

पूर्वोत्तर के संवेदनशील दीपर बील वन्यजीव अभ्यारण्य से लेकर ओडिशा के पुरी स्थित ग्राम्य जंगल तक, पर्यावरण और सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण एवं नियमों के उल्लंघन के मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।
असम में रेलवे दोहरीकरण परियोजना के लिए सौ वर्ष से अधिक पुराने पेड़ों की कटाई के आरोपों पर एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय समेत संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा है।
याचिका में दावा किया गया है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की शर्तों के बावजूद करीब 100 परिपक्व पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि कई अन्य पेड़ों को काटने के लिए चिन्हित किया गया है। साथ ही, परियोजना के लिए जरूरी पर्यावरणीय मंजूरियों और इको-सेंसिटिव जोन से जुड़े दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए गए हैं।
वहीं ओडिशा के पुरी में ग्राम्य जंगल, गोचर भूमि और जल निकायों पर कथित अतिक्रमण के मामले में एनजीटी ने विवादित क्षेत्र में सभी नए निर्माण कार्यों पर तत्काल रोक लगा दी है।
ट्रिब्यूनल ने जिला प्रशासन और पुलिस को आदेश दिया है कि अगले निर्देश तक किसी भी प्रकार का निर्माण न होने दिया जाए। दोनों मामलों में एनजीटी का हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि पर्यावरणीय कानूनों और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका किसी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने असम के प्रसिद्ध दीपोर बील वन्यजीव अभ्यारण्य' और उसके आस-पास के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में कथित रूप से पेड़ों की हो रही अवैध कटाई पर कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने इस मामले में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जवाब मांगा है।
यह पूरा विवाद न्यू बंगाईगांव–गोलपाड़ा टाउन–कामाख्या रेलवे लाइन को दोहरी बनाने की परियोजना (एनबीक्यू-जीएलपीटी-केवाईक्यू) से जुड़ा है।
ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण मंत्रालय के साथ-साथ असम राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे (एनएफआर), वन प्रभागीय अधिकारी तथा गुवाहाटी वन्यजीव प्रभाग को भी अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। सभी पक्षों को दो महीने के भीतर जवाब दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त, 2026 को होनी है।
याचिकाकर्ता दुर्लव तालुकदार ने ट्रिब्यूनल को जानकारी दी है कि दीपर बील न केवल एक अंतरराष्ट्रीय महत्व की 'रामसर आर्द्रभूमि' है, बल्कि यह हाथियों का एक बेहद महत्वपूर्ण गलियारा और जैव विविधता का केंद्र भी है। यह आर्द्रभूमि मानसून के दौरान गुवाहाटी शहर को बाढ़ से बचाती है और स्थानीय लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है। साथ ही यह क्षेत्र की जल-व्यवस्था को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है।
आवेदक के अनुसार, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थाई समिति ने 22 फरवरी, 2024 को परियोजना के लिए कम से कम पेड़ काटने की शर्त लगाई थी। इसके बावजूद करीब 200 पेड़ों को काटने के लिए चिन्हित किया गया है और करीब 100 परिपक्व, सौ वर्ष से भी अधिक पुराने पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह समिति द्वारा निर्धारित मंजूरी की शर्तों का सीधा उल्लंघन है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि परियोजना प्रस्ताव में अभयारण्य के भीतर केवल 0.52 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के लिए वन एवं वन्यजीव स्वीकृति मांगी गई है, जबकि परियोजना के लिए कुल 13.31 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है। शेष 12.79 हेक्टेयर भूमि, जो डिफॉल्ट इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) क्षेत्र में आती है, उससे संबंधित आवश्यक दस्तावेज और प्रस्ताव ‘परिवेश’ पोर्टल पर उपलब्ध नहीं हैं। उनका कहना है कि यह चूक नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, हालांकि परियोजना के लिए आवश्यक मंजूरियों के आवेदन परिवेश पोर्टल पर दायर किए जा चुके हैं, लेकिन अब तक परियोजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है और आवेदन अभी भी विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन हैं और उनकी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है।
ओडिशा: ग्राम्य जंगल में अवैध निर्माण पर एनजीटी की रोक, पुरी के जिला मजिस्ट्रेट को दिए सख्त निर्देश
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने ओडिशा के पुरी में पर्यावरण और सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। एनजीटी ने 27 मई 2026 को गोप तहसील स्थित बैरीपुर ग्राम्य जंगल (ग्रामीण वन क्षेत्र) में अगले आदेश तक किसी भी नए निर्माण पर रोक लगा दी है।
साथ ही ट्रिब्यूनल ने पुरी के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि विवादित भूमि पर किसी भी तरह का नया निर्माण नहीं होना चाहिए।
यह विवाद राधाबल्लभ हायर सेकेंडरी स्कूल द्वारा ग्राम्य जंगल की जमीन पर किए गए कथित अतिक्रमण और अवैध निर्माण से जुड़ा है। याचिका के अनुसार जिस जमीन पर निर्माण हो रहा है, वह ओडिशा के राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग की है। आरोप है कि वन भूमि पर पहले से ही कुछ इमारतें खड़ी कर दी गई हैं और निर्माण कार्य लगातार जारी है।
स्कूल प्रशासन पर केवल जंगल ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों की 'गोचर' भूमि (मवेशियों के चरने की भूमि) और स्थानीय जल निकायों पर भी अवैध अतिक्रमण का आरोप लगा है।
अदालत को जानकारी दी गई है कि राजस्व निरीक्षक ने इस गड़बड़ी की जांच कर गोप के तहसीलदार को रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे आगे की कार्रवाई के लिए पुरी के कलेक्टर को भेज दिया गया था। इसके बावजूद, कलेक्टर की ओर से इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, जिसके बाद मामला एनजीटी के दरवाजे तक पहुंचा है।
एनजीटी ने पहले 16 फरवरी 2026 को सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन केवल कुछ ही पक्षों ने इसका पालन किया। अब ट्रिब्यूनल ने शेष सभी पक्षों को एक महीने के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है।