बढ़ते तापमान के साथ घट रही संवेदनाएं, तन ही नहीं मन पर भी हावी हो रहा जलवायु परिवर्तन

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि आर्थिक रूप से कमजोर देशों में गर्मी का मानसिक असर समृद्ध देशों की तुलना में करीब तीन गुणा ज्यादा होता है
फोटो: आईस्टॉक
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जब धरती-आसमान तपते हैं, तो इंसानी संवेदनाएं ठंडी पड़ जाती हैं। यह किसी फिल्म का डायलॉग नहीं बल्कि मौजूदा समय की एक कड़वी सच्चाई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक वैश्विक तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी न केवल हमारे शरीर और अर्थव्यवस्था पर असर डाल रही है, बल्कि इसका असर अब हमारी भावनाओं और मनोदशा पर भी पड़ रहा है।

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) समेत दुनिया के कई संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस नए अध्ययन से पता चला है कि गर्म मौसम में लोगों की भावनाएं अधिक नकारात्मक और निराशाजनक हो जाती हैं। अध्ययन में पाया गया कि जब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाता है, तो सोशल मीडिया पर लोगों के पोस्ट औसतन अधिक नकारात्मक हो जाते हैं। यह प्रभाव आर्थिक रूप से कमजोर देशों में कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल वन अर्थ में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में 157 देशों के 120 करोड़ से ज्यादा सोशल मीडिया पोस्ट का विश्लेषण किया गया, जो 2019 में पोस्ट किए गए थे। 65 अलग-अलग भाषाओं में किए इन पोस्ट्स को पढ़ने और समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास तकनीक, बीईआरटी (एक उन्नत भाषा विश्लेषण मॉडल) का उपयोग किया। हर पोस्ट को 0.0 से 1.0 तक के स्केल पर अंकित किया गया, जहां 0.0 का मतलब ‘बेहद नकारात्मक’ और 1.0 का मतलब ‘बेहद सकारात्मक’ है।

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इन पोस्ट्स को फिर 2,988 जगहों के मौसम से जुड़े आंकड़ों से जोड़ा गया, जिससे पता चला है कि जब तापमान बहुत अधिक होता है, तो लोग ज्यादा चिड़चिड़े, नकारात्मक और तनावग्रस्त महसूस करते हैं।

नतीजे बताते हैं कि जब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के पार जाता है तो आर्थिक रूप से कमजोर देशों में लोगों के पोस्ट 25 फीसदी ज्यादा नकारात्मक हो जाते हैं, जबकि अधिक विकसित देशों में यह गिरावट 8 फीसदी के आसपास दर्ज की गई।

कमजोर देशों पर तिगुना असर

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता और एमआईटी में प्रोफेसर सिकी झेंग का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "बढ़ता तापमान सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य या आर्थिक कामकाज को ही नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की भावनाओं को भी प्रभावित कर रहा है, और यह असर पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है।"

अध्ययन में यह भी पाया गया कि आर्थिक रूप से कमजोर देशों में जिनकी सालाना आय 13,845 डॉलर से कम है, उनमें गर्मी का मानसिक असर अमीर देशों की तुलना में करीब तीन गुणा ज्यादा होता है। यह इस बात को भी उजागर करता है कि जलवायु परिवर्तन का भावनात्मक प्रभाव दुनिया में असमान रूप से महसूस किया जा रहा है।

वैज्ञानिक यिचुन फैन ने कहा, "कम आय वाले देशों में लोग गर्मी से मानसिक रूप से ज्यादा प्रभावित होते हैं। ऐसे में भविष्य की जलवायु नीतियों में मानसिक और सामाजिक अनुकूलन को भी शामिल किया जाना चाहिए।“

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भविष्य में गिरावट का अंदेशा

वैज्ञानिकों ने जलवायु मॉडल की मदद से भविष्य का अनुमान लगाते हुए बताया कि अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो सदी के अंत तक वैश्विक स्तर पर बढ़ती गर्मी की वजह से लोगों की मानसिक स्थिति में 2.3 फीसदी की गिरावट आ सकती है।

शोधकर्ता निक ओब्राडोविच ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “अब यह साफ है कि मौसम न केवल शरीर, बल्कि हमारे मूड और भावनाओं पर भी असर डाल रहा है। ऐसे में आने वाले समय में, हमें सामाजिक रूप से इस मानसिक दबाव को झेलने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।“

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वैज्ञानिकों के मुताबिक सोशल मीडिया से जुड़े आंकड़े हमें दुनिया भर की संस्कृतियों और महाद्वीपों में इंसानी भावनाओं को समझने का अनोखा मौका देते हैं। यह दिखाते हैं कि असल में लोग क्या महसूस कर रहे हैं। इस तरीके से हम जलवायु परिवर्तन के भावनात्मक प्रभावों को उस पैमाने पर माप सकते हैं, जो पारंपरिक सर्वेक्षणों से संभव नहीं है। इससे हमें यह जानने में मदद मिलती है कि तापमान में बदलाव का दुनियाभर में लोगों की भावनाओं पर क्या असर पड़ रहा है।

शोधकर्ता यह भी स्वीकार करते हैं कि यह विषय बेहद जटिल है और इसमें आगे और रिसर्च की जरूरत है। एक चुनौती यह भी है कि सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले लोग पूरी आबादी का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते, खासकर छोटे बच्चे और बुजुर्ग, जो इसे कम इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि ये वर्ग गर्मी से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, इसलिए हकीकत में होने वाला असर अध्ययन में दिखाए अनुमान से भी कहीं ज्यादा हो सकता है।

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