जलवायु परिवर्तन के सामने हार रही प्रकृति की अनोखी अनुकूलन क्षमता, मेंढकों पर दिखा गंभीर असर

वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि बढ़ती गर्मी से टैडपोल अपना भोजन और विकास का तरीका बदल रहे हैं, लेकिन तापमान लगातार बढ़ने पर प्रकृति की यह अनुकूलन क्षमता भी उन्हें बचाने में नाकाम हो रही है।
सवाल यह नहीं कि यह नन्हे जीव कितनी देर तक खुद को बदल पाएंगे, बल्कि यह है कि क्या हम पृथ्वी को इतना बदलने से रोक पाएंगे कि उन्हें बार-बार बदलने की जरूरत ही न पड़े। फोटो: आईस्टॉक
सवाल यह नहीं कि यह नन्हे जीव कितनी देर तक खुद को बदल पाएंगे, बल्कि यह है कि क्या हम पृथ्वी को इतना बदलने से रोक पाएंगे कि उन्हें बार-बार बदलने की जरूरत ही न पड़े। फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु परिवर्तन उस खतरनाक मोड़ पर पहुंच रहा है, जहां प्रकृति की करोड़ों वर्षों में विकसित हुई अनुकूलन क्षमता भी जवाब देने लगी है।

  • एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बढ़ते तापमान के असर से मेंढकों के बच्चे (टैडपोल) अपने भोजन और विकास के तरीके में बड़ा बदलाव कर रहे हैं। वे मांसाहार छोड़कर पौधों और काई पर अधिक निर्भर हो रहे हैं तथा पहले से ज्यादा भोजन भी कर रहे हैं, ताकि बढ़ती गर्मी में खुद को जीवित रख सकें। लेकिन तापमान लगातार बढ़ने पर यह रणनीति भी उन्हें बचाने में नाकाम साबित हो रही है।

  • शोध के अनुसार गर्म पानी में टैडपोल बहुत तेजी से बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन उनका शरीर छोटा, कमजोर और कम जीवित रहने योग्य रह जाता है, जिससे भविष्य में उनकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होती है।

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संकट केवल मेंढकों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि तालाबों, नदियों और आर्द्रभूमियों को ठंडा और सुरक्षित नहीं रखा गया तथा वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी नहीं थमी, तो प्रकृति की सबसे पुरानी और भरोसेमंद अनुकूलन रणनीति भी जीवन बचाने के लिए पर्याप्त नहीं रह जाएगी।

कहते हैं, प्रकृति हर जीव को बदलती परिस्थितियों में जिन्दा रहना सिखा देती है, लेकिन बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार अब इस सीख से भी तेज होती जा रही है। यही वजह है कि जीवों को अपने जीने के तौर-तरीकों के साथ-साथ खान-पान में भी बदलाव करना पड़ रहा है। लेकिन बढ़ते तापमान में यह रणनीति भी कारगर नहीं हो रही है। ऐसा ही कुछ मेंढकों के बेहद नन्हे बच्चों यानी टैडपोल में भी देखा गया।

एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि बढ़ती गर्मी का सामना करने के लिए मेंढकों के बच्चे अपनी सदियों पुरानी आदतें बदलने को मजबूर हो चुके हैं।

इसी जद्दोजहद में वे पौधों पर आधारित आहार पर अधिक निर्भर होने लगे हैं, साथ ही पहले से अधिक भोजन भी कर रहे हैं। हालांकि यह बदलाव भी उन्हें सीमित राहत ही दे पा रहा है। मतलब कि तापमान के लगातार बढ़ने पर प्रकृति की यह अनुकूलन क्षमता भी उनकी रक्षा नहीं कर पा रही।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह संकेत केवल इन नन्हे उभयचरों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी चेतावनी है। क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के नेतृत्व में दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा किए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित हुए हैं।

जिंदा रहने की जद्दोजहद में बदलना पड़ा भोजन

जैसा कि आप जानते हैं कि मेंढक जैसे ठंडे रक्त वाले जीव अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। इसके लिए वे पूरी तरह अपने आसपास के वातावरण पर निर्भर होते हैं। ऐसे में जब नदियां, तालाब गर्म होने लगते हैं, तो उनके शरीर के अंदर की मशीनरी भी बुरी तरह प्रभावित होती है।

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सवाल यह नहीं कि यह नन्हे जीव कितनी देर तक खुद को बदल पाएंगे, बल्कि यह है कि क्या हम पृथ्वी को इतना बदलने से रोक पाएंगे कि उन्हें बार-बार बदलने की जरूरत ही न पड़े। फोटो: आईस्टॉक

इसे गहराई से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पुर्तगाल के आइबेरियन स्पाइंड टोड के बच्चों का अध्ययन किया। इस दौरान वैज्ञानिकों ने उन्हें अलग-अलग तापमान और भोजन संबंधी परिस्थितियों में पाला, ताकि यह समझा जा सके कि बढ़ती गर्मी उनके विकास और भोजन की आदतों को कैसे प्रभावित करती है।

रिसर्च में पाया गया कि जब पानी का तापमान बढ़ता है, तो मेंढक के बच्चे (टैडपोल) अपनी भूख मिटाने के लिए पेड़-पौधे और काई ज्यादा खाने लगते हैं।

इस बारे में अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता और यूनिवर्सिटी ऑफ लिस्बन से जुड़ी डॉक्टर सारा बेंटो का कहना है, "कम तापमान पर ये बच्चे दूसरे छोटे जीवों (मांसाहार) को खाना पसंद करते हैं।

लेकिन जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वे ज्यादा से ज्यादा पौधे खाने लगते हैं और अपनी खुराक बढ़ा देते हैं। यह बदलती परिस्थितियों का सामना करने की उनकी अपनी तरकीब है, लेकिन बदकिस्मती से तापमान के लगातार बढ़ने के साथ यह रणनीति धीरे-धीरे कम प्रभावी होती जाती है।"

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सवाल यह नहीं कि यह नन्हे जीव कितनी देर तक खुद को बदल पाएंगे, बल्कि यह है कि क्या हम पृथ्वी को इतना बदलने से रोक पाएंगे कि उन्हें बार-बार बदलने की जरूरत ही न पड़े। फोटो: आईस्टॉक

समय से पहले बड़े होने की भारी कीमत

रिसर्च में यह भी खुलासा हुआ है कि बढ़ते तापमान ने इन नन्हें जीवों के जीवन-चक्र को अप्राकृतिक रूप से तेज कर दिया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक 12 डिग्री सेल्सियस तापमान में टैडपोल को बड़ा होने में करीब 177 दिन लगते हैं। लेकिन वहीं 20 डिग्री सेल्सियस में यही प्रक्रिया महज 30 दिनों में सिमट जाती है।

लेकिन यह 'तेज विकास' उनके लिए वरदान नहीं, अभिशाप साबित हो रहा है। जो टैडपोल गर्म पानी में जल्दी बड़े हुए, वे आकार में बहुत छोटे और शारीरिक रूप से कमजोर रह गए। कम उम्र में तेजी से बड़ा होना उनके शरीर को भीतर से तोड़ रहा है, जिससे उनके वयस्क होने पर जीवित रहने की संभावना बेहद कम हो जाती है। साथ ही इससे उनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है।

सिर्फ मेंढक नहीं, खतरे में पूरा इकोसिस्टम

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि बढ़ता तापमान उभयचरों के शरीर में पोषक तत्वों की संरचना को बदल देता है। यानी जलवायु परिवर्तन केवल उनके बढ़ने की गति ही नहीं, बल्कि शरीर में ऊर्जा और पोषण को जमा करने के तरीके को भी प्रभावित कर रहा है।

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वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके प्रभाव केवल उभयचरों तक सीमित नहीं रहेंगे। जब एक जीव का भोजन या शारीरिक बनावट में बदलाव आता है, तो उन पर निर्भर अन्य जीवों और पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भूमध्यसागरीय क्षेत्रों सहित दुनिया के कई हिस्सों में आने वाले दशकों में तापमान के और बढ़ने की आशंका है। ऐसे में यदि हमें इन मासूम जीवों को बचाना है, तो तालाबों, नदियों, आर्द्रभूमियों और नमी वाले इलाकों में 'ठंडे कोनों' यानी छायादार और ठंडे पानी के स्रोतों को बचाना होगा।

अगर हम अपने जल निकायों को यूं ही गर्म और प्रदूषित होने देंगे, तो शायद प्रकृति के ये छोटे सिपाही, अनुकूलन की जंग में हमेशा के लिए हार जाएंगें।

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देखा जाए तो प्रकृति लाखों वर्षों से जीवों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढालती रही है, लेकिन इंसानों की वजह से बढ़ता तापमान अब उस क्षमता की भी परीक्षा ले रहा है।

सवाल यह नहीं कि यह नन्हे जीव कितनी देर तक खुद को बदल पाएंगे, बल्कि यह है कि क्या हम पृथ्वी को इतना बदलने से रोक पाएंगे कि उन्हें बार-बार बदलने की जरूरत ही न पड़े। यह स्पष्ट संकेत है कि यदि तापमान बढ़ने की रफ्तार नहीं थमी, तो प्रकृति की सबसे पुरानी 'अनुकूलन रणनीति' भी जीवन बचाने के लिए पर्याप्त नहीं रह जाएगी।

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