150 बनाम 5,000: पंजाब में खैर के पेड़ों के काटे जाने पर उठे सवाल, एनजीटी ने मांगा हिसाब

आवेदक के मुताबिक सरकारी रिकॉर्ड में महज 150 पेड़ों के काटे जाने का जिक्र है, लेकिन पड़ताल में खैर के हरे-भरे 2,000 से 5,000 पेड़ों के काटे जाने की बात सामने आई है।
खैर का पेड़ केवल एक वन संपदा नहीं, बल्कि कई उद्योगों और पारंपरिक चिकित्सा का आधार है। इससे औषधियां बनती हैं, पान और पान मसाले में इस्तेमाल होने वाला कत्था तैयार होता है, और चमड़ा उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग चमक देने के लिए किया जाता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीमीडिया कॉमन्स
खैर का पेड़ केवल एक वन संपदा नहीं, बल्कि कई उद्योगों और पारंपरिक चिकित्सा का आधार है। इससे औषधियां बनती हैं, पान और पान मसाले में इस्तेमाल होने वाला कत्था तैयार होता है, और चमड़ा उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग चमक देने के लिए किया जाता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीमीडिया कॉमन्स
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सारांश
  • पंजाब की रूपनगर फॉरेस्ट डिवीजन में खैर के पेड़ों की कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हुई अवैध कटाई ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • जहां रिकॉर्ड में महज 150 पेड़ों के काटे जाने का जिक्र है, वहीं जमीनी पड़ताल में 2,000 से 5,000 पेड़ों के काटे जाने का दावा इस पूरे मामले को और संदिग्ध बना देता है। इस बड़े अंतर ने न सिर्फ प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि संवेदनशील शिवालिक क्षेत्र में पर्यावरणीय क्षति की आशंका भी बढ़ा दी है।

  • मामले की गंभीरता को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब के मुख्य सचिव समेत शीर्ष वन और जिला अधिकारियों से जवाब तलब किया है। शिकायत में वन माफिया और कुछ अधिकारियों की कथित मिलीभगत तथा पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश के उल्लंघन के आरोप भी लगाए गए हैं।

  • तेजी से सिमटते खैर के जंगल, उसकी बढ़ती औद्योगिक और औषधीय मांग, और अब सामने आई यह कथित अवैध कटाई, ये सभी संकेत देते हैं कि अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह बहुमूल्य और दुर्लभ होता जा रहा वृक्ष गंभीर संकट में पड़ सकता है। अब 5 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां इस पूरे मामले में जवाबदेही और आगे की कार्रवाई तय होगी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने रूपनगर फॉरेस्ट डिवीजन में खैर के पेड़ों की बड़े पैमाने पर कथित अवैध कटाई के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब के मुख्य सचिव से जवाब तलब किया है।

20 अप्रैल, 2026 को ट्रिब्यूनल ने इस मामले में पंजाब के मुख्य सचिव, प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (पीसीसीएफ), डिप्टी कमिश्नर रूपनगर; डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर और शिवालिक हिल्स सर्कल के वन संरक्षक को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई से पहले अपना पक्ष रखने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 को होनी है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि रूपनगर वन मंडल के भीतर फतेहपुर, भगवाली और भंगाला गांवों के संरक्षित जंगलों में खैर के पेड़ों की बड़े पैमाने पर अवैध कटाई की गई।

2,000 से 5,000 पेड़ों के काटे जाने का दावा

यह इलाका पारिस्थितिक रूप से बेहद संवेदनशील शिवालिक पहाड़ी क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। आवेदक के अनुसार इस इलाके में खैर के सैकड़ों हरे पेड़ों को गैर-कानूनी तरीके से काटकर वन क्षेत्र से हटा दिया गया।

हालांकि सरकारी रिकॉर्ड में महज 150 पेड़ों के काटे जाने का जिक्र है, लेकिन पड़ताल में खैर के हरे-भरे 2,000 से 5,000 पेड़ों के काटे जाने का दावा किया गया है।

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खैर का पेड़ केवल एक वन संपदा नहीं, बल्कि कई उद्योगों और पारंपरिक चिकित्सा का आधार है। इससे औषधियां बनती हैं, पान और पान मसाले में इस्तेमाल होने वाला कत्था तैयार होता है, और चमड़ा उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग चमक देने के लिए किया जाता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीमीडिया कॉमन्स

शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि लकड़ी माफिया ने कुछ सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से इस अवैध कटाई को अंजाम दिया। साथ ही, यह भी कहा गया है कि यह कार्रवाई पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश का उल्लंघन है, जिसमें पंजाब में किसी भी उम्र या प्रजाति के पेड़ को बिना अदालत की अनुमति के काटने पर रोक लगाई गई है।

अब इस मामले में सभी की निगाहें 5 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि जंगलों के इस नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है और इसपर आगे क्या कार्रवाई होगी।

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गुणों की वजह से खैर के पेड़ों पर वन माफिया की नजर, तेजी से सिमट रहा जंगल
खैर का पेड़ केवल एक वन संपदा नहीं, बल्कि कई उद्योगों और पारंपरिक चिकित्सा का आधार है। इससे औषधियां बनती हैं, पान और पान मसाले में इस्तेमाल होने वाला कत्था तैयार होता है, और चमड़ा उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग चमक देने के लिए किया जाता है; प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीमीडिया कॉमन्स

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में खैर के जंगल तेजी से सिमट रहे हैं, और वन विभाग ने इसे अब दुर्लभ वृक्षों की श्रेणी में शामिल कर लिया है। नेशनल फारेस्ट पॉलिसी 1988 भी स्पष्ट रूप से कहती है कि वन संपदा का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है, ताकि पेड़ों की प्रजातियां समाप्त न हों।

क्यों बेहद खास है खैर

चिंता की बात यह है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने 2004 में दुनिया भर की पेड़ों की करीब 552 प्रजातियों को संकटग्रस्त बताया था, जिनमें से करीब 45 फीसदी भारत की थीं, इन्हीं में खैर भी शामिल है।

खैर का पेड़ केवल एक वन संपदा नहीं, बल्कि कई उद्योगों और पारंपरिक चिकित्सा का आधार है। इससे औषधियां बनती हैं, पान और पान मसाले में इस्तेमाल होने वाला कत्था तैयार होता है, और चमड़ा उद्योग में इसकी लकड़ी का उपयोग चमक देने के लिए किया जाता है।

इसकी पत्तियां प्रोटीन से भरपूर होने के कारण ऊंट और बकरियों के चारे के रूप में भी बेहद मांग में रहती हैं। इतना ही नहीं, चारकोल बनाने और आयुर्वेद में डायरिया व पाइल्स जैसे रोगों के उपचार में भी इसका उपयोग होता है। इसी बढ़ती मांग ने खैर के पेड़ों पर सबसे बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है।

मुनाफे की इस दौड़ में जंगलों से इनकी अवैध कटाई लगातार जारी है, जिससे यह बहुमूल्य वृक्ष धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रहा है।

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