पश्चिम बंगाल: दो साल में 1.3 फीसदी घटा 'ओपन फॉरेस्ट’ एरिया, घने जंगलों में भी आई कमी

पश्चिम बंगाल पर्यावरण विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य में ‘ओपन फॉरेस्ट एरिया’ जो 2017 में 9,706 वर्ग किलोमीटर था, वो 2019 में घटकर 9,581 वर्ग किलोमीटर रह गया।
इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
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सारांश
  • पश्चिम बंगाल की ताजा रिपोर्ट एक अहम चेतावनी देती है—जंगलों का कुल विस्तार भले बढ़ता दिखे, लेकिन उनकी गुणवत्ता लगातार गिर रही है।

  • रिपोर्ट से पता चला है कि पश्चिम बंगाल में दो वर्षों में ‘ओपन फॉरेस्ट एरिया’ में 1.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसी तरह बेहद घने जंगलों में भी करीब दो फीसदी की कमी आई है।

  • इसी तरह ‘वेरी डेंस फॉरेस्ट’ यानी बेहद घने जंगलों का क्षेत्र 2017 में 2,994 वर्ग किलोमीटर से घटकर 2019 में 2,936 वर्ग किलोमीटर रह गया। मतलब कि इस दौरान बेहद घने जंगलों में करीब दो फीसदी की गिरावट आई है।

  • ‘ओपन फॉरेस्ट’ और बेहद घने जंगलों में आई कमी यह संकेत है कि संरक्षण के प्रयास जमीनी स्तर पर पर्याप्त असर नहीं डाल पा रहे हैं।

  • अगर यही रुझान जारी रहा, तो यह गिरावट न सिर्फ पारिस्थितिकी संतुलन बल्कि जलवायु सुरक्षा और जैव विविधता के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है।

पश्चिम बंगाल में दो वर्षों में ‘ओपन फॉरेस्ट एरिया’ में 1.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसी तरह बेहद घने जंगलों में भी करीब दो फीसदी की कमी आई है। यह जानकारी 21 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल के पर्यावरण विभाग द्वारा राज्य में जंगलों को लेकर जारी ताजा स्थिति रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया हर दो वर्षों में इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट’ जारी करता है, जिसमें जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) और रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

राज्य में भी इस दिशा में लंबे समय से काम हो रहा है। वन निदेशालय ने पश्चिम बंगाल में जुलाई 1999 में जीआईएस सेल की स्थापना की थी। तब से राज्य का वन विभाग, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के सर्वे के दौरान रिमोट सेंसिंग डेटा की जमीनी सच्चाई (ग्राउंड ट्रुथिंग) की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करता रहा है।

विभाग डिजिटल मैप तैयार कर रहा है, सैटेलाइट इमेजरी का विश्लेषण कर रहा है और फील्ड स्टाफ को जीआईएस तकनीक का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि जंगलों की निगरानी और अधिक सटीक व प्रभावी हो सके।

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रिपोर्ट में जारी आंकड़े बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। वन विभाग की 2020-21 की प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, 1981 से 2021 के बीच राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का महज 13.38 फीसदी हिस्सा वन भूमि के रूप में दर्ज था। हालांकि 2021 में फॉरेस्ट और ट्री कवर मिलाकर यह आंकड़ा 21.1  प्रतिशत तक पहुंच गया।

ओपन फॉरेस्ट में कमी: क्या कह रहे हैं आंकड़े?

लेकिन घने जंगलों में आती गिरावट चिंता बढ़ा रही है। 2021-22 की रिपोर्ट के मुताबिक ‘वेरी डेंस फॉरेस्ट’ यानी बेहद घने जंगलों का क्षेत्र 2017 में 2,994 वर्ग किलोमीटर से घटकर 2019 में 2,936 वर्ग किलोमीटर रह गया। मतलब कि इस दौरान बेहद घने जंगलों में करीब दो फीसदी की गिरावट आई।

इसी तरह ‘ओपन फॉरेस्ट’ का क्षेत्र भी 9,706 वर्ग किलोमीटर से घटकर 9,581 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस दौरान इसमें करीब 1.3 फीसदी की गिरावट आई। यह संकेत है कि पश्चिम बंगाल के जंगलों की गुणवत्ता में धीरे-धीरे कमी आ रही है।

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गौरतलब है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 7 अगस्त 2025 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वन और वृक्ष आच्छादन की पूरी जानकारी के साथ स्थिति रिपोर्ट दाखिल करें। इसी आदेश के तहत पश्चिम बंगाल की यह रिपोर्ट सामने आई है।

आंकड़े साफ संकेत देते हैं भले ही राज्य के जंगलों में विस्तार हुआ है और निगरानी जरूर मजबूत हुई है। लेकिन बेहद घने जंगलों और ‘ओपन फॉरेस्ट’ में आ रही गिरावट पर्यावरण के संतुलन के लिए खतरे की घंटी है, जो बताती है कि संरक्षण की कोशिशें अभी जमीन पर उतनी असरदार नहीं हो पा रही हैं।

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