्यादातर शोध खून की जांच पर आधारित थे। लेकिन एक नया बड़ा अंतरराष्ट्रीय शोध बताता है कि टाइप-टू डायबिटीज के कई मुख्य कारण खून के बाहर, शरीर के दूसरे हिस्सों में छिपे होते हैं।
यह शोध अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट और जर्मनी की हेल्महोल्ट्ज म्यूनिख के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया। यह अध्ययन नेचर मेटाबोलिज्म नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
खून से आगे देखने की जरूरत
आमतौर पर डॉक्टर डायबिटीज की जांच खून में शुगर के स्तर से करते हैं। यह जरूरी भी है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। टाइप-टू डायबिटीज सिर्फ खून की समस्या नहीं है। यह शरीर के कई अंगों से जुड़ी बीमारी है।
इस बीमारी में -
अग्न्याशय (पैंक्रियाज) ठीक से इंसुलिन नहीं बना पाता
मांसपेशियां इंसुलिन का सही उपयोग नहीं कर पातीं
लीवर ज्यादा ग्लूकोज बनाने लगता है
चर्बी (फैट) वाले ऊतकों में गड़बड़ी होती है
अगर हम सिर्फ खून की जांच करें, तो इन अंगों में हो रहे बदलाव हमें दिखाई नहीं देते।
बड़ा शोध क्यों खास है?
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 25 लाख लोगों का आनुवंशिक (जेनेटिक) आंकड़ों का इस्तेमाल किया। यह आंकड़े यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका और पूर्वी एशिया जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से लिया गया।
आनुवंशिक जानकारी जन्म के समय तय हो जाती है। इसलिए वैज्ञानिक इसे एक “नेचुरल एक्सपेरिमेंट” की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि कौन से बदलाव बीमारी का कारण बनते हैं और कौन से सिर्फ उसके साथ दिखाई देते हैं।
शरीर के अलग-अलग हिस्सों की भूमिका
वैज्ञानिकों ने डायबिटीज से जुड़े सात अलग-अलग ऊतकों का अध्ययन किया, जैसे - अग्न्याशय, लीवर, मांसपेशियां, चर्बी वाला ऊतक। नतीजे चौंकाने वाले थे।
डायबिटीज से जुड़े 676 जीन पाए गए, लेकिन इनमें से केवल 18 फीसदी जीन ऐसे थे जो खून में भी दिखाई दिए। यानी 85 फीसदी जरूरी जानकारी सिर्फ खून की जांच से बिल्कुल नहीं मिलती, इसका मतलब है कि अगर शोध केवल खून पर आधारित हो, तो हम बीमारी के ज्यादातर कारणों को समझ ही नहीं पाते।
अलग-अलग लोगों में अलग असर
इस शोध की एक और खास बात यह है कि इसमें अलग-अलग नस्लों और समुदायों के लोगों को शामिल किया गया। पहले ज्यादातर आनुवंशिक शोध यूरोपीय लोगों पर ही होते थे।
इस बार वैज्ञानिकों ने पाया कि -
कुछ जीन सभी लोगों में डायबिटीज से जुड़े थे
लेकिन कुछ जीन सिर्फ तब दिखाई दिए जब अफ्रीकी, एशियाई और अमेरिकी मूल के लोगों का आंकड़ा शामिल किया गया
इससे साफ है कि अगर हम सभी लोगों को शामिल नहीं करेंगे, तो बीमारी की सही समझ नहीं बन पाएगी।
भविष्य के इलाज के लिए क्या मतलब है?
इस अध्ययन से डायबिटीज के इलाज और रोकथाम के लिए नए रास्ते खुलते हैं। भविष्य में इलाज शरीर के खास अंगों पर केंद्रित हो सकता है। हर व्यक्ति के जेनेटिक प्रोफाइल के अनुसार इलाज किया जा सकता है। अलग-अलग समुदायों के लिए अलग रणनीतियां बन सकती हैं। इससे इलाज अधिक सरदार और सुरक्षित हो सकता है।
यह बड़ा वैश्विक शोध हमें यह सिखाता है कि टाइप-टू डायबिटीज को समझने के लिए सिर्फ खून की जांच काफी नहीं है। यह बीमारी पूरे शरीर से जुड़ी है और इसके कारण कई अंगों में छिपे हो सकते हैं।
साथ ही, यह भी जरूरी है कि शोध में दुनिया के सभी तरह के लोगों को शामिल किया जाए। तभी हम इस जटिल बीमारी को सही तरीके से समझ पाएंगे और बेहतर इलाज विकसित कर सकेंगे। टाइप-टू डायबिटीज पर यह अध्ययन विज्ञान की दुनिया में एक अहम कदम माना जा रहा है।