

2019 से 2024 तक वायुमंडलीय मीथेन 0.7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी, 2021 में बड़ा उछाल देखा गया।
हार्वर्ड अध्ययन ने ट्रोपोमी और गोसैट उपग्रह के आंकड़ों को मिलाकर मीथेन माप की सटीकता और वैश्विक कवरेज बढ़ाया।
मीथेन वृद्धि का 59 प्रतिशत हिस्सा पुराने उत्सर्जन प्रभाव, 25 प्रतिशत नए उत्सर्जन और 16 प्रतिशत ओएच के बदलाव से आया।
2021 में मीथेन उछाल का मुख्य कारण पशुपालन उत्सर्जन था, साथ ही कचरा और प्राकृतिक आर्द्रभूमि भी जिम्मेदार रहे।
2022 से 2024 में मीथेन वृद्धि धीमी हुई क्योंकि वायुमंडलीय ओएच स्तर सुधरे, जिससे मीथेन हटने की प्रक्रिया तेज हुई।
मीथेन (सीएच 4) एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस है जो धरती को गर्म करने में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) से भी बहुत अधिक शक्तिशाली मानी जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, 20 साल की अवधि में मीथेन का प्रभाव सीओ2 से लगभग 80 गुना ज्यादा हो सकता है। इसी कारण मीथेन उत्सर्जन को कम करना जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए बहुत जरूरी माना जाता है। कॉप 26 सम्मेलन (नवंबर 2021) में “वैश्विक मीथेन संकल्प” शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य 2030 तक मानवजनित मीथेन उत्सर्जन को 30 फीसदी तक कम करना है।
मीथेन को मापना क्यों जरूरी है
मीथेन कहां से और कितनी मात्रा में निकल रही है, यह समझना बहुत जरूरी है ताकि उत्सर्जन को कम करने के प्रयास सही दिशा में किए जा सकें। इसके लिए वैज्ञानिक उपग्रहों का उपयोग करते हैं।
दो प्रमुख उपग्रह हैं - ट्रोपोमी और गोसैट
ट्रोपोमी उपग्रह हर दिन लगभग पूरी दुनिया के आंकड़े देता है और बहुत विस्तृत जानकारी दिखाता है। लेकिन इसमें कभी-कभी गलत संकेत और क्षेत्रीय गड़बड़ियां आ जाती हैं। दूसरी ओर गोसैट उपग्रह बहुत सटीक माप देता है, लेकिन यह कम जगहों और कम समय पर आंकड़े इकट्ठा करता है।
हाल ही में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इन दोनों उपग्रहों के आंकड़ों को मिलाकर एक नई तकनीक विकसित की है। इससे मीथेन के स्तर को अधिक सटीक और पूरी दुनिया के लिए बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
हाइड्रॉक्सिल रेडिकल और मीथेन का प्राकृतिक खत्म होना
मीथेन सिर्फ उत्सर्जन से नहीं बढ़ती, बल्कि यह भी जरूरी है कि वातावरण उसे कितनी जल्दी खत्म करता है। इस काम में एक बहुत महत्वपूर्ण रसायन भूमिका निभाता है जिसे हाइड्रॉक्सिल रेडिकल (ओएच) कहा जाता है।
यह एक बहुत ही सक्रिय और अस्थिर अणु होता है जो वायुमंडल में मीथेन को तोड़ देता है। इसे मीथेन का “प्राकृतिक सफाई तंत्र” कहा जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लगभग 90 फीसदी मीथेन इसी प्रक्रिया से खत्म होती है। यदि ओएच की मात्रा कम हो जाए, तो मीथेन लंबे समय तक वातावरण में बनी रहती है और उसका स्तर बढ़ जाता है।
2019 से 2024 तक मीथेन में वृद्धि
2019 से 2024 के बीच दुनिया में मीथेन की मात्रा लगातार बढ़ती रही। औसतन यह वृद्धि लगभग 0.7 फीसदी प्रति वर्ष थी। इस दौरान 2021 में एक बड़ा और अचानक उछाल देखा गया।
वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि यह वृद्धि क्यों हुई। हार्वर्ड के शोधकर्ताओं ने उपग्रह डेटा और कंप्यूटर मॉडल का उपयोग करके पाया कि इस वृद्धि के पीछे कई कारण थे।
लगभग 59 फीसदी वृद्धि पुराने उत्सर्जन के प्रभाव का परिणाम थी, जो वातावरण में धीरे-धीरे दिख रहा था। लगभग 25 फीसदी हिस्सा वास्तव में नए उत्सर्जन बढ़ने से आया। इसके अलावा लगभग 16 फीसदी योगदान इस बात से जुड़ा था कि उस समय वायुमंडल में मीथेन को खत्म करने वाली ओएच प्रक्रिया थोड़ी कमजोर हो गई थी।
2021 का मीथेन उछाल
साल 2021 में मीथेन में जो तेज वृद्धि हुई, उसके पीछे मुख्य रूप से पशुपालन से उत्सर्जन बढ़ना था। इसके अलावा कचरा और वेटलैंड्स भी कुछ हद तक जिम्मेदार थे।
इस समय वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि यह वृद्धि मुख्य रूप से जैविक स्रोतों से जुड़ी थी, यानी यह प्राकृतिक और कृषि गतिविधियों से अधिक संबंधित थी, न कि केवल तेल और गैस उद्योग से।
2022 के बाद बदलाव
2022 से 2024 के बीच मीथेन की वृद्धि दर धीमी हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि वातावरण में मौजूद ओएच रेडिकल की मात्रा फिर से बेहतर हो गई, जिससे मीथेन को खत्म करने की क्षमता बढ़ गई। हालांकि उत्सर्जन पूरी तरह कम नहीं हुए। कुछ क्षेत्रों में जैसे तेल और गैस तथा धान की खेती में कमी आई, लेकिन पशुपालन और कचरे से उत्सर्जन बढ़ता रहा।
यह अध्ययन बताता है कि मीथेन का स्तर सिर्फ मानवजनित गतिविधियों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि वायुमंडल की रासायनिक प्रक्रिया भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। यदि हम मीथेन उत्सर्जन को नियंत्रित करना चाहते हैं, तो हमें ऊर्जा, कृषि और कचरा प्रबंधन के साथ-साथ वातावरण में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं को भी समझना होगा।
मीथेन को कम करना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है, और इसके लिए वैश्विक सहयोग बहुत जरूरी है।