

जब जलवायु संकट गहराता है, तो सबसे पहले आंकड़े सामने आते हैं। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे उजड़े घर, बिछड़े परिवार, भूखे बच्चे और टूटती जिंदगियों की अनगिनत कहानियां छिपी होती हैं। अफ्रीका आज इसी दर्दनाक हकीकत का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की 'स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन अफ्रीका 2025' रिपोर्ट बताती है कि 2025 में बाढ़, सूखा, चक्रवात और अन्य चरम मौसमी घटनाओं ने कम से कम 1.3 करोड़ लोगों को प्रभावित किया, जबकि 3,000 से अधिक लोगों की जान चली गई।
रिपोर्ट के अनुसार, अफ्रीका वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, 90 फीसदी से अधिक ग्लेशियरों का गायब होना, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और समुद्रों के गर्म व अम्लीय होने से करोड़ों लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
एक ओर नाइजीरिया और कांगो में आई भीषण बाढ़ ने सैकड़ों लोगों की जान ली, तो दूसरी ओर पूर्वी अफ्रीका में सूखे ने 85 लाख से अधिक लोगों को संकट में डाल दिया।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि महाद्वीप के महज 40 फीसदी देशों के पास प्रभावी बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली है।
डब्ल्यूएमओ ने चेताया है कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी, जलवायु वित्त और कमजोर देशों की सहायता के लिए तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले वर्षों में मानवता के लिए और भी भयावह रूप ले सकता है।
जब भी जलवायु परिवर्तन की चर्चा होती है, अक्सर हमारी नजरें आंकड़ों पर टिक जाती हैं। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे लाखों लोगों का दर्द, उजड़े घर, बिछड़े परिवार और टूटती ज़िंदगियों की वह त्रासदी छिपी होती है, जिसे कोई संख्या पूरी तरह बयां नहीं कर सकती। ऐसा ही कुछ अफ्रीका के मामले में भी सामने आया है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ताजा रिपोर्ट, 'स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन अफ्रीका 2025', के मुताबिक 2025 में बाढ़, सूखा, तूफान जैसी चरम मौसमी घटनाओं ने पूरे अफ्रीका को इस कदर झकझोरा कि कम से कम 1.3 करोड़ लोगों का जीवन तहस-नहस हो गया।
हालात यह रहे कि इन आपदाओं के चलते 3,000 से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इन आपदाओं ने केवल लोगों की जिंदगी छीनी, बल्कि कृषि, आजीविका, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाला है।
वैश्विक औसत से तेज गर्म हो रहा है अफ्रीका
सच कहें तो अफ्रीका आज एक ऐसी जंग लड़ रहा है, जिसे भड़काने में उसकी कोई भूमिका नहीं है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अफ्रीका वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, और इसका खामियाजा वहां के आम लोगों को अपनी रोजी-रोटी और जिंदगी देकर भुगतना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अफ्रीका का तापमान अब वैश्विक औसत से भी अधिक तेजी से बढ़ रहा है। 1991 के बाद से महाद्वीप में गर्मी बढ़ने की रफ्तार पिछले किसी भी 30 वर्षीय दौर की तुलना में सबसे अधिक रही है। 2025 में अफ्रीका के जमीनी इलाकों का औसत तापमान अब तक दर्ज तीसरे से सातवें सबसे गर्म वर्ष के बीच रहा।
प्रकृति का बदला मिजाज: टूटती उम्मीदें, बिखरती जिंदगियां
रिपोर्ट में सामने आया है कि अफ़्रीका में जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह हकीकत बन चुका है। 1991 के बाद से अफ्रीका में तापमान बढ़ने की रफ्तार ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ों से लेकर समंदर तक पूरी प्रकृति का संतुलन डगमगा गया है। रिपोर्ट बताती है कि उन्नीसवीं सदी के अंत से अब तक अफ्रीका के 90 फीसदी से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो चुके हैं। एक समय बर्फ से ढका रहने वाला माउंट किलिमंजारो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
कभी बर्फ से ढकी रहने वाली माउंट किलिमंजारो की चोटियां अब अपनी पहचान खो रही हैं। 1900 में जहां इसके ग्लेशियर 11.4 वर्ग किलोमीटर में फैले थे, वे अब सिकुड़कर एक वर्ग किलोमीटर से भी कम रह गए हैं।
अफ्रीका के आसपास समुद्र भी लगातार गर्म हो रहे हैं। 2025 में समुद्री तापमान और समुद्र में जमा गर्मी 2023 और 2024 के रिकॉर्ड स्तर से थोड़ी कम रही, लेकिन पिछले एक दशक के सबसे ऊंचे स्तरों में बनी रही। इसके साथ ही समुद्रों का अम्लीकरण भी बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में अधिकांश क्षेत्रों में समुद्री सतह का पीएच स्तर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे समुद्री जैव विविधता को नुकसान हो रहा है और उन करोड़ों लोगों की आजीविका भी खतरे में पड़ रही है, जो समुद्र पर निर्भर हैं।
दूसरी ओर, अफ्रीकी तटों पर समुद्र का बढ़ता जलस्तर गांवों और शहरों को धीरे-धीरे निगल रहा है। 1999 से 2025 के बीच अफ्रीकी तटों पर समुद्र का जलस्तर वैश्विक औसत 3.6 मिलीमीटर प्रति वर्ष से अधिक गति से बढ़ा। अटलांटिक तट पर यह बढ़ोतरी लगभग 4.2 मिमी, हिंद महासागर तट पर 5.2 मिमी और लाल सागर तट पर 5.6 मिमी प्रति वर्ष दर्ज की गई।
बाढ़ और सूखे ने मचाई सबसे ज्यादा तबाही
धरती पर भी हालात कम भयावह नहीं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दर्ज चरम मौसमी घटनाओं में आधे से अधिक मामले बाढ़ के थे।
एक ओर अप्रैल और मई 2025 में नाइजीरिया और कांगो में आई विनाशकारी बाढ़ ने 360 से अधिक जिंदगियों को लील लिया, तो दूसरी ओर पूर्वी अफ्रीका में पड़े भीषण सूखे ने 85 लाख से ज्यादा लोगों को भोजन और पानी के गहरे संकट में धकेल दिया। इसी तरह 2024-25 का उष्णकटिबंधीय चक्रवात सीजन दक्षिणी हिंद महासागर में असाधारण रूप से सक्रिय रहा।
विडम्बना देखिए कि कहीं पानी जिंदगी बहा रहा है, तो कहीं उसी पानी की एक-एक बूंद के लिए लोग तरस रहे हैं। यही जलवायु परिवर्तन की सबसे दर्दनाक तस्वीर है, जहां प्रकृति का बिगड़ता संतुलन सबसे पहले इंसानों की उम्मीदें और उनका भविष्य छीन रहा है।
इस त्रासदी का सबसे दुखद पहलू यह है कि जब ये आपदाएं आती हैं, तो लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं होता। आज भी अफ्रीका के महज 40 फीसदी देशों के पास ऐसी आधुनिक चेतावनी प्रणालियां हैं, जो समय रहते लोगों को सचेत कर सकें। इसका मतलब है कि 60 फीसदी आबादी आज भी भगवान भरोसे है, जिन्हें यह भी नहीं पता होता कि अगली सुबह उनके आशियाने पर कौन सी आफत आने वाली है।
लेकिन इस घने अंधेरे के बीच उम्मीद की एक किरण भी है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अफ्रीका के स्थानीय मौसम वैज्ञानिक, आपदा प्रबंधन टीमें और स्थानीय प्रशासन एकजुट हो रहे हैं। बेहतर पूर्वानुमानों और आपसी तालमेल के जरिए वे इस संकट का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं।
डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो का इस बारे में कहना है, अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन के संकेत अब हर जगह दिखाई दे रहे हैं। बढ़ता तापमान, समुद्र का बढ़ता स्तर, विनाशकारी बाढ़ और लगातार पड़ता सूखा इस संकट की गंभीरता को साफ दिखाते हैं।
उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट केवल बढ़ते जोखिमों की तस्वीर नहीं पेश करती, बल्कि यह भी बताती है कि समय रहते चेतावनी देने वाले तंत्र, बेहतर जलवायु सेवाएं और सभी संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयास लाखों लोगों की जान और आजीविका बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
अब और देर नहीं...
देखा जाए तो यह रिपोर्ट केवल वैज्ञानिकों या संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया महज एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि पूरी मानवता के नाम एक गंभीर चेतावनी है। इसमें दर्ज हर आंकड़ा किसी उजड़े घर, किसी डूबते गांव, किसी बर्बाद खेत, किसी भूखे बच्चे और अपने भविष्य को बचाने की जद्दोजहद करते करोड़ों लोगों की कहानी कहता है।
समुद्र का बढ़ता हर मिलीमीटर जलस्तर और तापमान का बढ़ता हर एक डिग्री, इंसानी जीवन पर पड़ने वाले उस गहरे घाव की याद दिलाता है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सके।
अफ्रीका इस संकट से लड़ने की पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन यह लड़ाई किसी एक महाद्वीप की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है।
अब फैसलों को टालने का समय खत्म हो चुका है। यदि आज भी दुनिया ने उत्सर्जन घटाने, जलवायु वित्त बढ़ाने और कमजोर देशों की मदद के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट बन जाएगा।
हमें समझना होगा आखिरकार, जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत आंकड़े नहीं, इंसान चुकाते हैं।