एआई से बढ़ सकता है उत्सर्जन, अक्षय ऊर्जा का फायदा हो सकता है कम

दोधारी तलवार है एआई, इसकी बढ़ती ताकत से स्वच्छ ऊर्जा को फायदा मिल सकता है, लेकिन तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ सकता है।
एआई अगर जीवाश्म ईंधन उत्पादन बढ़ाता है, तो स्वच्छ ऊर्जा से होने वाली उत्सर्जन कटौती बेअसर हो सकती है।
एआई अगर जीवाश्म ईंधन उत्पादन बढ़ाता है, तो स्वच्छ ऊर्जा से होने वाली उत्सर्जन कटौती बेअसर हो सकती है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • एआई से स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से प्रदूषण भी बढ़ सकता है।

  • अध्ययन के अनुसार, एआई के कारण हर साल 47 करोड़ से 180 करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन के आसार हैं।

  • एआई अगर जीवाश्म ईंधन उत्पादन बढ़ाता है, तो स्वच्छ ऊर्जा से होने वाली उत्सर्जन कटौती बेअसर हो सकती है।

  • तेल और गैस कंपनियां एआई का इस्तेमाल खोज, ड्रिलिंग और उत्पादन बढ़ाने के लिए तेजी से कर रही हैं।

  • विशेषज्ञों के मुताबिक, एआई का जलवायु लाभ तभी बढ़ेगा, जब स्वच्छ ऊर्जा में इसका इस्तेमाल ज्यादा तेजी से होगा।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को दुनिया की कई बड़ी समस्याओं का समाधान माना जा रहा है। बिजली की मांग का अनुमान लगाने से लेकर सौर और पवन ऊर्जा को बेहतर तरीके से चलाने तक, एआई ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन एक नए अध्ययन ने इसके एक दूसरे पहलू की ओर ध्यान दिलाया है।

क्लाइमेट एक्शन नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, एआई जितनी तेजी से स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन और इस्तेमाल को बेहतर बना सकता है, उतनी ही तेजी से वह तेल, गैस और कोयले के उत्पादन को भी बढ़ा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो एआई से होने वाली अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन की मात्रा, स्वच्छ ऊर्जा से बचने वाले उत्सर्जन से ज्यादा हो सकती है।

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1.8 अरब टन तक बढ़ सकता है उत्सर्जन

शोधकर्ताओं ने 64 अलग-अलग परिस्थितियों का अध्ययन किया। उन्होंने यह देखने की कोशिश की कि एआई स्वच्छ ऊर्जा और जीवाश्म ईंधन, दोनों क्षेत्रों की उत्पादकता को किस तरह प्रभावित कर सकता है।

अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि एआई के कारण हर साल 0.47 से 1.8 गीगाटन यानी 47 करोड़ से 180 करोड़ टन तक अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन हो सकता है। यह ऊर्जा क्षेत्र के सालाना उत्सर्जन का करीब 1 से 5 प्रतिशत है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह कोई सटीक पूर्वानुमान नहीं है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि एआई का जलवायु पर असर केवल उसके डेटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाली बिजली से तय नहीं होगा।

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तेल और गैस उद्योग में बढ़ रहा इस्तेमाल

अब तक एआई और जलवायु परिवर्तन पर हुई कई चर्चाओं में डेटा सेंटरों की बिजली खपत पर ध्यान दिया गया है। एआई मॉडल चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है। कई देशों में यह बिजली अभी भी कोयले और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से आती है।

लेकिन नए अध्ययन में एक अलग सवाल पूछा गया है। अगर एआई तेल और गैस कंपनियों को जमीन के नीचे मौजूद ईंधन को जल्दी और कम खर्च में निकालने में मदद करता है, तो उसका क्या असर होगा?

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तेल और गैस कंपनियां पहले से ही एआई का इस्तेमाल खोज और उत्पादन बढ़ाने के लिए कर रही हैं। एआई की मदद से कंपनियां तेल और गैस के नए भंडार खोज सकती हैं और ड्रिलिंग को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि एआई तकनीकी रूप से निकाले जा सकने वाले तेल और गैस भंडार को करीब पांच प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। गहरे समुद्र में तेल निकालने वाली परियोजनाओं की लागत भी करीब 10 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

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स्वच्छ ऊर्जा को चार गुना तेजी चाहिए

शोधकर्ताओं ने पाया कि एआई से कुल उत्सर्जन तभी घटता है जब वह जीवाश्म ईंधन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद न करे।

अगर तेल, गैस और स्वच्छ ऊर्जा, दोनों क्षेत्रों में एआई का इस्तेमाल लगभग समान गति से होता है, तो स्थिति अलग होगी। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा में एआई से मिलने वाली उत्पादकता बढ़त को जीवाश्म ईंधन की उत्पादकता बढ़त से कम से कम चार गुना अधिक होना होगा। तभी दोनों का कुल प्रभाव उत्सर्जन के लिहाज से बराबर हो सकेगा।

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सिर्फ डेटा सेंटरों को देखना काफी नहीं

अध्ययन का सबसे अहम संदेश यही है कि एआई के पर्यावरणीय प्रभाव को मापते समय केवल डेटा सेंटरों की बिजली खपत देखना पर्याप्त नहीं है।

एआई बिजली की खपत बढ़ा सकता है, लेकिन साथ ही यह ऊर्जा उत्पादन की पूरी व्यवस्था को भी बदल सकता है। अगर इससे तेल और गैस निकालना आसान और सस्ता हो जाता है, तो इससे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल लंबे समय तक जारी रह सकता है।

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एआई अगर जीवाश्म ईंधन उत्पादन बढ़ाता है, तो स्वच्छ ऊर्जा से होने वाली उत्सर्जन कटौती बेअसर हो सकती है।

इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि एआई के विकास के साथ यह देखना भी जरूरी है कि उसकी तकनीक का इस्तेमाल किस दिशा में हो रहा है।

एआई का भविष्य किस दिशा में जाएगा?

एआई जलवायु संकट से निपटने में मदद कर सकता है। यह बिजली ग्रिड को बेहतर बना सकता है, नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता का अनुमान लगा सकता है और सौर तथा पवन ऊर्जा की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।

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लेकिन वही तकनीक जीवाश्म ईंधन उद्योग को भी अधिक ताकत दे सकती है। इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि एआई स्वच्छ ऊर्जा के लिए उपयोगी है।

असल सवाल यह है कि एआई से मिलने वाली उत्पादकता का सबसे बड़ा फायदा किसे मिलता है - स्वच्छ ऊर्जा को या जीवाश्म ईंधन को। अध्ययन ने चेतावनी दी है कि अगर इस सवाल पर ध्यान नहीं दिया गया, तो एआई जलवायु समाधान का हिस्सा बनने के बजाय समस्या को और बढ़ा सकता है।

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