क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का पैसा दूसरे विकास कार्यों पर हो रहा है खर्च? एनजीटी ने राज्यों से मांगा हिसाब

एनजीटी ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पर्यावरण फंड के इस्तेमाल का पूरा ब्योरा मांगा है, अब सीपीसीबी की रिपोर्ट से पता चलेगा कि यह पैसा प्रदूषण नियंत्रण पर या दूसरे सरकारी कामों में खर्च हुआ है।
फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर जुटाया गया पैसा आखिर कहां खर्च हो रहा है? क्या पर्यावरण की रक्षा के लिए बने फंड का इस्तेमाल दूसरे सरकारी विकास कार्यों के लिए किया जा रहा है?

  • इन सवालों के बीच नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों के पर्यावरण फंड के इस्तेमाल का पूरा ब्योरा मांगा है।

  • 3 अगस्त 2026 की सुनवाई में एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को राज्यों से मिली जानकारी को तालिकाबद्ध रूप में पेश करने का निर्देश दिया।

  • मामले की शुरुआत कर्नाटक से हुई, जहां राज्य सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के फंड से मानव-हाथी संघर्ष कम करने, वनीकरण और तटीय लचीलापन परियोजना जैसे कार्यों के लिए करोड़ों रुपये मांगने की कोशिश की थी। फरवरी 2026 में एनजीटी ने इसे देशभर में मौजूद एक बड़ी समस्या का संकेत बताया था।

  • अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा कहां खर्च हुआ, बल्कि यह भी है कि पर्यावरण के नाम पर जुटाई गई रकम का इस्तेमाल क्या उसी उद्देश्य के लिए हुआ, जिसके लिए वह जुटाई गई थी? सीपीसीबी की रिपोर्ट से इस पर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों के पर्यावरण कोष का उपयोग अन्य सरकारी कार्यों में किए जाने के मामले में सख्त रुख अपनाया है।

3 अगस्त, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से सभी राज्यों के जवाबों को तालिकाबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

यह मामला अंग्रेजी अखबार द दक्कन हेराल्ड में 23 नवंबर, 2025 को प्रकाशित एक खबर के बाद प्रकाश में आया था, जिसके बाद एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लिया।

कर्नाटक से उठा सवाल, अब पूरे देश में जांच

इस खबर में आरोप लगाया गया था कि कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के फंड का उपयोग प्रदूषण नियंत्रण के बजाय अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए करने की कोशिश की जा रही है।

खबर के अनुसार, कर्नाटक सरकार ने वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के माध्यम से इंसान और हाथियों के बीच संघर्ष को कम करने के लिए रेलवे बैरिकेडिंग और वनीकरण कार्यों हेतु 300 करोड़ रुपए मांगे थे।

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इसमें 200 करोड़ रुपये 7.5 फीसदी ब्याज पर ऋण और 100 करोड़ रुपए अनुदान के रूप में मांगे गए थे। इसके अलावा कर्नाटक स्ट्रेंथनिंग ऑफ कोस्टल रेजिलिएंस इकोनॉमी परियोजना के लिए 126 करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त ऋण भी मांगा गया था।

एनजीटी ने 23 फरवरी 2026 को कहा कि यह मामला केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में मौजूद एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करता है। कई जगह ऐसे विकास कार्यों के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के फंड का इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है, जिनकी जिम्मेदारी अन्य संबंधित सरकारी संस्थाओं की है।

ऐसे में एनजीटी ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।

किसने कहां खर्च किया पर्यावरण का पैसा, होगी जांच

3 अगस्त को हुई सुनवाई में अदालत को बताया गया कि कुछ राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों ने अपने जवाब दाखिल कर दिए हैं।

वहीं तमिलनाडु, मेघालय, उत्तर प्रदेश, केरल तथा दमन-दीव और लद्दाख की प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और समितियों ने अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा है।

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सीपीसीबी ने भी राज्यों से प्राप्त सूचनाओं को संकलित करने के लिए समय की मांग की, जिसे स्वीकार करते हुए एनजीटी ने उसे सभी जानकारियां व्यवस्थित तालिका के रूप में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यमुना नदी के जलग्रहण क्षेत्र में छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (माइक्रो एसटीपी) लगाने के लिए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति फंड के इस्तेमाल की अनुमति मांगी है। इस पर सीपीसीबी ने जवाब दाखिल करने के लिए एनजीटी से समय मांगा। साथ ही राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) को भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।

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गौरतलब है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के फंड का मकसद प्रदूषण से लड़ना और पर्यावरण की रक्षा करना है, न कि सरकारों की दूसरी विकास योजनाओं के लिए वित्तीय सहारा बनना।

अब एनजीटी की निगाह इस बात पर है कि राज्यों ने इन पैसों का इस्तेमाल कहां और कैसे किया। आने वाले दिनों में सीपीसीबी के जवाब से तस्वीर साफ होगी कि पर्यावरण के नाम पर जुटाई गई रकम वास्तव में पर्यावरण पर खर्च हुई या विकास के दूसरे कामों में खप गई।

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