जलवायु संकट से जंग: लद्दाख में पर्यावरण बचाने की बड़ी पहल

एनजीटी में दायर जवाब में कहा गया है कि लद्दाख में जलवायु संकट से निपटने के लिए भूजल संरक्षण, ग्लेशियर निगरानी, टिकाऊ पर्यटन और ऑर्गेनिक कृषि पर एक साथ काम किया जा रहा है।
फोटो: आईस्टॉक
फोटो: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • लद्दाख में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए प्रशासन ने जल, जमीन, ग्लेशियर, पर्यटन और कृषि—हर क्षेत्र में व्यापक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

  • भूजल दोहन पर सख्ती, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की निगरानी, जल संरक्षण ढांचे का निर्माण, टिकाऊ पर्यटन नीति और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा जैसे उपायों के जरिए लद्दाख को जलवायु अनुकूल और पर्यावरण सुरक्षित बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ते पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए लद्दाख प्रशासन ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 24 मार्च 2026 को लद्दाख के वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे (कंप्लायंस एफिडेविट) में यह जानकारी दी गई है।

यह रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा दिए निर्देशों पर तैयार की गई है। गौरतलब है कि अक्टूबर, 2025 में करंट साइंस में छपे एक लेख पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने यह निर्देश दिया था।

करंट साइंस के इस आर्टिकल में जलवायु परिवर्तन के कारण लद्दाख में पैदा हो रही पर्यावरणीय समस्याओं को उजागर किया गया था। इसमें लद्दाख में जलवायु संकट से निपटने के लिए भोजन, भूमि और जल प्रणाली में बदलाव की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

लेह में भूजल दोहन पर सख्त रोक

रिपोर्ट के मुताबिक, पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग (पीएचई) और सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण (आईएंडएफसी) विभाग की जानकारी के आधार पर लेह जिले में भूजल दोहन की समस्या से निपटने के लिए ठोस और सख्त कदम उठाए जा चुके हैं। ये कदम पर्यावरण संरक्षण और सतत जल प्रबंधन के लक्ष्य को ध्यान में रखकर उठाए गए हैं।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट से जूझते लद्दाख पर केंद्र की रिपोर्ट, जैविक कृषि को बनाया हथियार
फोटो: आईस्टॉक

23 दिसंबर 2024 के आदेश के तहत लेह जिले के चिन्हित अर्ध-संकटग्रस्त क्षेत्रों में नए बोरवेल खोदने और भूजल के अतिरिक्त दोहन पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी गई है। इन क्षेत्रों में अब बिना लेह के डिप्टी कमिश्नर और जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बोरवेल खोदने या भूजल दोहन की अनुमति नहीं होगी।

हिमनदों (ग्लेशियर) की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इसके लिए ‘जियो-स्पेशियल लद्दाख’ नामक एक बड़ा प्रोजेक्ट इसरो को सौंपा गया था, जो अब पूरा हो चुका है।

ग्लेशियल झीलों के खतरे के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम

जल संरक्षण के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर काम हुआ है। इन कामों में पारंपरिक पानी की जगहों को ठीक करना, बाढ़ कंट्रोल और बचाव के लिए बांध बनाना, और पानी बचाने के इंफ्रास्ट्रक्चर को मज़बूत करने के लिए दूसरे जुड़े हुए स्ट्रक्चर शामिल हैं।

ग्रामीण विकास विभाग ने मनरेगा सहित एसएसपी, एसडीपी और डिस्ट्रिक्ट कैपेक्स बजट जैसी विभिन्न योजनाओं के तहत 811 जल संचयन और जल संरक्षण ढांचे बनाए हैं। इसके अलावा इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत 42 जल टैंक, तालाब, सिंचाई नहरें, चेक डैम और अन्य संरचनाएं बनाई गई हैं, ताकि जल संरक्षण और भूजल को बढ़ाया जा सके।

लद्दाख में ग्लेशियर पिघलने और उससे बढ़ रहे जल संकट की समस्या को देखते हुए लेह नगर समिति ने पीएचई एवं आईएंडएफसी विभाग और अन्य संबंधित विभागों के साथ मिलकर शहरी जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं।

यह भी पढ़ें
लद्दाख: प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक धरोहर के बीच संघर्ष की कहानी
फोटो: आईस्टॉक

लेह नगर समिति, 'क्लाइमेट एक्शन प्लान’ के तहत काम कर रही है, जिसमें ग्लेशियर पिघलना, बर्फ भंडार में कमी और बढ़ते जल संकट जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने पर ध्यान दिया गया है।

भूजल को बढ़ाने और प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए लेह शहर में ‘टी-ट्रेंच’ परियोजना को अमृत योजना के तहत फिर से शुरू किया गया है। इससे भूजल को रिचार्ज करने और प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी।

लद्दाख आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियल झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए ग्लेशियल लेक अर्ली वार्निंग सिस्टम (जीईडब्ल्यूएस) स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस प्रणाली के तहत ऊंचाई वाले झील क्षेत्रों को इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर, लेह से जोड़ा जाएगा। यह प्रस्ताव राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेजा गया है।

ऑर्गेनिक कृषि की ओर बढ़ता लद्दाख

पर्यटन से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए लद्दाख पर्यटन विभाग ने 2024 में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) नीति लागू की है, जिसके तहत होटल और गेस्ट हाउस में विकेंद्रीकृत एसटीपी लगाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। नई एसटीपी प्रोत्साहन योजना 2025 का मसौदा भी तैयार कर सुझाव मांगे गए हैं। साथ ही अक्षय ऊर्जा, पर्यावरण अनुकूल होमस्टे और जिम्मेदार पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

यह भी पढ़ें
जलप्रलय 2023: शीत रेगिस्तान लद्दाख में पिछले दो दिनों में 10,000 फीसदी से अधिक हुई बारिश
फोटो: आईस्टॉक

रिपोर्ट में परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) का भी जिक्र किया है। खेती के क्षेत्र में भी लद्दाख को ऑर्गेनिक बनाने की दिशा में काम हो रहा है।

परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत 135 गांवों के 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र को ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन में लाया गया है। वहीं राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (एनएमएनएफ) के तहत 200 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती शुरू की गई है। लद्दाख को पूरी तरह ऑर्गेनिक क्षेत्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

कुल मिलाकर, लद्दाख में जल, जमीन, कृषि, पर्यटन और ऊर्जा, हर क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in