

वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि दुनिया भर में घास के मैदान और आर्द्रभूमियां तेजी से गायब हो रही हैं और इन्हें जंगलों की तुलना में करीब चार गुणा तेज रफ्तार से खेती और चरागाह में बदला जा रहा है।
मांस, अनाज और पशु-चारे की बढ़ती वैश्विक मांग इस बदलाव को बढ़ा रही है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इससे जलवायु संतुलन, जैव विविधता और लाखों लोगों की आजीविका पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
चिंता की बात यह है कि इस संकट से भारत के साथ ब्राजील, रूस, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देश भी प्रभावित हो रहे हैं, जो संकेत देता है कि अगर संरक्षण नीतियां केवल जंगलों तक सीमित रहीं तो धरती के अन्य अहम पारिस्थितिक तंत्र तेजी से खत्म हो सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की चर्चा अक्सर जंगलों तक सिमट जाती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं व्यापक और चिंताजनक है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, दुनिया में घास के मैदान और आर्द्रभूमियां भी तेजी से खत्म हो रहे हैं। इस बदलाव की चाल, जंगलों के उजड़ने की रफ्तार से भी अधिक है।
चिंता की बात यह है कि यह संकट महज अमेजन या अफ्रीका तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित कई देशों को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहा है।
यह अध्ययन जर्मनी, स्वीडन, अमेरिका, नीदरलैंड्स के कई संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इसमें स्वीडन के चाल्मर्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर मार्टिन पर्सन और जर्मनी के फ्रैंकफर्ट स्थित सेनकेनबर्ग बायोडायवर्सिटी एंड क्लाइमेट रिसर्च सेंटर के शोधकर्ता सिया कान सहित कई वैज्ञानिक शामिल थे।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि 2005 से 2020 के बीच दुनिया में घास के मैदान और आर्द्रभूमि जैसे यह महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र जंगलों की तुलना में करीब चार गुणा तेजी से कृषि भूमि और चरागाहों में बदले गए हैं।
क्यों अहम हैं घास के मैदान?
घास के ये मैदान सिर्फ हरी चादर नहीं, बल्कि धरती के अनदेखे “जीवन रक्षक” भी हैं, जो जलवायु के संतुलन को बनाए रखते हैं। मिट्टी को बचाते हैं और असंख्य जीवों को आश्रय देते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में संग्रहित कुल कार्बन का करीब 20 से 35 फीसदी हिस्सा इन्हीं में सुरक्षित है। यानी ये जलवायु परिवर्तन को कम करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
वैश्विक जैव विविधता के करीब 33 फीसदी हॉटस्पॉट इन्हीं क्षेत्रों में हैं। इसके साथ ही ये पानी को संजोने के साथ-साथ मिट्टी के कटाव को रोकने और हजारों जीवों को आश्रय देने का भी काम करते हैं। इनसे न केवल पर्यावरण बल्कि स्थानीय समुदायों और वैश्विक जलवायु को भी सीधा लाभ मिलता है।
डॉक्टर सियी कान का कहना है, “जंगलों के काटे जाने पर काफी शोध हुआ है, लेकिन वनों के अलावा अन्य पारिस्थितिक तंत्रों पर, खासकर पशुपालन और वैश्विक कृषि मांग से जुड़े बदलावों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।“
मांस और अनाज की बढ़ती मांग बना रही दबाव
अध्ययन में 2005 से 2020 के बीच यह देखा गया कि घास के मैदान और आर्द्रभूमि को किस तेजी से खेती और चरागाह में बदला गया। शोध में पाया गया कि इन क्षेत्रों को सबसे ज्यादा पशुपालन और कृषि के लिए बदला जा रहा है। इसके पीछे की मुख्य वजह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांस, अनाज, मेवे और तिलहन की बढ़ती मांग है।
अध्ययन के मुताबिक भले ही क्षेत्रों के अनुसार इस बदलाव के कारण अलग-अलग थे, लेकिन वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक क्षेत्रों को खेती या चरागाह में बदलने का 50 फीसदी हिस्सा पशुपालन (चरागाह) से जुड़ा था।
इसके अलावा 27 फीसदी बदलाव खाद्यान्न फसलों, 17 फीसदी पशु-चारे के लिए और छह फीसदी अन्य उपयोगों (मुख्य रूप से बायोएनर्जी) के लिए किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि पशुपालन से जुड़े ज्यादातर उत्पाद घरेलू मांग पूरी करने के लिए थे। वहीं, चारे की फसलों का 32 फीसदी और कुल फसलों का करीब 20 फीसदी हिस्सा निर्यात किया गया। ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में तो निर्यात का हिस्सा 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंच गया।
प्रोफेसर मार्टिन पर्सन के मुताबिक, अब केवल उष्णकटिबंधीय जंगलों पर ही ध्यान देना काफी नहीं है। रूस, चीन, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन जैसे देशों में भी बड़े पैमाने पर घास के मैदानों को कृषि भूमि में बदला जा रहा है।
किन देशों में दिखा सबसे ज्यादा असर?
शोधकर्ताओं के मुताबिक 15 वर्षों की अवधि में घास के मैदान और आर्द्रभूमियों को जंगलों की तुलना में करीब चार गुणा तेजी से बदला गया।
इस वैश्विक बदलाव में ब्राजील का हिस्सा सबसे ज्यादा, करीब 13 फीसदी रहा। इसके बाद रूस, भारत, चीन और अमेरिका का स्थान रहा, जिनमें से प्रत्येक का योगदान करीब छह फीसदी था। भारत का नाम इस लिस्ट में होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां घासभूमि और चरागाह पहले से ही कम होते जा रहे हैं, जबकि पशुपालन और खेती की मांग लगातार बढ़ रही है।
क्या है खतरा और समाधान?
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यह बदलाव महज भूमि उपयोग में परिवर्तन भर नहीं है। इससे जलवायु परिवर्तन तेज हो सकता है, जैव विविधता घट सकती है और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर भी गहरा असर पड़ सकता है।
ऐसे में शोधकर्ताओं ने जोर दिया है कि संरक्षण नीतियों को महज जंगलों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, जहां उत्पाद बनते, बिकते और उपभोग होते हैं, उसे ध्यान में रखते हुए सरकारों, उत्पादकों और उपभोक्ताओं सभी को जिम्मेदारी निभानी होगी। इसके लिए स्थानीय कदमों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की जवाबदेही से जोड़ना होगा, ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य साथ-साथ आगे बढ़ सकें।
अध्ययन स्पष्ट करता है कि अगर नीतियां केवल जंगलों की रक्षा तक सीमित रहीं, तो खेती और पशुपालन का दबाव दूसरे पारिस्थितिक तंत्रों पर बढ़ता जाएगा। अध्ययन साफ संकेत देता है कि अगर दुनिया को जलवायु संकट और जैव विविधता के नुकसान से बचाना है, तो घास के मैदानों को भी जंगलों जितना ही महत्व देना होगा।