

वायुमंडलीय मीथेन 2019 से 2023 तक रिकॉर्ड 1921 पीपीबी तक बढ़, मुख्यतः प्राकृतिक और कृषि स्रोतों के कारण।
2020-2021 में हाइड्रॉक्सिल रैडिकल में कमी ने मीथेन को तोड़ने की प्रक्रिया धीमी कर दी।
लंबी ला नीना अवधि के दौरान उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और आर्कटिक में पानी बढ़ने से मीथेन उत्सर्जन बढ़ा।
कोविड-19 लॉकडाउन के कारण वायु प्रदूषण में कमी ने मीथेन के तेजी से जमा होने में योगदान दिया।
जीवाश्म ईंधन और जंगलों की आग का योगदान बहुत कम था, माइक्रोबियल और जलवायु-संचालित स्रोत प्रमुख थे।
हाल ही में विज्ञान पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध में पता चला है कि 2020 के दशक की शुरुआत में वायुमंडल में मीथेन गैस की मात्रा असामान्य रूप से बढ़ गई। मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दूसरा सबसे प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस है। यह पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मीथेन की यह तेज वृद्धि मुख्य रूप से प्राकृतिक प्रक्रियाओं और जलवायु बदलाव से जुड़ी है, न कि जीवाश्म ईंधन या जंगलों में आग से।
मीथेन में वृद्धि के मुख्य कारण
शोध के अनुसार, 2020-2021 में हाइड्रॉक्सिल रेडिकल की मात्रा असामान्य रूप से कम हो गई थी। यह रैडिकल वायुमंडल में मीथेन को तोड़ने का मुख्य "साफ करने वाला एजेंट" होता है। इस कमी ने मीथेन को तेजी से जमा होने का अवसर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायुमंडलीय इस रासायनिक बदलाव ने मीथेन वृद्धि का लगभग 80 फीसदी हिस्सा समझाने में मदद की।
इसके अलावा 2020 से 2023 तक लंबी ला नीना की स्थिति ने भी इस वृद्धि में योगदान दिया। इस दौरान भूमध्य और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बारिश अधिक हुई, जिससे दलदली भूमि, झीलों और नदियों में पानी की मात्रा बढ़ी और मीथेन का उत्पादन बढ़ा।
प्राकृतिक और कृषि स्रोतों का योगदान
मीथेन वृद्धि केवल प्राकृतिक दलदली भूमि तक सीमित नहीं थी। इसमें धान जैसी कृषि प्रणालियां और अंदरूनी जल स्रोत भी शामिल थे। शोध से पता चला कि अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मीथेन उत्सर्जन सबसे ज्यादा बढ़ा। आर्कटिक के दलदली क्षेत्र और झीलों में भी तापमान बढ़ने से सूक्ष्मजीव सक्रिय हो गए और मीथेन उत्सर्जन बढ़ा।
इसके विपरीत, 2023 में दक्षिण अमेरिका में मीथेन उत्सर्जन कम हुआ, क्योंकि वहां एक अत्यधिक एल नीनो से सूखा पड़ा। इससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु की चरम स्थितियां मीथेन उत्सर्जन को बहुत प्रभावित कर सकती हैं।
जीवाश्म ईंधन और जंगल की आग का योगदान
इस तेज वृद्धि में जीवाश्म ईंधन और जंगल की आग का योगदान अपेक्षाकृत कम था। आइसोटोपिक अध्ययन से यह पुष्टि हुई कि मीथेन वृद्धि मुख्य रूप से सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पन्न प्राकृतिक और कृषि स्रोतों से हुई थी।
कोविड-19 लॉकडाउन का अप्रत्याशित प्रभाव
शोध में यह भी पता चला कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान वायु प्रदूषण में कमी ने हाइड्रॉक्सिल रैडिकल की मात्रा को प्रभावित किया। विशेष रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड (नॉक्स) में कमी हुई, जिससे मीथेन जल्दी जमा होने लगी। इस प्रकार, महामारी ने अप्रत्यक्ष रूप से मीथेन वृद्धि में योगदान दिया।
मॉडल और निगरानी में कमी
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि वर्तमान वैश्विक मीथेन मॉडल अक्सर प्राकृतिक तरीके से पानी भरने वाले क्षेत्रों और तालाब व झीलों से उत्सर्जन का सही आकलन नहीं करते। इसका मतलब है कि हमें इन क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाने और सूक्ष्मजीवों से मीथेन उत्सर्जन की प्रक्रियाओं को बेहतर समझने की आवश्यकता है।
वैश्विक जलवायु पर असर
मीथेन गैस का बढ़ता स्तर पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ा सकता है। शोध के अनुसार, जैसे-जैसे दुनिया गर्म और नमी भरी होती जा रही है, दलदली भूमि, अंदरूनी जल स्रोत और पन्नी जैसे कृषि क्षेत्र भविष्य में जलवायु परिवर्तन को तेजी से प्रभावित करेंगे।
इस अध्ययन का संदेश स्पष्ट है: केवल मानव गतिविधियों पर नियंत्रण करना पर्याप्त नहीं है। प्राकृतिक और प्रबंधित मीथेन स्रोतों में जलवायु परिवर्तन से होने वाले बदलावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
2020-2023 में वायुमंडलीय मीथेन में रिकॉर्ड वृद्धि मुख्यत -
हाइड्रॉक्सिल रैडिकल की अस्थायी कमी (मुख्य कारण)।
लंबी ला नीना के दौरान प्राकृतिक और कृषि स्रोतों से उत्सर्जन में वृद्धि।
जीवाश्म ईंधन और आग का अपेक्षाकृत कम योगदान।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में कमी का अप्रत्याशित प्रभाव।
शोध यह भी बताता है कि वैश्विक मीथेन कमी के प्रयासों, जैसे कि ग्लोबल मीथेन प्लेज, को केवल मानवजनित उत्सर्जन पर नहीं, बल्कि जलवायु-संचालित प्राकृतिक उत्सर्जन पर भी ध्यान देना होगा।
जैसे-जैसे जलवायु बदलती है, प्राकृतिक और कृषि स्रोतों से मीथेन उत्सर्जन पर नियंत्रण और निगरानी भविष्य के जलवायु संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।