इको-सेंसिटिव जोन में जलविद्युत परियोजनाएं, एनजीटी ने हिमाचल सरकार को भेजा नोटिस

याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि कनावर वन्यजीव अभयारण्य की सीमा में परियोजना के मुख्य हिस्से आने से पर्यावरणीय खतरा बढ़ गया है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में प्रस्तावित दो लघु जलविद्युत परियोजनाओं (कसोल और ग्रहण-कसोल एसएचईपी) को लेकर ग्रामीणों ने एनजीटी में याचिका दायर की है।

  • आरोप है कि परियोजनाओं के लिए सुरंग खोदने और ब्लास्टिंग का काम बिना जरूरी पर्यावरणीय व आपदा जोखिम जांच के किया जा रहा है, जिससे पीने के पानी के स्रोत और स्थानीय सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है।

  • ग्रामीणों का दावा है कि परियोजनाएं कनावर वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन के भीतर आती हैं। एनजीटी ने हिमाचल सरकार समेत संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

  • एक अन्य मामले में पंजाब वरियाणा डंप साइट पर कचरे के अवैज्ञानिक निपटान और विशाल लीगेसी डंप बनने के मामले में एनजीटी ने सख्ती दिखाई है। याचिका में आरोप है कि साइट पर पहले से करीब 20 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है और नगर निगम रोजाना बिना छंटाई के 500 से 700 टन कचरा डाल रहा है।

  • शिकायत के अनुसार, घरेलू, व्यावसायिक, चिकित्सीय और खतरनाक कचरा भी एक साथ फेंका जा रहा है, जिससे आग लगने और जहरीले रिसाव का खतरा बढ़ गया है। एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 10 फरवरी, 2026 को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की भुंतर तहसील स्थित थुंजा गांव के लोगों की याचिका पर सुनवाई शुरू की। यह मामला दो आस-पास प्रस्तावित लघु जलविद्युत परियोजनाओं, 'कसोल एसएचईपी' और 'ग्रहण-कसोल एसएचईपी' के निर्माण से जुड़ा है। इन जलविद्युत परियोजनाओं की कुल क्षमता पांच-पांच मेगावाट है।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन परियोजनाओं के लिए पहाड़ी ढलानों पर सुरंग खोदने, पाइपलाइन बिछाने और नियंत्रित विस्फोट (ब्लास्टिंग) का काम किया जा रहा है। यह गतिविधियां ग्रहण नाले के आसपास हो रही हैं, जो गांववासियों के लिए पीने के पानी का एकमात्र स्रोत है।

आवेदकों का कहना है ब्लास्टिंग बिना किसी ढलान-स्थिरता जांच, कंपन के प्रभाव के अध्ययन, जलधारा के आधारभूत आंकड़ों और आपदा जोखिम आकलन के शुरू कर दी गई है। इससे गांव में खतरे और असुरक्षा का माहौल बन गया है।

ग्रामीणों ने यह भी दावा किया है कि दोनों परियोजनाएं कनावर वन्यजीव अभयारण्य के अधिसूचित इको-सेंसिटिव जोन के भीतर आती हैं। इतना ही नहीं, ग्रहण-कसोल परियोजना के मुख्य हिस्से अभयारण्य की चिन्हित सीमा के अंदर ही पड़ते हैं। याचिकाकर्ताओं ने 2016 की संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उस समय भी क्षेत्र की ढलानों को अस्थिर पाया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि विस्फोटों के कंपन साफ महसूस हो रहे हैं, जिससे भय बढ़ गया है।

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एनजीटी ने इस मामले में हिमाचल प्रदेश सरकार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, जल शक्ति विभाग के सचिव, हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड के मुख्य अभियंता समेत अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। सभी प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करना होगा। मामले में अगली सुनवाई 2 अप्रैल, 2026 को होनी है।

यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी परियोजना से पहले पर्यावरणीय आकलन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना कितना जरूरी है।

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अवैध डंपिंग से पर्यावरण के लिए खतरा बनी वरियाणा डंप साइट, एनजीटी ने मांगा जवाब

पंजाब में जालंधर की वरियाणा डंप साइट पर कचरे के अवैज्ञानिक निपटान और विशाल ‘लीगेसी डंप’ बनने के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी ने 10 फरवरी 2026 को इस मामले में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, शहरी विकास विभाग, जालंधर मंडलायुक्त, स्थानीय निकाय विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव समेत अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं।

अधिकरण ने सभी पक्षों से शिकायत पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 17 मार्च 2026 को होगी।

यह याचिका तेजस्वी मिन्हास द्वारा दायर की गई है। उनका आरोप है कि वरियाणा डंप साइट पर लंबे समय से अवैध रूप से भारी मात्रा में कचरा डाला जा रहा है। यह जालंधर की सबसे पुरानी डंप साइट है, जिसके आसपास रिहायशी इलाके हैं।

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याचिकाकर्ता के अनुसार, इस साइट पर करीब 20 लाख मीट्रिक टन पुराना (लीगेसी) कचरा पहले से जमा है। इसके अलावा जालंधर नगर निगम रोजाना यहां बिना छंटाई के 500 से 700 टन कचरा डाल रहा है, जिससे समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है।

शिकायत में कहा गया है कि डंप साइट पर सूखा-गीला, जैविक-अजैविक, घरेलू-व्यावसायिक, रिसाइक्लेबल-नॉन रिसाइक्लेबल के साथ-साथ चिकित्सीय और खतरनाक कचरा भी बिना किसी वैज्ञानिक प्रक्रिया के एक साथ फेंका जा रहा है।

याचिकाकर्ता ने डंप साइट की तस्वीरें भी प्रस्तुत की हैं, जिनमें कचरे के विशाल ढेर, बार-बार लगने वाली आग और वहां से बहते जहरीले रिसाव (लीचेट) को दिखाया गया है। यह रिसाव आसपास के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

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