डिजिटल उद्योग चार फीसदी से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेवार

अध्ययन में पाया गया कि लगभग 42 फीसदी डिजिटल उत्सर्जन डिजिटल उद्योग के खाते में दर्ज ही नहीं होता।
कुल डिजिटल उत्सर्जन का 77 से 87 प्रतिशत उपयोग से पहले, उत्पादन और कच्चे माल चरणों में होता है।
कुल डिजिटल उत्सर्जन का 77 से 87 प्रतिशत उपयोग से पहले, उत्पादन और कच्चे माल चरणों में होता है। फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • कुल डिजिटल उत्सर्जन का 77 से 87 प्रतिशत उपयोग से पहले, उत्पादन और कच्चे माल चरणों में होता है।

  • साल 2021 में डिजिटल उद्योगों ने वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 4.1 प्रतिशत हिस्सा उत्पन्न किया।

  • लगभग 42 प्रतिशत डिजिटल उत्सर्जन अन्य उद्योग क्षेत्रों के खातों में दर्ज हो जाता है।

  • साल 2010 के बाद आईटी सेवाओं से उत्सर्जन 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुका है।

  • चीन सबसे बड़ा डिजिटल उत्सर्जन उत्पादक है, जबकि यूरोप और अमेरिका आयातित कार्बन पदचिह्न पर निर्भर हैं।

आज के समय में डिजिटल तकनीक को विकास, सुविधा और तेज प्रगति का प्रतीक माना जाता है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट, क्लाउड सेवाएं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने हमारे जीवन को आसान बना दिया है। हम घर बैठे काम कर सकते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं और दुनिया से तुरंत जुड़ सकते हैं। लेकिन एक नया शोध बताता है कि डिजिटल तकनीक का पर्यावरण पर असर पहले से कहीं ज्यादा है।

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कुल डिजिटल उत्सर्जन का 77 से 87 प्रतिशत उपयोग से पहले, उत्पादन और कच्चे माल चरणों में होता है।

जर्नल कम्युनिकेशन्स सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, साल 2021 में डिजिटल उद्योगों ने दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 4.1 फीसदी हिस्सा पैदा किया। यह हिस्सा छोटा लग सकता है, लेकिन यह बहुत बड़ी मात्रा है। सबसे चिंता की बात यह है कि इन उत्सर्जनों का बड़ा हिस्सा आधिकारिक आंकड़ों में ठीक से दर्ज ही नहीं होता।

उत्सर्जन कहां से आता है?

जब हम डिजिटल तकनीक की बात करते हैं, तो अक्सर हमें केवल बिजली से चलने वाले उपकरण याद आते हैं। लेकिन असली उत्सर्जन सिर्फ इस्तेमाल के समय नहीं होता। अध्ययन के अनुसार, लगभग 77 से 87 फीसदी उत्सर्जन तकनीक के उपयोग से पहले ही हो जाता है।

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कुल डिजिटल उत्सर्जन का 77 से 87 प्रतिशत उपयोग से पहले, उत्पादन और कच्चे माल चरणों में होता है।

यह उत्सर्जन मुख्य रूप से इन चरणों में होता है -

  • कच्चे माल का खनन

  • पुर्जों और हार्डवेयर का निर्माण

  • फैक्ट्रियों में उत्पादन

  • एक देश से दूसरे देश तक सामान की ढुलाई

इन सभी प्रक्रियाओं में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसें निकलती हैं।

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ग्रीनहाउस गैस प्रोटोकॉल की समस्या

कंपनियां अपने उत्सर्जन को मापने के लिए आमतौर पर ग्रीनहाउस गैस प्रोटोकॉल का पालन करती हैं। इसमें उत्सर्जन को तीन हिस्सों में बांटा गया है -

स्कोप 1 – कंपनी द्वारा सीधे उत्पन्न उत्सर्जन

स्कोप 2 – खरीदी गई बिजली से होने वाला उत्सर्जन

स्कोप 3 – सप्लाई चेन से जुड़ा अन्य अप्रत्यक्ष उत्सर्जन

समस्या यह है कि कई देशों में स्कोप 3 की रिपोर्टिंग जरूरी नहीं है। इसलिए कंपनियां अपने पूरे उत्सर्जन की सही जानकारी नहीं देतीं। इससे डिजिटल उद्योग का असली प्रभाव छिपा रह जाता है।

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दूसरे उद्योगों में छिपा डिजिटल उत्सर्जन

अध्ययन में यह भी पाया गया कि लगभग 42 फीसदी डिजिटल उत्सर्जन डिजिटल उद्योग के खाते में दर्ज ही नहीं होता। यह उत्सर्जन ऑटोमोबाइल, मशीन निर्माण और वित्तीय सेवाओं जैसे अन्य क्षेत्रों में जोड़ दिया जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि एक कार कंपनी डिजिटल सॉफ्टवेयर का उपयोग करती है, तो उससे जुड़ा उत्सर्जन कार उद्योग में दर्ज होता है, न कि डिजिटल उद्योग में। इससे सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती।

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आईटी सेवाओं और एआई का बढ़ता प्रभाव

हाल के वर्षों में पारंपरिक हार्डवेयर से होने वाला उत्सर्जन थोड़ा कम हुआ है। लेकिन आईटी सेवाओं से होने वाला उत्सर्जन 2010 से अब तक 60 फीसदी से अधिक बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण है -

  • क्लाउड कंप्यूटिंग का बढ़ता उपयोग

  • आंकड़ों का अधिक संग्रह और विश्लेषण

  • ऑनलाइन सेवाओं की बढ़ती मांग

  • जनरेटिव एआई का तेज विकास

जैसे-जैसे लोग अधिक डिजिटल सेवाओं का उपयोग कर रहे हैं, डेटा सेंटर की संख्या और बिजली की खपत भी बढ़ रही है। इससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

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क्षेत्रीय असमानता

डिजिटल उत्सर्जन का वितरण दुनिया में समान नहीं है। चीन डिजिटल उत्पादों का सबसे बड़ा निर्माता है, इसलिए वहां उत्सर्जन अधिक होता है। दूसरी ओर, यूरोप और अमेरिका जैसे क्षेत्र बड़ी मात्रा में डिजिटल उत्पादों का आयात करते हैं।

इसका मतलब है कि विकसित देश डिजिटल सुविधाओं का लाभ लेते हैं, लेकिन उत्पादन से होने वाला प्रदूषण अक्सर दूसरे देशों में होता है। इसलिए जलवायु नीति में उपभोग आधारित उत्सर्जन को भी ध्यान में रखना चाहिए।

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केवल ऊर्जा दक्षता पर्याप्त नहीं

कई लोग मानते हैं कि अधिक ऊर्जा कुशल डेटा सेंटर बनाकर समस्या हल हो सकती है। लेकिन अध्ययन बताता है कि यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा उत्पादन और सप्लाई चेन में होता है।

समाधान के लिए जरूरी है जिसमें टिकाऊ और लंबे समय तक चलने वाले उपकरण बनाना, पुराने उपकरणों का पुन: उपयोग और मरम्मत, अनावश्यक डिजिटल उपयोग को कम करना, पूरी सप्लाई चेन में पारदर्शिता लाना शामिल है।

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समाधान और आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकारों और कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) जैसे कदम सीमा पार उत्सर्जन को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं।

साथ ही, कंपनियों को अपने स्कोप 3 उत्सर्जन की अनिवार्य रिपोर्टिंग करनी चाहिए। इससे वास्तविक आंकड़े सामने आएंगे और सही नीतियां बन सकेंगी।

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डिजिटल तकनीक ने मानव जीवन को सरल और तेज बनाया है, लेकिन इसका पर्यावरण पर गहरा प्रभाव भी है। डिजिटल दुनिया केवल आभासी नहीं है, इसके पीछे बड़ी मात्रा में ऊर्जा और संसाधनों का उपयोग होता है।

यदि हम सच में जलवायु परिवर्तन से लड़ना चाहते हैं, तो हमें डिजिटल तकनीक के पूरे जीवन चक्र को समझना और नियंत्रित करना होगा। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती है।

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