जंगलों के काटे जाने को बढ़ावा दे रही हैं चावल, मक्का और कसावा जैसी फसलें

2001 से 2022 के बीच 12.1 करोड़ हेक्टेयर जंगल का सफाया हुआ जिसके कारण 41.2 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन दर्ज किया गया
2001 से 2022 के बीच विश्वभर में लगभग 12.1 करोड़ हेक्टेयर जंगल खेती और चरागाह विस्तार के कारण नष्ट हुए।
2001 से 2022 के बीच विश्वभर में लगभग 12.1 करोड़ हेक्टेयर जंगल खेती और चरागाह विस्तार के कारण नष्ट हुए।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • चावल, मक्का और कसावा मिलकर वैश्विक वन कटाव का लगभग 11 प्रतिशत हिस्से के लिए अकेले जिम्मेदार पाए गए।

  • 2001 से 2022 के बीच में जंगलों के काटे जाने से लगभग 41.2 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुई।

  • चरागाह विस्तार कुल पेड़ों के काटे जाने का 42 प्रतिशत और कार्बन उत्सर्जन का लगभग 52 प्रतिशत कारण बना।

  • अध्ययन में 179 देशों की 184 खाद्य वस्तुओं का विश्लेषण कर उपग्रह आंकड़ों से विस्तृत निष्कर्ष तैयार किए गए।

  • 2001 से 2022 के बीच विश्वभर में लगभग 12.1 करोड़ हेक्टेयर जंगल खेती और चरागाह विस्तार के कारण नष्ट हुए।

हाल ही में नेचर फूड पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि चावल, मक्का और कसावा जैसी मुख्य खाद्य फसलें भी जंगलों की कटाई का बड़ा कारण हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि केवल पाम तेल, सोयाबीन या पशुपालन ही जंगलों के काटे जाने के लिए जिम्मेदार हैं। लेकिन इस नए शोध से पता चलता है कि रोज खाई जाने वाली फसलें भी इस समस्या में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

क्या कहता है अध्ययन?

शोध के अनुसार 2001 से 2022 के बीच दुनिया भर में लगभग 12.1 करोड़ हेक्टेयर जंगल नष्ट हुए। यह नुकसान मुख्य रूप से खेती के विस्तार, चरागाह बनाने और जंगलों को कृषि भूमि में बदलने के कारण हुआ। इस पूरी प्रक्रिया से लगभग 41.2 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्सर्जन हुआ।

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अध्ययन में पाया गया कि चावल, मक्का और कसावा मिलकर कुल वैश्विक वन कटाव का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा हैं। यह प्रतिशत कोको, कॉफी और रबर जैसी फसलों से भी अधिक है। इसका मतलब है कि जिन फसलों को हम रोज खाते हैं, वे भी पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव डाल रही हैं।

अन्य फसलों से अलग स्थिति

तेल पाम की खेती मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में केंद्रित है और सोयाबीन का उत्पादन अधिकतर दक्षिण अमेरिका में होता है। लेकिन चावल, मक्का और कसावा की खेती दुनिया के कई देशों में होती है। इसलिए इनसे जुड़ा वन कटाव भी अलग-अलग क्षेत्रों में फैला हुआ है। यही कारण है कि इस समस्या को नियंत्रित करना थोड़ा कठिन हो जाता है।

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चरागाहों के विस्तार को भी जंगलों का काटा जाने का बड़ा कारण बताया गया है। कुल वन कटाव का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा चरागाह बनाने के कारण हुआ। इससे कार्बन उत्सर्जन भी अधिक हुआ।

नया मॉडल कैसे मदद करता है?

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक नया मॉडल तैयार किया, जिसका नाम है वनों की कटाई और कार्बन उत्सर्जन (डीईडीयूसीई) है। इस मॉडल ने उपग्रह से प्राप्त पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को खेती से जुड़े आंकड़ों के साथ जोड़ा। इसमें 179 देशों की 184 खाद्य वस्तुओं का विश्लेषण किया गया गया।

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इससे यह समझने में मदद मिली कि कौन-सी फसल किस देश में और कितनी मात्रा में जंगलों के काटे जाने से जुड़ी है। पहले उपलब्ध आंकड़े सीमित थे, जिससे पूरी तस्वीर साफ नहीं हो पाती थी। यह नया मॉडल सरकारों और कंपनियों को सही जानकारी दे सकता है।

पर्यावरण पर प्रभाव

जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे जलवायु को संतुलित रखते हैं, जानवरों और पक्षियों का घर होते हैं और कार्बन को अपने अंदर जमा करके पृथ्वी को गर्म होने से बचाते हैं। जब जंगल काटे जाते हैं, तो कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में फैलती है और जलवायु परिवर्तन तेज होता है।

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यदि मुख्य खाद्य फसलों की खेती के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाएंगे, तो भविष्य में पर्यावरण संकट और गंभीर हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि खेती के तरीके अधिक टिकाऊ बनाए जाएं।

आगे क्या किया जा सकता है?

सरकारों को चाहिए कि वे कृषि विस्तार की योजना बनाते समय जंगलों की रक्षा को प्राथमिकता दें। किसानों को बेहतर तकनीक और आधुनिक खेती के साधन दिए जाएं ताकि कम भूमि में अधिक उत्पादन हो सके। इससे नए जंगल काटने की जरूरत कम होगी।

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कंपनियों को भी अपनी आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके उत्पाद वनों की कटाई से जुड़े न हों। उपभोक्ता भी जागरूक होकर पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद चुन सकते हैं।

यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि केवल बड़ी व्यावसायिक फसलें ही नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की मुख्य खाद्य फसलें भी वन कटाव में योगदान दे रही हैं। यदि हमें जलवायु परिवर्तन को रोकना है और जंगलों को बचाना है, तो हमें खेती और खाद्य उत्पादन के तरीकों पर गंभीरता से विचार करना होगा। टिकाऊ कृषि और जिम्मेदार नीतियां ही भविष्य के लिए सही रास्ता दिखा सकती हैं।

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