

प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि इंसानी दिल के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पहली बार हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में माइक्रो और नैनोप्लास्टिक के महीन कण पाए गए हैं। शोध में सामने आया कि गंभीर हार्ट अटैक के 84 फीसदी मरीजों की धमनियों और रक्त में ये कण मौजूद थे, जबकि सामान्य धमनियों वाले लोगों में यह आंकड़ा महज 32 फीसदी था।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि जिन लोगों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक अधिक था, उनके हृदय को ज्यादा नुकसान और सूजन के संकेत भी अधिक मिले।
अध्ययन के मुताबिक धूम्रपान और लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहना शरीर में इन प्लास्टिक कणों के प्रवेश को कई गुना बढ़ा सकता है। हालांकि शोध यह साबित नहीं करता कि माइक्रोप्लास्टिक सीधे हार्ट अटैक का कारण हैं, लेकिन इनके और हृदय रोगों के बीच मजबूत संबंध जरूर सामने आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, स्वच्छ हवा, धूम्रपान से दूरी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना अब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि दिल की सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी हो गया है।
दुनिया में बढ़ता प्लास्टिक कचरा केवल नदियों, समुद्रों और मिट्टी तक सीमित नहीं है। अब इसके बेहद महीन कण इंसानी शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों तक में अपनी पैठ बना चुके हैं। ऐसा ही कुछ दिल के मामले में भी देखा गया है।
इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेताया है कि हृदय की धमनियों में मौजूद माइक्रो और नैनोप्लास्टिक कण गंभीर हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। इसमें वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन मरीजों को गंभीर हार्ट अटैक आया था, उनकी हृदय की धमनियों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी अन्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक थी।
इससे यह आशंका मजबूत हुई है कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि मानव हृदय के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। यह अध्ययन इटली की सापिएंजा यूनिवर्सिटी ऑफ रोम, यूनिवर्सिटी ऑफ वेरोना और यूनिवर्सिटी ऑफ कैंपानिया (नेपल्स) के पर्यावरण प्रदूषण और हृदय रोग अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है।
क्या होते हैं माइक्रोप्लास्टिक?
गौरतलब है कि माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर या उससे छोटे कण होते हैं, जो प्लास्टिक की बड़ी वस्तुओं के टूटने से बनते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये हवा, पानी, भोजन और रोजमर्रा के कई उत्पादों के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
चिंता की बात है कि पहले ही मानव रक्त, फेफड़ों, मस्तिष्क, प्लेसेंटा और दूध तक में इनकी मौजूदगी के सबूत पहले ही मिल चुके हैं। देखा जाए तो यह खबर सिर्फ एक वैज्ञानिक शोध नहीं है, बल्कि इंसानी लापरवाही की वह दास्तान है जो अब हमारी सांसों और धड़कनों पर भारी पड़ रही है।
सापिएंजा यूनिवर्सिटी ऑफ रोम और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर पास्क्वेल पाओलिसो का कहना है माइक्रोप्लास्टिक आज हमारे आसपास लगभग हर जगह मौजूद हैं। ये हवा, पानी और हमारे खाने तक में पहुंच चुके हैं।
पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों को यह मानव शरीर के कई अहम अंगों और ऊतकों में भी इनकी मौजूदगी का पता चला है, जिससे इनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ गई है। हालांकि इनका शरीर पर लम्बे समय क्या प्रभाव पड़ता है इसको लेकर अभी भी शोध जारी है।
उनका कहना है "अब तक यह स्पष्ट नहीं था कि क्या ये कण हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में भी मौजूद होते हैं। साथ ही यह भी पता नहीं था कि धूम्रपान और वायु प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारक इन कणों की मौजूदगी को प्रभावित करते हैं या नहीं।"
इन्हीं प्रभावों को समझने के लिए अध्ययन में इटली के 61 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें से कुछ मरीज हाल ही में हार्ट अटैक का शिकार हुए थे, कुछ लंबे समय से हृदय रोग से पीड़ित थे, जबकि कुछ की कोरोनरी धमनियां सामान्य थीं।
शोधकर्ताओं ने हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों से रक्त के नमूने लेकर उनमें माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की जांच की। साथ ही मरीजों की धूम्रपान की आदत और पिछले दो वर्षों के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क का भी विश्लेषण किया गया।
हार्ट अटैक के मरीजों में सबसे ज्यादा मिले प्लास्टिक कण
इस अध्ययन के जो नतीजे सामने आए वे बेहद चिंताजनक थे। हार्ट अटैक के 84 फीसदी मरीजों के खून और धमनियों में माइक्रोप्लास्टिक के कण मौजूद थे। वहीं
लंबे समय से हृदय रोग से पीड़ित मरीजों में यह आंकड़ा 40 फीसदी दर्ज किया गया। दूसरी तरफ जिन लोगों की धमनियां सामान्य थी उनमें से महज 32 फीसदी में प्लास्टिक के ये महीन कण पाए गए।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि हार्ट अटैक से पीड़ित मरीजों के रक्त में प्लास्टिक के कणों की मात्रा ही नहीं, बल्कि उनकी विविधता भी अधिक थी। सबसे अधिक पाया जाने वाला प्लास्टिक पॉलीएथिलीन था, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर पॉलीथीन बैग और फूड पैकेजिंग में किया जाता है।
जितना अधिक माइक्रोप्लास्टिक, उतना अधिक नुकसान
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों के रक्त में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर अधिक था, उनके हृदय की मांसपेशियों को ज्यादा नुकसान पहुंचा और शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) के संकेत भी अधिक मिले।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ये कण रक्त वाहिकाओं की भीतरी परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लगातार सूजन पैदा कर सकते हैं और धमनियों में जमा फैटी प्लाक को अस्थिर बना सकते हैं। यही स्थिति हार्ट अटैक की आशंका को बढ़ा सकती है।
धूम्रपान और प्रदूषण ने बढ़ाया खतरा
अध्ययन में धूम्रपान और वायु प्रदूषण की भूमिका भी स्पष्ट रूप से सामने आई। वैज्ञानिकों के मुताबिक, धूम्रपान करने वाले लोगों के रक्त में माइक्रोप्लास्टिक मिलने की आशंका छह गुणा अधिक थी। वहीं जिन लोगों ने लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस ली, उनमें भी इन कणों की मौजूदगी ज्यादा पाई गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जो लोग धूम्रपान भी करते थे और अधिक प्रदूषित वातावरण में रहते थे, उनमें 100 फीसदी मामलों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। इसके विपरीत, जो लोग न धूम्रपान करते थे और न ही अधिक प्रदूषण के संपर्क में थे, उनमें यह आंकड़ा महज 12.5 फीसदी ही था।
ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि सिगरेट का धुआं और प्रदूषित हवा फेफड़ों के जरिए इन सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को सीधे रक्त में पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं।
क्या प्लास्टिक ही हार्ट अटैक का कारण है?
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि माइक्रोप्लास्टिक सीधे हार्ट अटैक का कारण बनते हैं। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि इनके और हृदय रोगों के बीच मजबूत संबंध है।
बता दें कि इससे पहले 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में भी पाया गया था कि जिन लोगों की धमनियों में जमा प्लाक में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद थे, उनमें हार्ट अटैक, स्ट्रोक या मृत्यु का खतरा चार गुणा से अधिक था।
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के नजरिए से भी गंभीर मुद्दा बन चुका है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि दिल को स्वस्थ रखने के लिए कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखना, रक्तचाप पर नियंत्रण और धूम्रपान छोड़ना आज भी सबसे प्रभावी उपाय हैं। लेकिन इसके साथ ही प्लास्टिक प्रदूषण और वायु प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों को भी गंभीरता से लेना होगा।
उनका मानना है कि प्लास्टिक के अनावश्यक उपयोग को कम करना, स्वच्छ हवा सुनिश्चित करना और तंबाकू से दूरी बनाना न केवल पर्यावरण बल्कि हमारे दिल की सुरक्षा के लिए भी बेहद जरूरी कदम हैं।