खाने की बर्बादी से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी इजाफा, विमानन क्षेत्र से पांच गुना ज्यादा: यूएनईपी

खाने की बर्बादी से बढ़ रहा मीथेन उत्सर्जन, जलवायु संकट पर गहराता खतरा, रोकथाम के लिए दुनिया को अब तेज और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत
खाने की बर्बादी से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है।
खाने की बर्बादी से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • खाने की बर्बादी से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ रहा है, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार गंभीर होता जा रहा है।

  • लैंडफिल में सड़ता भोजन मीथेन गैस पैदा करता है, जो कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना अधिक गर्मी वातावरण में रोकती है।

  • हर दिन दुनिया में एक अरब से ज्यादा भोजन बर्बाद होता है, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी घरों से आती है।

  • बेकार भोजन के उत्पादन में इस्तेमाल जमीन और पानी भी व्यर्थ होते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है।

  • खाद बनाना, कचरा अलग करना और ब्लैक सोल्जर फ्लाई जैसे उपाय खाद्य कचरे से होने वाला प्रदूषण घटा सकते हैं।

दुनिया में खाने की बर्बादी अब केवल भूख और गरीबी से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है। यह तेजी से जलवायु परिवर्तन का कारण भी बन रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, सड़ने वाले खाद्य कचरे से दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा पैदा हो सकता है। यह विमानन क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन से लगभग पांच गुना अधिक है।

दुनिया में हर दिन एक अरब टन से ज्यादा भोजन बिना खाए फेंक दिया जाता है। इसमें बड़ी हिस्सेदारी घरों की है। यूएनईपी के अनुसार, खाने की बर्बादी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा घरों से आता है। इसका मतलब है कि हम केवल खाना ही नहीं फेंक रहे, बल्कि उसे पैदा करने में इस्तेमाल हुई जमीन, पानी, ऊर्जा और मेहनत भी बर्बाद कर रहे हैं।

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कूड़े के ढेर में सड़ता खाना बनता है मीथेन

खाने की बर्बादी का सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है, जब यह कचरा लैंडफिल यानी कूड़े के बड़े ढेर में पहुंच जाता है। वहां खाने का कचरा जमीन के नीचे दब जाता है और उसे पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में सूक्ष्म जीव खाने के कचरे को तोड़ते हैं और इससे मीथेन गैस निकलती है।

मीथेन एक बहुत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 20 साल की अवधि में यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में करीब 86 गुना ज्यादा गर्मी को वातावरण में रोक सकती है। यही कारण है कि मीथेन को कम करना जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करने का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जा रहा है।

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खाने के साथ जमीन और पानी भी हो रहे बर्बाद

खाने की बर्बादी का असर केवल कूड़े के ढेर तक सीमित नहीं है। जो भोजन हमारी थाली तक पहुंचने से पहले या बाद में बर्बाद हो जाता है, उसे पैदा करने में बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, दुनिया की लगभग 1.4 अरब हेक्टेयर कृषि भूमि पर ऐसा भोजन पैदा होता है, जिसे बाद में खाया ही नहीं जाता। यह दुनिया की कुल कृषि भूमि का करीब 28 प्रतिशत है। इस भोजन को उगाने में इस्तेमाल हुआ पानी भी व्यर्थ चला जाता है।

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खेती के लिए जंगलों को काटना भी कई देशों में बड़ी समस्या है। इसलिए खाने की बर्बादी अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों पर भी दबाव बढ़ाती है। जंगल वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जंगल कम होंगे तो जलवायु परिवर्तन का खतरा और बढ़ सकता है।

मीथेन कम करने से जल्दी मिल सकता है फायदा

वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए मीथेन पर रोक लगाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वातावरण में कम समय तक रहता है। इसका मतलब है कि आज मीथेन उत्सर्जन कम करने पर आने वाले कुछ दशकों में जलवायु को इसका फायदा मिल सकता है।

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यूएनईपी रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे समय में जब दुनिया तापमान बढ़ने की रफ्तार को जल्द कम करने के व्यावहारिक तरीके खोज रही है, खाने की बर्बादी रोकना सबसे आसान और कम खर्चीले उपायों में से एक हो सकता है।

दुनिया में अपनाए जा रहे नए तरीके

खाने की बर्बादी कम करने के लिए कई देशों में नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। अफ्रीका के 11 देशों की सरकारों ने कचरा बीनने वाले लोगों को औपचारिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में कदम उठाया है। उन्हें कचरे को अलग करने और जैविक कचरे से खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे पर्यावरण को फायदा होने के साथ इन लोगों की आय और जीवन स्तर में भी सुधार हो रहा है।

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एक अन्य तरीका ब्लैक सोल्जर फ्लाई यानी एक विशेष प्रकार की मक्खी का इस्तेमाल है। इन मक्खियों के लार्वा जैविक कचरे को खाकर उसे उपयोगी सामग्री में बदलने में मदद करते हैं। मलावी और युगांडा समेत कई जगहों पर इनका इस्तेमाल कचरा प्रबंधन में किया जा रहा है।

अब तेजी से कदम उठाने की जरूरत

दुनिया ने 2030 तक प्रति व्यक्ति खाने की बर्बादी को आधा करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अभी तक इस दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है। इसलिए सरकारों के साथ आम लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

जितना भोजन जरूरत हो उतना ही खरीदना, बचा हुआ खाना सुरक्षित रखना और जैविक कचरे को अलग करके खाद बनाना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं। खाने की बर्बादी रोकना न केवल भोजन और पैसे की बचत है, बल्कि यह पृथ्वी के भविष्य को बचाने की दिशा में भी एक जरूरी कदम है।

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