जलवायु संकट से हटता मीडिया का फोकस, 2025 में खबरों में दर्ज 14 फीसदी की गिरावट

2025 में जलवायु परिवर्तन की वैश्विक कवरेज में 14 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, यह लगातार चौथा साल है जब इसमें गिरावट दर्ज की गई है। हैरानी की बात यह है कि यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब दुनिया बढ़ते तापमान और चरम मौसमी आपदाओं से जूझ रही है
फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • जब धरती रिकॉर्ड गर्मी, बढ़ते उत्सर्जन और चरम आपदाओं से जूझ रही है, उसी समय जलवायु संकट पर मीडिया की नजर कमजोर पड़ती जा रही है। 2025 में वैश्विक कवरेज में 14 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई, लगातार चौथे साल यह रुझान जारी रहा।

  • विशेषज्ञों के मुताबिक, न्यूजरूम में कटौती, राजनीतिक दबाव और “जलवायु थकान” जैसे कारण इस गिरावट के पीछे हैं। इसका सीधा असर लोगों की समझ पर पड़ता है, क्योंकि ज्यादातर लोग मीडिया के जरिए ही इस संकट को समझते हैं।

  • ऐसे में बढ़ता खतरा और घटती खबरें मिलकर एक खतरनाक खामोशी पैदा कर रही हैं, जहां संकट गहराता जा रहा है, लेकिन उसकी चेतावनी की आवाज धीमी पड़ती जा रही है।

धरती पर बढ़ता तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं, समुद्र का स्तर ऊंचा हो रहा है चरम मौसमी घटनाओं का कहर जारी है, जिसका असर खेती-किसानी से लेकर लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या पर साफ दिखने लगा है। इसके बावजूद, जिस समय इस मुद्दे पर सबसे अधिक ध्यान देने और चर्चा करने की जरूरत है, उस समय वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खबरों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

देखा जाए तो जलवायु से जुड़ा खतरा बढ़ रहा है, लेकिन खबरों में इसकी मौजूदगी कम होती जा रही है, जो इसे और गंभीर बना देती है।

इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो की मीडिया एंड क्लाइमेट चेंज ऑब्जर्वेटरी द्वारा किए ताजा विश्लेषण से खुलासा हुआ है, वैश्विक स्तर पर 2025 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खबरों में लगातार चौथे साल गिरावट दर्ज की गई। बता दें कि यह ऑब्जर्वेटरी वैश्विक समाचार स्रोतों में जलवायु से जुड़े मुद्दे की कवरेज पर नजर रखती है।

हैरानी की बात है कि 2024 की तुलना में इस विषय पर कवरेज 14 फीसदी और 2021 के उच्चतम स्तर से 38 फीसदी तक घट चुकी है। दरअसल, 2025 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खबरों का स्तर पिछले 22 वर्षों में महज 10वें स्थान पर रहा।

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रिपोर्ट के मुताबिक यह गिरावट सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, अफ्रीका, मध्य पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका हर जगह जलवायु खबरों की जगह सिकुड़ती जा रही है। इस बारे में रिपोर्ट के प्रमुख लेखक मैक्स बॉयकॉफ का कहना है कि आर्थिक दबाव, न्यूजरूम में कटौती और मीडिया संस्थानों के एकीकरण ने इस गिरावट को बढ़ाया है।

उनका कहना है, जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ विज्ञान का मुद्दा नहीं रहा, यह राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा एक बड़ा और संवेदनशील विषय बन चुका है। इसके बावजूद खबरों की सीमित जगह में राजनीति और अन्य मुद्दे हावी हो रहे हैं, जिससे जलवायु जैसे दीर्घकालिक संकट पीछे छूट रहे हैं।

क्यों घट रही कवरेज?

रिपोर्ट बताती है जलवायु संकट पर घटती कवरेज के पीछे कई वजहें हैं। मीडिया संस्थानों में हो रही कटौती और संसाधनों की कमी ने रिपोर्टिंग को प्रभावित किया है। इसके साथ ही राजनीति और अन्य बड़ी खबरों के दबाव में जलवायु जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पाठकों में “जलवायु थकान” बढ़ रही है, यानी एक ही तरह की खबरें बार-बार सुनने से लोगों की रुचि कम हो रही है। इसके अलावा, जलवायु विज्ञान के बढ़ते राजनीतिकरण के कारण भी कई बार पत्रकार इस विषय को कवर करने में हिचकिचाते हैं।

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क्या होगा इसका असर?

विशेषज्ञों के मुताबिक, लोग आमतौर पर वैज्ञानिक शोध पत्र नहीं पढ़ते, वे टीवी, अखबार और सोशल मीडिया से ही समझ बनाते हैं। ऐसे में जब मीडिया जलवायु संकट को पर्याप्त और सही तरीके से नहीं दिखाता तो लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि यह संकट उनके रोजमर्रा के जीवन, आजीविका और भविष्य पर कितना गहरा असर डाल रहा है।

देखा जाए तो इधर, खबरों की दुनिया में सन्नाटा है, उधर वास्तविकता और भयावह हो रही है। पिछले चार वर्षों में जीवाश्म ईंधन से होता उत्सर्जन लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। बीते तीन साल इतिहास के सबसे गर्म साल रहे हैं, औद्योगिक काल से पहले की तुलना में तापमान करीब डेढ़ डिग्री सेल्सियस अधिक हो चुका है।

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वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर तापमान डेढ़ डिग्री से आगे बढ़ता है, तो धरती खतरनाक ‘टिपिंग पॉइंट्स’ की ओर बढ़ सकती है, जो इस संकट को और तेज कर देंगे।

ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अब वैज्ञानिकों को पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर लोगों तक पहुंचने के नए रास्ते तलाशने होंगे। सिर्फ शोध पत्रों और तकनीकी भाषा से बात नहीं बनेगी, बल्कि वीडियो, थिएटर, कहानियों और कला जैसे माध्यमों के जरिए संवाद करना होगा। सरल, भावनात्मक और जुड़ाव पैदा करने वाली भाषा का इस्तेमाल करना जरूरी होगा, ताकि लोग इस संकट को महसूस कर सकें।

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यहां तक कि हास्य और कॉमेडी जैसे तरीकों का सहारा लेकर भी इस गंभीर मुद्दे को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ये नए तरीके न सिर्फ लोगों को इस विषय से जोड़ेंगे, बल्कि उनकी समझ बढ़ाने और बढ़ती निराशा के बीच उम्मीद जगाने में भी मदद करेंगे।

आज हालात ऐसे हैं कि एक तरफ जलवायु संकट तेजी से गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी मौजूदगी खबरों में सिकुड़ती जा रही है। यह विरोधाभास ही इस दौर की सबसे बड़ी चिंता है। क्योंकि जब सच दिखना बंद हो जाता है, तो उस पर कार्रवाई की उम्मीद भी कमजोर पड़ जाती है। जलवायु संकट पर घटती कवरेज दरअसल उस चेतावनी की आवाज को धीमा कर रही है, जिसे सुनना आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

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