

दुनिया में तेजी से बढ़ते तापमान का असर अब खेतों, किसानों और फसलों पर साफ तौर पर दिखने लगा है। चिंता की बात यह है कि भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के उन पांच देशों में शामिल है, जहां कृषि पर बढ़ते तापमान का 'गंभीर खतरा' मंडरा रहा है।
रिपोर्ट से पता चला है कि भारत के साथ-साथ अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश भी गंभीर खतरे में पड़े देशों में शामिल हैं।
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि लगातार बढ़ते तापमान के कारण जहां फसलों का उत्पादन घट रहा है, साथ ही पशुधन की उत्पादकता भी घट रही है।
इसके साथ ही बढ़ते तापमान के साथ किसानों-मजदूरों के काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का दायरा भी बढ़ रहा है।
आशंका है कि भीषण गर्मी में मजदूरों के काम करने की क्षमता 27 फीसदी तक घट सकती है। इससे न केवल उनकी आमदनी में गिरावट आएगी साथ ही पूरा खाद्य तंत्र भी कमजोर पड़ सकता है।
दुनिया में तेजी से बढ़ते तापमान का असर अब खेतों, किसानों और फसलों पर साफ तौर पर दिखने लगा है। चिंता की बात यह है कि भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के उन पांच देशों में शामिल है, जहां कृषि पर बढ़ते तापमान का 'गंभीर खतरा' मंडरा रहा है।
यह खुलासा संयुक्त राष्ट्र की नई "एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025" में हुआ है, जिसे 26 नवंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र एशिया-प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक आयोग (यूएनईएससीएपी) ने जारी किया है। रिपोर्ट से पता चला है कि भारत के साथ-साथ अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश भी गंभीर खतरे में पड़े देशों में शामिल हैं।
फसलें, पशुधन और किसान - सब पर बढ़ा तापमान का दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार बढ़ते तापमान के कारण जहां फसलों का उत्पादन घट रहा है, साथ ही पशुधन की उत्पादकता भी घट रही है। इसके साथ ही बढ़ते तापमान के साथ किसानों-मजदूरों के काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। साथ ही इसकी वजह ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का दायरा भी बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी चेताया है कि यह खतरा न केवल अधिक, बल्कि कम उत्सर्जन वाले भविष्य में भी बना रहेगा। वहीं बढ़ते उत्सजर्न के साथ और तेजी से बढ़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक कृषि इस पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जीडीपी में एक-चौथाई से अधिक का योगदान देती है। इतना ही नहीं इस क्षेत्र की ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी जीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर है। यही वजह है कि कृषि इस क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा और जीविका के लिए बेहद मायने रखती है।
लेकिन रिपोर्ट ने चेताया है कि बढ़ती गर्मी फसलों और पशुधन को 'भारी तनाव' में डाल रही है। उदाहरण के तौर पर, भारत में मार्च 2022 में पड़ी भीषण गर्मी ने गेहूं की फसल को बुरी तरह झुलसा दिया था।
कितना जोखिम? ‘एग्रीकल्चर हीट स्ट्रेस स्कोर’ से चलेगा पता
गर्मी से कृषि पर पड़ने वाले खतरे को मापने के लिए यूएनईएससीएपी ने एग्रीकल्चर हीट स्ट्रेस स्कोर तैयार किया है। यह स्कोर लगातार गर्म दिनों की अवधि (डब्ल्यूएसडीआई), जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी, कृषि क्षेत्र में रोजगार और कृषि योग्य भूमि के अनुपात—इन सभी को मिलाकर तय किया जाता है।
एग्रीकल्चर हीट स्ट्रेस स्कोर और लगातार गर्म दिनों की अवधि के आधार पर देशों को मध्यम, उच्च और अत्यधिक उच्च जोखिम श्रेणियों में रखा गया है। गर्मी के दबाव का यह अध्ययन तीन समय अवधियों में किया गया है। इसमें बीते दो दशकों (1995 से 2014) के ऐतिहासिक आंकड़ों और भविष्य के दो परिदृश्यों, पहला कम उत्सर्जन (एसएसपी1-2.6) और उच्च उत्सर्जन (एसएसपी5-8.5) परिदृश्य शामिल किए गए हैं।
अध्ययन में पाया गया कि फिजी, पापुआ न्यू गिनी और मार्शल द्वीप जैसे प्रशांत के कई द्वीपीय देशों में भी भविष्य में गर्मी का खतरा मध्यम से उच्च स्तर तक बढ़ सकता है।
उत्सर्जन बढ़ा तो ये देश होंगे और असुरक्षित
वहीं उच्च उत्सर्जन परिदृश्य एसएसपी5-8.5 में म्यांमार, फिजी, लाओस और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में गर्मी के कारण संवेदनशीलता और बढ़ने की चेतावनी दी गई है। इन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है, लेकिन इनके बढ़ती गर्मी और तापमान से निपटने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा और अनुकूलन के लिए वित्तीय साधन मौजूद नहीं हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा समय में ये देश भले ही मध्यम जोखिम में हैं, लेकिन एसएसपी5-8.5 परिदृश्य में बढ़ती गर्मी और कृषि पर भारी निर्भरता इन्हें और अधिक खतरे में डाल देगी।
किसान-मजदूरों पर सबसे ज्यादा खतरा
रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा खेतों में काम करने वाले मजदूरों और उनकी दिक्कतों पर केंद्रित है। आशंका है कि भीषण गर्मी में मजदूरों के काम करने की क्षमता 27 फीसदी तक घट सकती है। इससे न केवल उनकी आमदनी में गिरावट आएगी साथ ही पूरा खाद्य तंत्र भी कमजोर पड़ सकता है।
यूएनईएससीएपी ने दुनिया भर के कृषि मजदूरों पर किए 90 अध्ययनों का विश्लेषण किया है। इसमें पाया गया कि खेतिहर मजदूरों में हीट स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन और गर्मी से जुड़ी बीमारियां कहीं अधिक होती हैं। छाया, पीने के पानी और आराम की कमी स्थिति को और खराब कर देती है। खासकर प्रवासी और असंगठित मजदूरों के मामले में पहचान ही नहीं हो पाती या फिर मजदूरों को पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता।
गर्मी बढ़ने के साथ बढ़ रही चुनौतियां
सबूत बताते हैं कि लगातार लम्बे समय तक गर्मी में काम करने से शरीर का तापमान बढ़ जाता है, और शारीरिक क्षमता कमजोर पड़ जाती है। इससे व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि 2008 से 2018 के बीच जलवायु से जुड़ी आपदाओं के कारण हुए वैश्विक नुकसान का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा कृषि ने झेला है। ऐसे में अगर तापमान में हो रही वृद्धि डेढ़ डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाती है, तो इनका असर और ज्यादा गंभीर हो जाएगा।
क्या करना होगा?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि, “एशिया-प्रशांत की खाद्य सुरक्षा अब इस बात पर निर्भर करेगी कि यह क्षेत्र बढ़ती और तेज होती गर्मी के बीच अपनी कृषि प्रणाली को कितनी अच्छी तरह से ढाल पाता है।“
संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जोर दिया कि कृषि को बढ़ती गर्मी से सुरक्षित बनाने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए मौसम व जलवायु जोखिम की अधिक सटीक जानकारी को निर्णय प्रणाली और अर्ली वार्निंग सिस्टम में शामिल करना होगा, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के बीच बेहतर योजना और इस दिशा में सार्वजनिक निवेश को भी बढ़ावा देना होगा।
देखा जाए तो बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं, बल्कि एशिया-प्रशांत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका का सीधा संकट बनती जा रही है। भारत और अन्य उच्च-जोखिम वाले देशों के लिए यह चेतावनी है कि कृषि प्रणाली को बदलना और गर्मी के अनुकूल बनाना अब अनिवार्य हो गया है।
इसके लिए सटीक मौसम जानकारी, समय पर चेतावनी प्रणाली, बेहतर योजना और पर्याप्त निवेश जरूरी हैं। ऐसे में अगर तुरंत कदम न उठाए गए, तो न केवल किसानों और मजदूरों की आमदनी प्रभावित होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र के खाद्य तंत्र की मजबूती भी कमजोर पड़ सकती है। यह महज एक चुनौती नहीं, हमारे भविष्य की खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है।