क्या बच्चों के व्यवहार को आक्रामक बना रहा है ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड’, क्या कहती है स्टडी?

अध्ययन के मुताबिक, छोटे बच्चों के आहार में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन उनके व्यवहार और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है
अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।
अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • तीन साल की उम्र में बच्चों के अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सेवन से पांच साल की उम्र में व्यवहारिक लक्षण थोड़े बढ़ सकते हैं।

  • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में पैकेट स्नैक्स, मीठे पेय, रेडी-टू-ईट फूड और इंस्टेंट नूडल्स शामिल होते हैं, जो स्वास्थ्य प्रभावित कर सकते हैं।

  • अध्ययन में बच्चों के आहार और व्यवहार का मूल्यांकन 2,077 कनाडाई बच्चों पर किया गया।

  • प्रोसेस्ड फूड को कम करके 10 प्रतिशत कैलोरी प्राकृतिक और कम प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थों से बदलने पर व्यवहारिक स्कोर सुधार हुआ।

  • अध्ययन से संकेत मिलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।

हाल ही में एक शोध में यह पाया गया है कि छोटे बच्चों के खाने की आदतें उनके व्यवहार और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकती हैं। यह अध्ययन जामा नेटवर्क ओपन में प्रकाशित हुआ है और इसमें कनाडा के 2,000 से अधिक बच्चों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध के अनुसार, जिन बच्चों के भोजन में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड या अति-प्रसंस्कृत खाद्य अधिक होता है, उनमें आगे चलकर व्यवहार से जुड़े कुछ हल्के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि इन प्रभावों का स्तर बहुत छोटा था और इससे यह साबित नहीं होता कि प्रोसेस्ड फूड सीधे व्यवहार की समस्या पैदा करते हैं। फिर भी यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि बचपन में स्वस्थ आहार बहुत महत्वपूर्ण होता है।

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अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड क्या होते हैं?

खाद्य पदार्थों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने के लिए वैज्ञानिक अक्सर नोवा खाद्य वर्गीकरण प्रणाली का उपयोग करते हैं। इस प्रणाली में खाद्य पदार्थों को उनके प्रसंस्करण के स्तर के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड वे होते हैं जो फैक्ट्री में कई चरणों से गुजरकर बनाए जाते हैं और जिनमें अतिरिक्त चीनी, नमक, फ्लेवर या प्रिजर्वेटिव मिलाए जाते हैं।

जैसे पैकेट वाले स्नैक्स, मीठे पेय या सॉफ्ट ड्रिंक, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेट ब्रेड, रेडी-टू-ईट फूड हैं। इसके विपरीत, कम प्रोसेस किए गए या प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में फल, सब्जियां, दूध, अंडे और साबुत अनाज शामिल होते हैं।

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अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।

यह अध्ययन कैसे किया गया?

यह शोध बच्चों के आंकड़ों पर आधारित था। इसमें कनाडा के कई शहरों के बच्चों की जानकारी शामिल थी। शोधकर्ताओं ने बच्चों के भोजन और व्यवहार को दो अलग उम्र पर देखा। जब बच्चे 3 साल के थे, तब उनके खान-पान की जानकारी एक प्रश्नावली के माध्यम से ली गई। जब बच्चे पांच साल के हुए, तब उनके व्यवहार का मूल्यांकन किया गया।

व्यवहार और भावनात्मक स्थिति को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने बाल व्यवहार चेकलिस्ट नामक एक मानक परीक्षण का उपयोग किया। इसमें माता-पिता या देखभाल करने वाले लोग बच्चों के व्यवहार के बारे में जानकारी देते हैं।

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अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।

बच्चों के भोजन में कितना प्रोसेस्ड फूड था?

अध्ययन में शामिल बच्चों की रोजाना औसत ऊर्जा लगभग 1,489 कैलोरी थी। इसमें से लगभग 46 प्रतिशत कैलोरी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से आ रही थी। इसका मतलब है कि लगभग आधा भोजन ऐसे खाद्य पदार्थों से बना था जो फैक्ट्री में तैयार किए गए थे। यह आंकड़ा बताता है कि आधुनिक जीवनशैली में छोटे बच्चों के आहार में प्रोसेस्ड फूड की मात्रा काफी ज्यादा हो सकती है।

व्यवहार पर क्या असर देखा गया?

शोध में पाया गया कि जिन बच्चों ने तीन साल की उम्र में ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाया, उनमें पांच साल की उम्र तक कुछ व्यवहारिक लक्षण थोड़े अधिक देखे गए।

इन लक्षणों में शामिल थे -

  • चिंता या उदासी जैसे भावनात्मक लक्षण

  • चिड़चिड़ापन या आक्रामक व्यवहार

  • अत्यधिक सक्रियता

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हालांकि शोधकर्ताओं ने बताया कि यह बदलाव बहुत छोटा था। हर 10 प्रतिशत ज्यादा प्रोसेस्ड फूड लेने पर व्यवहार स्कोर में केवल हल्की बढ़ोतरी देखी गई। इसलिए इसे गंभीर समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि भोजन और मानसिक विकास के बीच संबंध हो सकता है।

अगर प्रोसेस्ड फूड कम किया जाए तो क्या होगा?

शोधकर्ताओं ने एक मॉडल बनाकर यह भी देखा कि अगर बच्चों के भोजन में थोड़ा बदलाव किया जाए तो क्या असर पड़ सकता है। उन्होंने यह अनुमान लगाया कि अगर कुल कैलोरी में से 10 प्रतिशत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को हटाकर उसकी जगह कम प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थ शामिल किए जाएं, तो बच्चों के व्यवहार स्कोर में थोड़ी कमी आ सकती है। इसका मतलब यह है कि भोजन में छोटे बदलाव भी बच्चों के स्वास्थ्य और विकास के लिए लाभदायक हो सकते हैं।

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अध्ययन की कुछ सीमाएं

हर वैज्ञानिक अध्ययन की तरह इस शोध की भी कुछ सीमाएं हैं। पहली बात, बच्चों के व्यवहार की जानकारी माता-पिता द्वारा दी गई थी, इसलिए इसमें व्यक्तिगत राय का प्रभाव हो सकता है। दूसरी बात, भोजन की जानकारी प्रश्नावली के माध्यम से ली गई थी, जिसमें कुछ गलतियां हो सकती हैं। इसके अलावा, इस अध्ययन में शामिल परिवारों की आय और शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक था, इसलिए परिणाम हर समाज पर समान रूप से लागू नहीं हो सकते।

बच्चों के लिए स्वस्थ भोजन क्यों जरूरी है?

बचपन वह समय होता है जब शरीर और मस्तिष्क तेजी से विकसित होते हैं। इस दौरान सही पोषण बहुत महत्वपूर्ण होता है। फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दूध और प्रोटीन से भरपूर भोजन बच्चों के मस्तिष्क के विकास में मदद करते हैं। वहीं बहुत अधिक चीनी, नमक और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए अच्छे नहीं माने जाते।

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अध्ययन से पता चलता है कि बचपन में संतुलित और कम से कम संसाधित भोजन बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है।

इसलिए विशेषज्ञ अक्सर सलाह देते हैं कि बच्चों को जितना संभव हो उतना प्राकृतिक और कम प्रोसेस किया हुआ भोजन दिया जाए।

इस अध्ययन से यह पता चलता है कि छोटे बच्चों के आहार में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की अधिक मात्रा उनके व्यवहार से जुड़े कुछ लक्षणों से जुड़ी हो सकती है। हालांकि प्रभाव बहुत छोटा पाया गया और इससे सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता।

फिर भी यह शोध यह याद दिलाता है कि बचपन में स्वस्थ और संतुलित भोजन बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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