ग्रीनलैंड की बर्फ से निकल रही है मीथेन, जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ी चिंता

ग्रीनलैंड की बर्फ से पुरानी मीथेन गैस निकलने का खुलासा, वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन और भविष्य में बढ़ते खतरे की चेतावनी दी
ग्रीनलैंड की बर्फ से पिघलते पानी में हजारों साल पुरानी मीथेन गैस मिलने से जलवायु संवेदनशीलता का बड़ा संकेत मिला।
ग्रीनलैंड की बर्फ से पिघलते पानी में हजारों साल पुरानी मीथेन गैस मिलने से जलवायु संवेदनशीलता का बड़ा संकेत मिला।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • ग्रीनलैंड की बर्फ से पिघलते पानी में हजारों साल पुरानी मीथेन गैस मिलने से जलवायु संवेदनशीलता का बड़ा संकेत मिला।

  • वैज्ञानिकों ने 2000 किलोमीटर क्षेत्र में नमूने लेकर पाया कि मीथेन माइक्रोब्स द्वारा गहरे बर्फ के नीचे बनी थी।

  • अध्ययन से पता चला कि ग्रीनलैंड पहले गर्म दौर में काफी अंदर तक सिकुड़ चुका था, वर्तमान स्तरों के समान।

  • मीथेन अभी वैश्विक स्तर पर कम है, लेकिन तेजी से बर्फ पिघलने पर भविष्य में उत्सर्जन बढ़ सकता है।

  • शोधकर्ताओं ने चेताया कि अंटार्कटिक बर्फ में भी बड़ा कार्बन भंडार है, जिससे भविष्य में और अधिक मीथेन निकल सकती है।

एक नई अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक स्टडी में यह सामने आया है कि ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर से मीथेन गैस का बड़ा और पुराना स्रोत जुड़ा हुआ हो सकता है। यह शोध एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक टीम ने किया है, जिसका नेतृत्व चेक गणराज्य की चार्ल्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किया। यह अध्ययन प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुआ है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पहली बार है जब पूरी ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर के किनारों पर एक साथ इस तरह का अध्ययन किया गया है।

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मिलकर जुटाए गए नमूने और जांच का तरीका

शोधकर्ताओं ने ग्रीनलैंड के पश्चिमी हिस्से में लगभग 2000 किलोमीटर लंबे बर्फीले क्षेत्र के किनारों से पिघले हुए पानी के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों में घुली हुई मीथेन गैस का अध्ययन किया गया।

वैज्ञानिकों ने विशेष तकनीकों जैसे स्थिर आइसोटोप विश्लेषण और रेडियोकार्बन डेटिंग का इस्तेमाल किया। इससे यह पता चला कि जो मीथेन निकल रही है, वह बहुत पुरानी है जो लगभग 1500 से 4500 साल पुरानी।

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मीथेन कैसे बनी और कहां से आई

अध्ययन के अनुसार, यह मीथेन जीवित सूक्ष्म जीवों, यानी माइक्रोब्स, द्वारा बनाई गई है। इन सूक्ष्म जीवों को मीथेनोजेनिक आर्किया कहा जाता है। ये जीव बिना ऑक्सीजन वाले वातावरण में पुराने कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर मीथेन बनाते हैं।

इसका मतलब यह है कि जब हजारों साल पहले ग्रीनलैंड की बर्फ पीछे हट गई थी, तब वहां जमीन पर पौधे और अन्य जैविक पदार्थ जमा हुए थे। बाद में जब ठंड फिर बढ़ी, तो वह क्षेत्र दोबारा बर्फ से ढक गया और वह कार्बनिक पदार्थ बर्फ के नीचे दब गया। अब जब बर्फ पिघल रही है, तो वही पुरानी गैस फिर से बाहर आ रही है।

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ग्रीनलैंड की बर्फ का अतीत और बदलाव

वैज्ञानिकों का मानना है कि आज की तुलना में ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर पहले एक समय में काफी अंदर तक सिकुड़ गई थी। यह घटना लगभग 9000 से 4000 साल पहले हुई थी, जब पृथ्वी पर एक गर्म जलवायु अवधि थी।

इससे यह संकेत मिलता है कि ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर जलवायु बदलाव के प्रति पहले से कहीं ज्यादा संवेदनशील हो सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह एक “गतिशील बर्फ प्रणाली” है, जो तापमान बढ़ने पर तेजी से बदल सकती है।

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जलवायु परिवर्तन के लिए खतरे के संकेत

इस अध्ययन के अनुसार, अभी ग्रीनलैंड से निकलने वाली मीथेन की मात्रा बहुत कम है और इसका वैश्विक स्तर पर ज्यादा असर नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले समय में स्थिति बदल सकती है।

अगर बर्फ तेजी से पिघलती रही, तो जमीन के नीचे का अधिक हिस्सा खुल जाएगा। वहां मौजूद कार्बनिक पदार्थ सक्रिय हो सकते हैं और मीथेन गैस का उत्सर्जन बढ़ सकता है। मीथेन एक बहुत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड से भी ज्यादा तेजी से गर्मी बढ़ाती है।

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भविष्य में के लिए खतरा

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रक्रिया सिर्फ ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं रह सकती। यह संभावना भी है कि इसी तरह की स्थिति अंटार्कटिक की बर्फ की चादर में भी बन सकती है, जहां जमीन के नीचे कार्बनिक पदार्थों का भंडार और भी अधिक है।

इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे दुनिया गर्म हो रही है, बर्फ पिघलने से न सिर्फ समुद्र का स्तर बढ़ेगा, बल्कि कुछ नई गैसों का उत्सर्जन भी हो सकता है, जो और अधिक गर्मी बढ़ाएगा।

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वैज्ञानिकों की चेतावनी और निष्कर्ष

शोध में शामिल वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज दिखाती है कि ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील है। अगर ग्लोबल वार्मिंग जारी रही, तो इसका असर केवल समुद्र के स्तर पर ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल की गैसों पर भी पड़ेगा।

हालांकि अभी यह एक छोटा स्रोत है, लेकिन भविष्य में यह एक बड़ा जलवायु फीडबैक सिस्टम बन सकता है। वैज्ञानिकों ने इसे एक गंभीर चेतावनी संकेत बताया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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