

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मध्य प्रदेश के सागर और छतरपुर जिलों में कैंपा फंड के उपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए मुख्य वन संरक्षक से वृक्षारोपण की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
ट्रिब्यूनल ने पेड़ कटाई की अनुमति, वास्तविक स्थिति और जमा राशि के उपयोग की जानकारी देने का निर्देश दिया है।
यह मामला भारतमाला परियोजना के तहत सागर-हीरापुर बायपास और मोहारी-साथिया घाटी क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों के काटे जाने से जुड़ा है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मध्य प्रदेश के सागर और छतरपुर जिलों में कैंपा फंड के उपयोग को लेकर सख्त रुख अपनाया है। 4 फरवरी 2026 को ट्रिब्यूनल ने दोनों जिलों के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) को निर्देश दिया है कि वे वृक्षारोपण के लिए जमा धनराशि और उसकी वास्तविक स्थिति पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
यह मामला भारतमाला परियोजना के तहत सागर-हीरापुर बायपास और मोहारी-साथिया घाटी क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों के काटे जाने से जुड़ा है।
कितने पेड़ों की अनुमति, कितने वास्तव में कटे?
एनजीटी ने रिपोर्ट में यह स्पष्ट करने को कहा है कि कुल कितने पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई, अब तक वास्तव में कितने पेड़ काटे जा चुके हैं और इसके बदले राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने कैंपा फंड में कितनी राशि जमा की है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी आदेश दिया है कि रिपोर्ट में यह जानकारी शामिल हो कि जमा राशि का अब तक कहां और कैसे उपयोग हुआ है। इसके साथ ही किस साइट पर कितने पेड़ लगाए गए, उनकी प्रमुख प्रजातियों का विवरण शामिल होना चाहिए। साथ ही सीसीएफ द्वारा ताजा निगरानी में पौधों की जीवित रहने की दर भी बतानी होगी।
एनजीटी ने आगे यह भी कहा है कि यदि फंड का कुछ हिस्सा अब तक खर्च नहीं हुआ है तो उसके लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना तैयार की जाए, ताकि वृक्षारोपण कार्य जल्द से जल्द पूरा हो सके।
पौधों की जीवित रहने की दर पर भी सवाल
आवेदक ने ट्रिब्यूनल को जानकारी दी है कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने वृक्षारोपण के लिए करीब 27 करोड़ रुपए कैंपा फंड में जमा किए हैं। इसमें से 19.54 करोड़ रुपये सागर उत्तर वन मंडल और 8.34 करोड़ रुपये छतरपुर वन मंडल को दिए गए।
मुआवजे के तौर पर पेड़ लगाने के लिए जमा की गई रकम का इस्तेमाल पहले से पहचाने गए इलाके में पेड़ लगाने के लिए किया जाना चाहिए। आवेदक की शिकायत है कि पेड़ लगाने के मकसद से दिए गए और जमा किए गए फंड का गलत इस्तेमाल हो रहा है या कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है, जिससे ग्रीन बेल्ट पर बुरा असर पड़ रहा है।