

नाइट्रोजन चक्र असंतुलित होने से फसल उत्पादन घटता है, जल प्रदूषण बढ़ता है और पर्यावरण स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
वायुमंडलीय सीओ2 वृद्धि से पौधों की वृद्धि बढ़ती है, लेकिन प्रोटीन और पौष्टिकता में कमी होती है।
उच्च तापमान मिट्टी में सूक्ष्मजीव गतिविधि तेज करता है, नाइट्रोजन हानि और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ाता है।
बदलते वर्षा पैटर्न सूखे और आर्द्र क्षेत्रों में नाइट्रोजन चक्र को जटिल और असमान बना देते हैं।
समेकित नाइट्रोजन प्रबंधन और वैश्विक नीति सहयोग से खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और जलवायु लक्ष्य सुनिश्चित किए जा सकते हैं।
आज की बदलती दुनिया में जलवायु परिवर्तन केवल पृथ्वी को गर्म कर रहा है या बारिश के पैटर्न को बदल रहा है, बल्कि यह नाइट्रोजन चक्र को भी बदल रहा है। नाइट्रोजन चक्र हमारे खेतों, जंगलों और घास के मैदानों में नाइट्रोजन के प्रवाह को नियंत्रित करता है। यह बदलाव अक्सर अदृश्य रहता है, लेकिन इसका असर हमारे भोजन, पानी और पर्यावरण पर बहुत ज्यादा पड़ता है।
नाइट्रोजन क्यों महत्वपूर्ण है
नाइट्रोजन प्रोटीन और डीएनए का एक मूलभूत घटक है। हमारे पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि प्रणाली इसके संतुलित प्रवाह पर निर्भर हैं। जब नाइट्रोजन असंतुलित हो जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। फसलें कम हो सकती हैं, नदियों में शैवाल बढ़ सकते हैं और वातावरण में अधिक ग्रीनहाउस गैसें निकल सकती हैं।
नवीनतम अध्ययन क्या बताता है
जेजियांग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 30 साल के क्षेत्रीय प्रयोगों और वैश्विक मॉडलिंग के आंकड़ों को एकत्र करके यह अध्ययन किया तथा इसे मैक्सिमम ऐकडेमिक प्रेस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इसने तीन प्रमुख जलवायु कारकों का नाइट्रोजन पर प्रभाव देखा:
वातावरण में बढ़ता सीओ2
उच्च तापमान
बदलते बारिश के पैटर्न
अध्ययन ने फसलों, जंगलों और घास के मैदानों में नाइट्रोजन की मात्रा, पौधों द्वारा उपयोग, नुकसान और लंबे समय तक भंडारण का विश्लेषण किया।
सीओ2 का दोहरा प्रभाव : अध्ययन में पाया गया कि वायुमंडलीय सीओ2 का प्रभाव मिश्रित है।
सकारात्मक असर :जंगलों और घास के मैदानों में पौधों की वृद्धि 10-27 फीसदी तक बढ़ सकती है। प्रमुख फसलों (गेहूं, धान, मक्का, सोयाबीन) में उत्पादन लगभग 21 फीसदी तक बढ़ सकता है।
नकारात्मक असर: पौधों में नाइट्रोजन का प्रतिशत घट जाता है, जिससे अनाज और पत्तियों की प्रोटीन गुणवत्ता कम हो जाती है। इसका मतलब यह है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद पौष्टिकता कम हो सकती है।
तापमान वृद्धि और असमानता
गर्मी का प्रभाव कृषि पर अधिक नकारात्मक है। मक्का जैसी फसलें उष्णकटिबंधीय और शुष्क क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। उच्च तापमान मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ाता है, जिससे नाइट्रोजन तेजी से गायब हो जाता है। नाइट्रोजन के नुकसान से अमोनिया, नाइट्रस ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड व नाइट्रेट जल और हवा में निकलते हैं।
यह हवा और जल प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जल गुणवत्ता को प्रभावित करता है। सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों में होता है, जैसे अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया।
बारिश का पैटर्न का जटिल असर
बदलती बारिश ने नाइट्रोजन चक्र को और जटिल बना दिया है। सूखे क्षेत्र: हल्की बारिश से पौधों की वृद्धि और नाइट्रोजन का उपयोग बढ़ सकता है।
आर्द्र क्षेत्र: सूखा पड़ने से उत्पादन और नाइट्रोजन हार्वेस्ट कम हो जाता है। भारी और लगातार बारिश से नाइट्रेट पानी में बह जाता है और नाइट्रोजन गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाता है। कम बारिश से मिट्टी में नाइट्रोजन फंस जाता है, लेकिन पौधों की वृद्धि कम होती है।
नजरिया और समाधान
जलवायु परिवर्तन ने नाइट्रोजन चक्र में क्षेत्रीय असमानता बढ़ा दी है। पहले से ही कमजोर खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा वाले क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। समेकित नाइट्रोजन प्रबंधन की जरूरत है, जो उर्वरक, जल प्रबंधन, जलवायु नीति और जैव विविधता को जोड़े।
उदाहरण के लिए अफ्रीका में छोटे किसानों के लिए वर्षा जल संचयन और जैविक खाद का उपयोग। उष्णकटिबंधीय जंगलों में नाइट्रोजन फिक्सिंग पेड़ लगाना। शोधकर्ता कहते हैं कि नाइट्रोजन को सिर्फ खेतों का इनपुट समझने की बजाय इसे वैश्विक साझा संसाधन के रूप में प्रबंधित करना चाहिए।
नीति और वैश्विक नजरिया
नाइट्रोजन को पेरिस समझौते और राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं में शामिल करना जरूरी है। वैश्विक सहयोग से ही हम भूख मिटा सकते हैं, साफ पानी बचा सकते हैं और ग्रीनहाउस गैसों को कम कर सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन न केवल पृथ्वी को गर्म कर रहा है, बल्कि नाइट्रोजन चक्र को भी बदल रहा है। अगर हम नाइट्रोजन का समझदारी से प्रबंधन करें, तो यह खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा और जलवायु स्थिरता का साधन बन सकता है। इसके बिना भविष्य में फसलें, पानी और पर्यावरण दोनों ही संकट में पड़ सकते हैं।