जंगल की आग से हर साल 8.1 अरब टन मिट्टी का नुकसान, अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित

अफ्रीका में आग लगने से मिट्टी का सबसे ज्यादा 62 प्रतिशत नुकसान होता है, इसके बाद एशिया में 12, दक्षिण अमेरिका में 11, ओशिनिया में 10, उत्तरी अमेरिका में चार व यूरोप में एक प्रतिशत नुकसान होता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • हर साल जंगल की आग से 40 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि जलती है, जिससे वैश्विक स्तर पर गंभीर पर्यावरणीय और मिट्टी संकट पैदा होता है।

  • अध्ययन के अनुसार, जंगल की आग के कारण हर साल 8.1 अरब टन मिट्टी नष्ट होती है, जो कुल मिट्टी अपरदन का 19 फीसदी है।

  • अफ्रीका सबसे अधिक प्रभावित है, जहां जंगल की आग से होने वाले कुल वैश्विक मिट्टी नुकसान का 62 फीसदी हिस्सा दर्ज किया गया।

  • आग के बाद होने वाले मिट्टी अपरदन में केवल 31 फीसदी नई आग से और शेष 69 फीसदी पुरानी आगों के प्रभाव से होता है।

  • वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।

जंगल की आग आज दुनिया की एक बड़ी समस्या बन चुकी है। जब जंगल में आग लगती है, तो पेड़-पौधे जल जाते हैं, जानवरों का घर नष्ट हो जाता है और कई लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं। आमतौर पर हम जंगल की आग से होने वाले नुकसान को तुरंत दिखाई देने वाली चीजों तक ही सीमित समझते हैं। लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि जंगल की आग के बाद एक और बड़ा नुकसान होता है, जो लंबे समय तक बना रहता है। यह नुकसान है मिट्टी का बह जाना, जिसे मिट्टी अपरदन कहा जाता है

जंगल की आग और बारिश का असर

जब जंगल में आग लग जाती है, तो जमीन पर मौजूद पेड़, घास और पत्तियां जल जाती हैं। इससे मिट्टी खुली रह जाती है। बाद में जब बारिश होती है, तो पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहने लगता है। यह बहता हुआ पानी अपने साथ मिट्टी को भी बहा ले जाता है। इस प्रक्रिया से जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है, जो खेती और पौधों के लिए बहुत जरूरी होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह असर कुछ सालों के लिए नहीं, बल्कि कई दशकों तक रह सकता है।

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वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।

कितना बड़ा है यह संकट

हर साल दुनिया भर में लगभग 40 लाख वर्ग किलोमीटर जमीन जंगल की आग से जल जाती है। यह क्षेत्रफल लगभग पूरे यूरोपीय संघ के बराबर है। इसके बावजूद, अब तक यह नहीं समझा गया था कि इतनी बड़ी मात्रा में लगी आग से मिट्टी पर लंबे समय में क्या प्रभाव पड़ता है। इस कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने पहली बार पूरी दुनिया के स्तर पर जंगल की आग के बाद होने वाले मिट्टी अपरदन का अध्ययन किया।

किस तरह किया गया अध्ययन?

नेचर जियोसाइंस नामक पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन यूरोपीय आयोग के जॉइंट रिसर्च सेंटर और स्विट्जरलैंड की बेसल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने 2001 से 2019 तक के 20 वर्षों के आंकड़ों का उपयोग किया। सैटेलाइट तस्वीरों की मदद से उन्होंने यह देखा कि कहां-कहां जंगल की आग लगी और आग से पहले और बाद में जमीन की स्थिति कैसी थी।

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वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।

इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने एक कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल किया, जिसे रूसले कहा जाता है। यह मॉडल बारिश की मात्रा, जमीन की ढलान, मिट्टी की बनावट और पेड़-पौधों की स्थिति के आधार पर यह अनुमान लगाता है कि कितनी मिट्टी बह सकती है। इस मॉडल को जंगल की आग के बाद की स्थिति के अनुसार बदला गया।

चौंकाने वाले नतीजे

अध्ययन के नतीजे बहुत गंभीर हैं। शोध के अनुसार, जंगल की आग के कारण हर साल लगभग 8.1 अरब टन मिट्टी नष्ट हो जाती है। यह पूरी दुनिया में होने वाले कुल मिट्टी अपरदन का करीब 19 प्रतिशत है। यानी मिट्टी के नुकसान का एक बड़ा कारण जंगल की आग भी है।

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महाद्वीपों की बात करें तो अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित है। यहां दुनिया के कुल मिट्टी नुकसान का 62 प्रतिशत हिस्सा होता है। इसके बाद एशिया में 12 प्रतिशत, दक्षिण अमेरिका में 11 प्रतिशत, ओशिनिया में 10 प्रतिशत, उत्तरी अमेरिका में चार प्रतिशत और यूरोप में एक प्रतिशत मिट्टी का नुकसान होता है।

आग के बाद लंबे समय तक असर

इस अध्ययन की एक बहुत अहम बात यह है कि जंगल की आग के बाद होने वाला नुकसान बहुत लंबे समय तक चलता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल 31 प्रतिशत मिट्टी अपरदन नई आग के कारण होता है। बाकी 69 प्रतिशत नुकसान उन आगों की वजह से होता है, जो कई साल पहले लगी थीं। आग लगने के 20 साल बाद भी दुनिया के आधे से ज्यादा जले हुए इलाके पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाते।

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भविष्य में और बढ़ सकता है खतरा

जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का स्वरूप बदल रहा है। कई जगहों पर अब ज्यादा तेज और अचानक बारिश हो रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यही स्थिति रही, तो साल 2070 तक जंगल की आग के बाद होने वाला मिट्टी अपरदन 28 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इससे जमीन और पर्यावरण को और ज्यादा नुकसान होगा।

समाधान और आगे की राह

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब केवल प्रकृति के अपने आप ठीक होने का इंतजार करना सही नहीं है। जंगल की आग के बाद तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए पेड़-पौधे दोबारा लगाना, मिट्टी को बहने से रोकने के उपाय करना और सही भूमि प्रबंधन नीतियां बनाना जरूरी है।

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वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण साल 2070 तक आग के बाद मिट्टी अपरदन 28 फीसदी तक बढ़ सकता है।

जंगलों को मजबूत बनाकर ही हम भूमि को खराब होने से बचा सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के असर को कम कर सकते हैं।

जंगल की आग सिर्फ आग लगने के समय ही नुकसान नहीं करती, बल्कि इसके असर सालों तक बने रहते हैं। मिट्टी का लगातार बहना एक छुपा हुआ खतरा है, जिसे समझना और उस पर समय रहते काम करना बहुत जरूरी है।

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