

नए शोध में पाया गया कि लगातार दशकों से दक्षिणी महासागर उत्तरी महासागर से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है
जलवायु मॉडल के पूर्वानुमान महासागरों के ताप वितरण को सही तरीके से नहीं समझा पा रही हैं
तापमान अंतर बताने वाला नया तरीका दिखाता है कि उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में गर्मी का असंतुलन बढ़ रहा है
हवा और समुद्र के बीच जटिल फीडबैक प्रणाली पहले से कमजोर मानी गई है, जिससे मॉडल अनुमान बदल सकते हैं
इस बदलाव से बारिश, सूखा, तूफान और ट्रॉपिकल रेन बेल्ट की स्थिति वैश्विक स्तर पर प्रभावित हो सकती है
हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर एक नया शोध सामने आया है, जो यह बताता है कि महासागरों के गर्म होने का पैटर्न वैसा नहीं है जैसा पहले के जलवायु मॉडल बताते थे। यह अध्ययन अमेरिका की नॉर्थईस्टर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है और इसे वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले कई दशकों के वास्तविक समुद्री तापमान के आंकड़े यह दिखाते हैं कि दक्षिणी गोलार्ध के महासागर उत्तरी गोलार्ध की तुलना में तेजी से गर्म हो रहे हैं। यह बात पुराने जलवायु मॉडलों की भविष्यवाणी से उलट है।
जलवायु मॉडल क्या कहते हैं
जलवायु मॉडल ऐसे कंप्यूटर आधारित प्रणाली होते हैं जो पृथ्वी की जलवायु को समझने और भविष्य का अनुमान लगाने के लिए बनाए जाते हैं। इनमें सूर्य की गर्मी, हवा, बादल, समुद्री धाराएं और वायुमंडल जैसे कई प्राकृतिक प्रक्रियाओं को गणितीय रूप में शामिल किया जाता है।
इन मॉडलों का उपयोग करके वैज्ञानिक यह अनुमान लगाते हैं कि समय के साथ पृथ्वी का तापमान कैसे बदलेगा। अब तक ये मॉडल यह सही बताते आए हैं कि पूरी दुनिया का औसत तापमान बढ़ रहा है और औद्योगिक क्रांति के बाद से लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि हो चुकी है।
लेकिन समस्या तब सामने आती है जब हम यह देखना चाहते हैं कि यह गर्मी उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में कैसे बंट रही है।
दोनों गोलार्धों का फर्क
वैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में अधिक भूमि है और भूमि पानी की तुलना में जल्दी गर्म होती है। इसलिए पुराने मॉडल यह अनुमान लगाते थे कि उत्तरी गोलार्ध के महासागर ज्यादा तेजी से गर्म होंगे।
लेकिन वास्तविक आंकड़े कुछ और बताते हैं। पिछले लगभग 70 वर्षों के समुद्री तापमान के अध्ययन से पता चला है कि दक्षिणी गोलार्ध के महासागर अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं।
शोध में यह भी बताया गया है कि अगर हम केवल पूरी दुनिया का औसत तापमान देखें, तो यह अंतर दिखाई नहीं देता। इसलिए वैज्ञानिक एक नया तरीका सुझाते हैं जिसे “अंतर-गोलार्ध तापमान अंतर” कहा जाता है। इसमें उत्तरी और दक्षिणी महासागरों के तापमान की सीधी तुलना की जाती है।
हवा और समुद्र के बीच संबंध
इस शोध में एक महत्वपूर्ण बात यह बताई गई है कि महासागरों के तापमान पर हवा और पानी के बीच की क्रिया बहुत बड़ा असर डालती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में व्यापारिक हवाएं (ट्रेड विंड्स) लगातार चलती हैं। जब समुद्र गर्म होता है, तो अधिक पानी वाष्प बनकर ऊपर उठता है। इससे हवाओं की गति बदलती है और समुद्र की सतह पर ठंडक और गर्मी का संतुलन प्रभावित होता है।
यह एक प्रकार का “फीडबैक लूप” बनाता है, जिसमें हवा और समुद्र एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। पुराने जलवायु मॉडल इस प्रक्रिया को बहुत मजबूत मानते थे, लेकिन नए शोध के अनुसार यह प्रभाव उतना ज्यादा नहीं है जितना पहले सोचा गया था।
जलवायु पूर्वानुमान पर असर
यदि दक्षिणी गोलार्ध के महासागर वास्तव में तेजी से गर्म हो रहे हैं, तो इसका असर पूरे विश्व की जलवायु प्रणाली पर पड़ सकता है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में बनने वाली वर्षा पट्टी अपनी स्थिति बदल सकती है। इससे कुछ क्षेत्रों में अधिक बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सूखा बढ़ सकता है।
उत्तरी गोलार्ध के कुछ हिस्सों में बारिश कम हो सकती है, जिससे सूखे और जंगल की आग का खतरा बढ़ सकता है। वहीं दक्षिणी क्षेत्रों में अधिक वर्षा होने की संभावना हो सकती है। यह बदलाव तूफानों, मानसून और अन्य मौसमी घटनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
भविष्य की जलवायु मॉडलिंग
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन नए निष्कर्षों को भविष्य के जलवायु मॉडलों में शामिल करना जरूरी है। इससे क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन की बेहतर भविष्यवाणी की जा सकेगी। शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहना है कि अगर हम इन जटिल प्रक्रियाओं को सही तरह से समझ लें, तो हम उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होने वाले बदलावों को बेहतर तरीके से अनुमानित कर पाएंगे।
यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि जलवायु परिवर्तन केवल पूरी दुनिया के औसत तापमान का मामला नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरह से असर डालता है।
हालांकि वैश्विक तापमान वृद्धि की बात अभी भी सही है, लेकिन महासागरों के क्षेत्रीय बदलाव को समझने के लिए और अधिक सटीक मॉडल की जरूरत है। इससे भविष्य में मौसम, बारिश और प्राकृतिक आपदाओं का बेहतर पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा।