थैलेसीमिया कैपिटल है भारत, हर साल 10 से 15 हजार बच्चों का जन्म इस बीमारी के साथ होता है

विश्व थैलेसीमिया दिवस: भारत में करीब एक लाख से 1.5 लाख बच्चे थैलेसीमिया के साथ जीवन जी रहे हैं।
भारत में हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा।
भारत में हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026 पर जागरूकता बढ़ाने और अनपहचाने मरीजों तक इलाज पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया।

  • भारत में हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा।

  • विशेषज्ञों ने विवाह पूर्व जांच और जेनेटिक काउंसलिंग को थैलेसीमिया रोकथाम का सबसे प्रभावी तरीका बताया है।

  • थैलेसीमिया मरीजों को जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाने और महंगे इलाज की जरूरत पड़ती है, जिससे परिवार आर्थिक संकट झेलते हैं।

  • विश्व स्तर पर करोड़ों लोग थैलेसीमिया के वाहक हैं, लेकिन जागरूकता और समय पर जांच की भारी कमी बनी हुई।

हर साल आठ मई को पूरी दुनिया में विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को थैलेसीमिया जैसी गंभीर आनुवंशिक खून की बीमारी के बारे में जागरूक करना है। यह दिन उन मरीजों को समर्पित है जो इस बीमारी से लड़ रहे हैं और उन लोगों को श्रद्धांजलि भी देता है जिन्होंने इस बीमारी के कारण अपनी जान गंवाई।

इस वर्ष विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026 की थीम “अब छिपे नहीं: अनपहचाने मरीजों को खोजें और अनदेखे लोगों का सहारा बनें है।" इस थीम का उद्देश्य उन लाखों लोगों तक पहुंचना है जिन्हें यह बीमारी या इसका वाहक होने की जानकारी ही नहीं है।

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क्या है थैलेसीमिया?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, थैलेसीमिया एक आनुवंशिक खून की बीमारी है। इसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन खून में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। इसकी कमी से मरीज को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है।

यदि माता-पिता दोनों थैलेसीमिया के वाहक हों, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा बढ़ जाता है। थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को जीवनभर इलाज और नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है।

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भारत क्यों बना “थैलेसीमिया कैपिटल”?

भारत को अक्सर “दुनिया की थैलेसीमिया राजधानी” कहा जाता है। इसके पीछे के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। देश में लगभग 3.5 करोड़ से पांच करोड़ लोग बीटा-थैलेसीमिया के वाहक हैं। वहीं करीब एक लाख से 1.5 लाख बच्चे थैलेसीमिया के साथ जीवन जी रहे हैं।

हर साल भारत में लगभग 10 हजार से 15 हजार बच्चों का जन्म थैलेसीमिया के साथ होता है। दुनिया के कुल थैलेसीमिया मरीजों में भारत की हिस्सेदारी बहुत बड़ी मानी जाती है। यही कारण है कि यह बीमारी भारत के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।

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बीमारी बढ़ने के मुख्य कारण

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में थैलेसीमिया के बढ़ते मामलों के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है बड़ी आबादी और वाहकों की अधिक संख्या। देश में औसतन तीन से चार प्रतिशत लोग इस बीमारी के वाहक हैं। कुछ समुदायों में यह संख्या और अधिक है।

कई क्षेत्रों में रिश्तेदारी में विवाह की परंपरा भी इस बीमारी के खतरे को बढ़ाती है। जब दोनों जीवनसाथी इस रोग के वाहक होते हैं, तो बच्चों में थैलेसीमिया होने की आशंका ज्यादा रहती है।

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इसके अलावा जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है। अधिकांश लोगों को तब पता चलता है कि वे वाहक हैं जब उनका बच्चा इस बीमारी से प्रभावित पैदा होता है। विवाह से पहले या गर्भावस्था के दौरान जांच कराने की आदत अभी भी आम नहीं बन पाई है।

इलाज का भारी खर्च

थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को हर तीन से चार सप्ताह में खून चढ़ाना पड़ता है। लगातार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन बढ़ जाता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए आयरन चिलेशन दवाएं दी जाती हैं। मरीजों को नियमित जांच और डॉक्टरों की निगरानी में रहना पड़ता है।

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एक बच्चे के इलाज पर सालाना डेढ़ लाख से तीन लाख रुपये या उससे अधिक खर्च हो सकता है। यह खर्च अधिकांश परिवारों के लिए बहुत भारी साबित होता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट इस बीमारी का इलाज माना जाता है, लेकिन इसकी लागत इतनी अधिक है कि हर परिवार इसे वहन नहीं कर सकता।

दुनिया में भी गंभीर स्थिति

थैलेसीमिया केवल भारत की समस्या नहीं है। पूरी दुनिया में लगभग 30 करोड़ लोग इस बीमारी के वाहक माने जाते हैं। करीब पांच लाख लोग इसके गंभीर रूप से प्रभावित हैं। हर साल हजारों गर्भधारण इस बीमारी से प्रभावित होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या विकासशील देशों की होती है।

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थाईलैंड जैसे देशों में भी थैलेसीमिया का बोझ काफी अधिक है। वहां अल्फा और बीटा दोनों प्रकार के थैलेसीमिया के मामले बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव

विशेषज्ञ मानते हैं कि समय रहते जांच और जागरूकता से थैलेसीमिया के मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है। विवाह से पहले रक्त जांच, गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग और सही जेनेटिक काउंसलिंग बेहद जरूरी है।

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इसके साथ ही स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देना भी आवश्यक है ताकि मरीजों को समय पर सुरक्षित रक्त मिल सके। सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को गांवों और छोटे शहरों तक जागरूकता अभियान पहुंचाने की जरूरत है।

विश्व थैलेसीमिया दिवस 2026 का संदेश साफ है कि बीमारी को छिपाने के बजाय समय रहते पहचानना और सही इलाज उपलब्ध कराना ही लाखों लोगों की जिंदगी बचा सकता है।

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