

दुनिया में 2015 से 2024 के बीच टीबी के मामलों में केवल 12.3 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि लक्ष्य 50 प्रतिशत की कमी का था।
भारत में टीबी उपचार कवरेज 2015 के 53 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 92 प्रतिशत से अधिक हो गया।
“मिसिंग केस” यानी पहचान न होने वाले मरीजों की संख्या 2015 में 15 लाख थी, 2024 में घटकर एक लाख से कम हुई।
भारत में टीबी से मृत्यु दर 2015 में 28 प्रति लाख थी, 2024 में घटकर 21 प्रति लाख हो गई।
दवा प्रतिरोधी टीबी के मरीजों में कोई बड़ी वृद्धि नहीं, जबकि इलाज की सफलता दर 2024 में 90 प्रतिशत रही।
हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को तपेदिक (टीबी) के बारे में जागरूक करना और इस बीमारी को खत्म करने के लिए प्रयासों को मजबूत करना है। यह दिन 1882 में वैज्ञानिक रॉबर्ट कोच द्वारा टीबी के बैक्टीरिया की खोज की याद में मनाया जाता है। 2026 की थीम है “हां, हम टीबी को खत्म कर सकते हैं।”, जो यह संदेश देता है कि सही प्रयासों से टीबी को खत्म किया जा सकता है।
टीबी क्या है और क्यों खतरनाक है?
टीबी हवा के माध्यम से फैलती है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो यह बीमारी दूसरों तक पहुंच सकती है। अगर समय पर इलाज न हो, तो यह जानलेवा भी हो सकती है। अच्छी बात यह है कि टीबी का इलाज संभव है और सही दवाइयों से मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। फिर भी जागरूकता की कमी और देर से पहचान के कारण यह समस्या बनी रहती है।
वैश्विक स्तर पर टीबी की स्थिति
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ग्लोबल ट्यूबरक्लोसिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2024 में दुनिया भर में लगभग 1.07 करोड़ लोग टीबी से संक्रमित हुए। इनमें 58 लाख पुरुष, 37 लाख महिलाएं और 12 लाख बच्चे शामिल थे। इसी साल लगभग 12.3 लाख लोगों की मौत टीबी के कारण हुई, जिनमें 1.5 लाख एचआईवी से संक्रमित लोग भी थे।
टीबी आज भी दुनिया में एक ही संक्रामक रोग से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण है। यह हर देश और हर आयु वर्ग में मौजूद है, जिससे यह एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है।
टीबी नियंत्रण में धीमी प्रगति
दुनिया ने टीबी को कम करने के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन प्रगति अपेक्षा के अनुसार नहीं हुई है। 2015 से 2024 के बीच टीबी के मामलों में केवल 12.3 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि लक्ष्य 50 प्रतिशत की कमी का था। इसका मतलब है कि अभी बहुत काम बाकी है।
टीबी के फैलाव, दवा प्रतिरोधी मामलों में वृद्धि और समय पर पहचान न होने जैसी समस्याएं इस धीमी प्रगति के मुख्य कारण हैं। लगभग एक चौथाई विश्व की आबादी में टीबी का संक्रमण मौजूद है, जो भविष्य में बीमारी का कारण बन सकता है।
भारत में टीबी की स्थिति और सुधार
भारत ने टीबी को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में जहां टीबी की दर 237 प्रति लाख थी, वहीं 2024 में यह घटकर 187 प्रति लाख हो गई है। यह 21 प्रतिशत की कमी है, जो वैश्विक औसत से अधिक है।
2024 में भारत में लगभग 26.18 लाख टीबी मरीजों की पहचान हुई, जबकि कुल अनुमानित मामले 27 लाख थे। इसका मतलब है कि अब अधिकतर मरीजों की पहचान हो रही है और उन्हें इलाज मिल रहा है।
इलाज और सेवाओं में सुधार
भारत में टीबी के इलाज की पहुंच भी काफी बढ़ी है। 2015 में केवल 53 प्रतिशत मरीजों को इलाज मिल पाता था, लेकिन 2024 में यह बढ़कर 92 प्रतिशत से अधिक हो गया है। यह सुधार नई तकनीकों, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता अभियानों के कारण संभव हुआ है।
“मिसिंग केस” यानी वे मरीज जो पहले पहचान में नहीं आते थे, उनकी संख्या में भी भारी कमी आई है। 2015 में यह संख्या लगभग 15 लाख थी, जो 2024 में घटकर एक लाख से भी कम रह गई है।
मृत्यु दर में गिरावट
भारत में टीबी से होने वाली मौतों में भी कमी आई है। 2015 में जहां मृत्यु दर 28 प्रति लाख थी, वहीं 2024 में यह घटकर 21 प्रति लाख हो गई है। यह दर्शाता है कि समय पर इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों की जान बचाने में मदद कर रही हैं।
दवा प्रतिरोधी टीबी की समस्या
हालांकि प्रगति हुई है, लेकिन दवा प्रतिरोधी टीबी अभी भी एक बड़ी चुनौती है। इस प्रकार की टीबी में सामान्य दवाइयां काम नहीं करतीं, जिससे इलाज कठिन हो जाता है। 2024 में दुनिया भर में केवल 40 प्रतिशत ऐसे मरीजों को ही सही इलाज मिल पाया।
टीबी एक गंभीर लेकिन इलाज योग्य बीमारी है। भारत ने इस दिशा में काफी अच्छा काम किया है और कई महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल किए हैं। फिर भी, पूरी तरह टीबी मुक्त बनने के लिए अभी और प्रयास करने की जरूरत है।
जागरूकता, समय पर जांच, सही इलाज और सरकार के प्रयासों से हम इस बीमारी को खत्म कर सकते हैं। विश्व टीबी दिवस हमें यही प्रेरणा देता है कि हम मिलकर एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज का निर्माण करें।