

भारत में कैंसर का बोझ केवल बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं है। नए अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि देश में 2024 के दौरान सामने आए करीब 15.6 लाख नए कैंसर मामलों में से लगभग 1.9 लाख मामले संक्रमणों से जुड़े थे।
यानी भारत में कैंसर का करीब हर आठवां मामला किसी संक्रमण से जुड़ा था। यह आंकड़ा इस ओर इशारा करता है कि कैंसर की रोकथाम की शुरुआत बीमारी के सामने आने से काफी पहले की जा सकती है।
भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर मामलों में ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) सबसे बड़ा कारण रहा, जिससे एक लाख से अधिक मामले जुड़े थे। इसके बाद हेलिकोबैक्टर पाइलोरी से करीब 47,000, एपस्टीन-बार वायरस से 22,000, हेपेटाइटिस बी से करीब 10,000 और हेपेटाइटिस सी से लगभग 5,300 मामले जुड़े पाए गए।
दुनिया की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। 2024 में करीब 23 लाख नए कैंसर मामले संक्रमणों से जुड़े थे, जो कुल मामलों का लगभग 12 फीसदी है। इनमें 77 फीसदी मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सामने आए।
विशेषज्ञों के अनुसार एचपीवी और हेपेटाइटिस बी के खिलाफ टीकाकरण, संक्रमणों की समय पर जांच और उपचार तथा गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की स्क्रीनिंग जैसे उपाय कई संक्रमण-संबंधी कैंसर को रोकने में मदद कर सकते हैं। यानी कैंसर के खिलाफ लड़ाई अस्पताल पहुंचने के बाद ही नहीं, बल्कि उससे बहुत पहले शुरू हो सकती है।
किसी परिवार के लिए कैंसर की खबर सिर्फ एक मेडिकल रिपोर्ट नहीं होती। इसके साथ इलाज का लंबा सफर, बढ़ते खर्च, अनिश्चित भविष्य और अपनों को खो देने का डर भी जुड़ा होता है। भारत में हर साल कैंसर के करीब 15.6 लाख नए मामले सामने आते हैं, जोकि देश में इस बीमारी के भारी बोझ को दर्शाते हैं।
लेकिन इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इनमें से करीब 1.9 लाख मामलों का संबंध संक्रमण से था, यानी देश में कैंसर का हर आठवां मामला संक्रमण से जुड़ा था। इनमें सबसे बड़ा योगदान ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) का रहा, जबकि हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (एच पाइलोरी), एपस्टीन-बार वायरस (ईबीवी) और हेपेटाइटिस बी और सी भी बड़ी संख्या में कैंसर मामलों से जुड़े पाए गए।
यह स्पष्ट तौर पर इस बात को दर्शाता है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सिर्फ बीमारी का इलाज ही नहीं, बल्कि उन संक्रमणों को रोकना भी बेहद जरुरी है जो वर्षों बाद कैंसर का कारण बन सकते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, संक्रमणों की समय पर पहचान, इलाज और टीकाकरण जैसे उपायों के जरिए कैंसर के कुछ मामलों को होने से पहले ही रोका जा सकता है।
भारत में संक्रमण से जुड़ा हर आठवां कैंसर
रुझानों को देखें यह तस्वीर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं। दुनिया भर में 2024 में कैंसर के सामने आए करीब 2.3 करोड़ मामलों में से 23 लाख का संबंध संक्रमण से था, जो उस साल में सामने आए कैंसर के कुल नए मामलों का करीब 12 फीसदी था। यानी दुनिया में सामने आने वाला कैंसर का हर आठवां मामला संक्रमण से जुड़ा था।
यह खुलासा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (आईएआरसी) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए अध्ययन में हुआ है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
एचपीवी सबसे आगे, एच पाइलोरी भी बड़ा कारण
रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत में संक्रमण से जुड़े कैंसर के मामलों में ह्यूमन पेपिलोमा वायरस यानी एचपीवी का हिस्सा सबसे बड़ा रहा।
आंकड़ों के मुताबिक देश में एचपीवी से जुड़े कैंसर के मामलों की संख्या एक लाख से अधिक थी। बता दें कि एचपीवी का लगातार बना रहने वाला संक्रमण खासकर गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का प्रमुख कारण है।
इसके बाद एच पाइलोरी से जुड़े करीब 47,000, एपस्टीन-बार वायरस से करीब 22,000, हेपेटाइटिस बी से करीब 10,000 और हेपेटाइटिस सी से कैंसर के करीब 5,300 मामले जुड़े थे। देखा जाए तो इनमें से कई संक्रमणों के लिए बचाव और नियंत्रण के प्रभावी तरीके पहले से मौजूद हैं।
एचपीवी और हेपेटाइटिस बी के खिलाफ टीके उपलब्ध हैं, जबकि एच पाइलोरी, हेपेटाइटिस बी और सी तथा एचआईवी जैसे संक्रमणों की जांच और उपचार से भी कैंसर का जोखिम कम किया जा सकता है।
कैसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कारण बन जाता है संक्रमण?
सवाल यह है कि आखिर एक संक्रमण कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कारण कैसे बन सकता है? स्पष्ट कर दें तो हर संक्रमण कैंसर में नहीं बदलता।
लेकिन कुछ संक्रमण अगर शरीर में लंबे समय तक बने रहें, तो वे कोशिकाओं में ऐसे बदलाव पैदा कर सकते हैं जो आगे चलकर कैंसर का रास्ता खोल सकते हैं। इसी तरह कुछ वायरस संक्रमित कोशिकाओं के प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को भी प्रभावित करते हैं।
सामान्य स्थिति में असामान्य या क्षतिग्रस्त कोशिकाएं खुद को नष्ट कर सकती हैं या उनकी वृद्धि रुक सकती है। लेकिन कुछ वायरस इस व्यवस्था को बाधित कर देते हैं। इससे कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लग सकती हैं। वहीं कुछ वायरस अपने आनुवंशिक पदार्थ को संक्रमित कोशिका के डीएनए में भी शामिल कर सकते हैं।
इससे कोशिका के उन जीन में बदलाव हो सकता है जो कोशिका के विभाजन और मृत्यु को नियंत्रित करते हैं।
वहीं बैक्टीरिया और परजीवी अलग तरीके से नुकसान पहुंचा सकते हैं। लंबे समय तक रहने वाला संक्रमण शरीर में लगातार सूजन पैदा करता है। इससे ऊतकों को नुकसान पहुंच सकता है और उनकी मरम्मत के दौरान कोशिकाओं में आनुवंशिक गलतियों की संभावना बढ़ सकती है। समय के साथ ये बदलाव कैंसर का रूप ले सकते हैं।
दुनिया में संक्रमण से जुड़े हैं कैंसर के 23 लाख मामलों के तार
आईएआरसी के मुताबिक, 2024 के दौरान दुनिया में कैंसर के 23 लाख नए मामले संक्रमण के कारण हुए थे, जो कैंसर के सभी नए मामलों का करीब 12 फीसदी है। शोध में कैंसर से जुड़े 12 रोगजनकों का विश्लेषण किया गया। इनमें पांच संक्रमणों का योगदान सबसे अधिक था।
कैंसर से जुड़ी इस तस्वीर में पांच संक्रमण सबसे ज्यादा भारी पड़े। एच पाइलोरी करीब 7.6 लाख और एचपीवी करीब 7.5 लाख मामलों के साथ सबसे बड़े कारण रहे। वहीं हेपेटाइटिस बी ने करीब 3.6 लाख, एपस्टीन-बार वायरस ने 2.6 लाख और हेपेटाइटिस सी ने करीब 1.6 लाख कैंसर मामलों में भूमिका निभाई।
आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में संक्रमण से जुड़े कैंसर का बड़ा बोझ कुछ गिने-चुने संक्रमणों से पैदा हो रहा है और इसलिए इनकी रोकथाम कैंसर के बोझ को घटाने की अहम कड़ी बन सकती है।
इन संक्रमणों से पेट, लिवर, गर्भाशय ग्रीवा और रक्त से जुड़े कैंसर समेत कई तरह के कैंसर का संबंध सामने आया है।
जहां इलाज की कमी, वहां संक्रमण से कैंसर का ज्यादा बोझ
अध्ययन का एक चिंताजनक पहलू यह है कि संक्रमण से जुड़े कैंसर का बोझ दुनिया के कमजोर और भारत जैसे मध्यम आय वाले देशों में कहीं ज्यादा है। आपको जानकारी हैरानी होगी कि दुनिया में संक्रमण से जुड़े कैंसर के 77 फीसदी मामले निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सामने आए।
पूर्वी एशिया में करीब 9.9 लाख मामले संक्रमण से जुड़े थे, जो वैश्विक संक्रमण-संबंधी कैंसर मामलों का करीब 42 फीसदी है। वहीं उप-सहारा अफ्रीका में कैंसर के कुल मामलों का करीब एक चौथाई संक्रमण से जुड़ा था।
यह असमानता बताती है कि कैंसर का जोखिम सिर्फ शरीर में मौजूद बीमारी या संक्रमण से तय नहीं होता। टीके, जांच और इलाज तक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
एक टीका, एक जांच और समय पर इलाज बदल सकता है कहानी
गर्भाशय से जुड़ा कैंसर इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। लगातार बना रहने वाला उच्च जोखिम वाला एचपीवी संक्रमण इस कैंसर का मुख्य कारण है। इसके खिलाफ टीका उपलब्ध है और स्क्रीनिंग के जरिए बीमारी से पहले होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, इसी वजह से गर्भाशय का कैंसर सबसे अधिक रोकथाम योग्य और उपचार योग्य कैंसरों में से एक माना जाता है।
भारत में राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम के तहत अब तक 80 लाख से अधिक टीके की खुराकें दी जा चुकी हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक केवल टीकाकरण ही पर्याप्त नहीं है। नियमित स्क्रीनिंग और समय पर उपचार भी बेहद जरूरी हैं।
अस्पताल पहुंचने से पहले शुरू होती है कैंसर की रोकथाम
नए अध्ययन का सबसे अहम संदेश यही है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई अस्पताल की चारदीवारी से शुरू नहीं होती, बल्कि उससे बहुत पहले शुरू हो सकती है। किसी संक्रमण को समय रहते रोकना, सही समय पर टीका लगवाना, नियमित जांच कराना और संक्रमण की पुष्टि होने पर तुरंत इलाज शुरू करना कई लोगों को भविष्य के कैंसर के खतरे से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यानी कैंसर के सामने आने का इंतजार करने के बजाय, उसकी कुछ जड़ों पर पहले ही चोट की जा सकती है।
एचपीवी और हेपेटाइटिस बी के खिलाफ टीकाकरण, एच पाइलोरी और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों की पहचान और उपचार, सुरक्षित इंजेक्शन, और गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की स्क्रीनिंग जैसे उपाय संक्रमण से जुड़े कैंसर के बोझ को कम कर सकते हैं।
दुनिया में 2024 के दौरान कैंसर के करीब 2.06 करोड़ नए मामले सामने आए थे। इनमें से 23 लाख मामलों का संक्रमण से जुड़ा होना यह बताता है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में रोकथाम कितनी महत्वपूर्ण है। हमें समझना होगा कि कैंसर हमेशा ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इंतजार होने के बाद किया जाए।
कुछ मामलों में उसे आने से पहले ही रोकने की कोशिश की जा सकती है और इसके लिए जरूरी हथियार हमारे पास पहले से मौजूद हैं।