पीएम 2.5 से ओजोन तक: किस प्रदूषक से बढ़ता है फेफड़ों का कौन-सा कैंसर

नए वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण फेफड़ों के अलग-अलग कैंसर पर अलग-अलग असर डालता है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • एक नए वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण न सिर्फ फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ाता है, बल्कि यह भी तय करता है कि कैंसर किस प्रकार का होगा।

  • अध्ययन के मुताबिक, महीन कण पीएम 2.5 फेफड़ों के सभी प्रमुख कैंसर प्रकारों का जोखिम बढ़ाते हैं। वहीं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और ओज़ोन (O₃) जैसे गैसीय प्रदूषक खासतौर पर कुछ विशेष कैंसर प्रकारों से जुड़े पाए गए।

  • शुरुआती चरण के कैंसर मरीजों में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) के संपर्क से जीवित रहने की संभावना कम देखी गई।

हर सांस के साथ शरीर में दाखिल होता प्रदूषण धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले रहा है। एक नए वैश्विक अध्ययन से सामने आया है कि वायु प्रदूषण न सिर्फ फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा रहा है, बल्कि यह भी तय कर रहा है कि कैंसर किस रूप में सामने आएगा।

बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ और अमेरिकन कैंसर सोसायटी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए इस संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि पीएम 2.5 से लेकर ओजोन और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड तक, हर प्रदूषक फेफड़ों के अलग-अलग प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल पॉल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं।

फेफड़ों का कैंसर: एक नहीं, कई रूप

फेफड़ों के कैंसर को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जाता है। सबसे आम है ‘नॉन-स्मॉल-सेल लंग कैंसर’, जिसमें एडेनोकार्सिनोमा, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा और लार्ज सेल कार्सिनोमा शामिल हैं। ये कैंसर फेफड़ों की अलग-अलग कोशिकाओं और हिस्सों को प्रभावित करते हैं और अधिकतर मामलों में यही पाए जाते हैं।

दूसरी श्रेणी है ‘स्मॉल-सेल लंग कैंसर’, जो आमतौर पर कम पाया जाता है लेकिन ज्यादा आक्रामक होने की वजह से तेजी से फैलता है। यह धूम्रपान से गहराई से जुड़ा है।

यह भी पढ़ें
धूम्रपान न करने वालों में भी बढ़ रहा है फेफड़ों का कैंसर, क्या प्रदूषण है कसूरवार
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

अब तक कई शोध यह साबित कर चुके हैं कि खुली हवा में मौजूद महीन कण, खासकर पीएम 2.5, फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकते हैं। लेकिन अलग-अलग प्रकार के कैंसर और मरीजों की जीवित रहने की संभावना पर वायु प्रदूषण का असर अब तक साफ नहीं था।

खासकर, वायु प्रदूषण का फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे मरीजों की जीवन-रक्षा पर असर कम ही अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन इसी विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।

इस नए अध्ययन में अमेरिका कैंसर प्रिवेंशन स्टडी-II से जुड़े 1.22 लाख से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया। 1992 से 2017 के दौरान प्रतिभागियों की सेहत, जीवनशैली और कैंसर से जुड़ी जानकारी हर दो साल में अपडेट की गई। इस दौरान उनके संपर्क में आए प्रदूषकों जैसे पीएम 2.5, पीएम10, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड का भी आकलन किया गया है।

विश्लेषण में समय के साथ प्रदूषण के संपर्क में बदलाव और व्यक्तिगत कारकों, जैसे धूम्रपान की आदत, को भी ध्यान में रखा गया। 1992 से 2017 के बीच 25 वर्षों में इस समूह में 4,282 लोगों में फेफड़ों का कैंसर पाया गया।    

यह भी पढ़ें
सांसों में जहर: वायु प्रदूषण से डीएनए में हो रहे घातक जेनेटिक बदलाव
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता रयान डाइवर ने अध्ययन पर प्रकाश डालते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “हमने राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता आंकड़ों को सैटेलाइट और भूमि उपयोग से जुड़ी जानकारी के साथ जोड़कर यह समझने का प्रयास किया है कि लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से किस तरह का कैंसर होता है और बीमारी के बाद मरीज की स्थिति पर इसका क्या असर पड़ता है।“

अलग प्रदूषक, अलग खतरा

अध्ययन ने पुष्टि की है कि पीएम 2.5 के संपर्क में आने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ता है। यह असर फेफड़ों के सभी प्रमुख प्रकार के कैंसरों - एडेनोकार्सिनोमा, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा और लार्ज सेल कार्सिनोमा में लगभग समान रूप से देखा गया।

इसके अलावा कुछ गैसीय प्रदूषक भी खास तरह के कैंसर से जुड़े पाए गए। उदाहरण के लिए नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ₂) का सबसे मजबूत संबंध एडेनोकार्सिनोमा से मिला, जो फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम प्रकार है। इसी तरह ओजोन (ओ₃) का संबंध लार्ज सेल कार्सिनोमा के बढ़ते खतरे से देखा गया। हालांकि, अध्ययन में धूम्रपान से गहराई से जुड़े स्मॉल-सेल कैंसर के साथ इन गैसीय प्रदूषकों का कोई स्पष्ट रिश्ता नहीं मिला।

यह भी पढ़ें
सांसों के साथ जहर: प्रदूषित हवा से महिलाओं में बढ़ रहा स्तन कैंसर का खतरा
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

कुछ मरीजों में घटती जीवन-संभावना

वहीं कैंसर होने के बाद जीवित रहने की संभावना पर प्रदूषण का असर बहुत स्पष्ट नहीं दिखा। लेकिन शुरुआती चरण के मरीजों में एक अहम संकेत सामने आया, सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂) के संपर्क में रहने वालों की जीवित रहने की दर कम पाई गई।

अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका मिशेल सी टर्नर का कहना है, "वायु प्रदूषण फेफड़ों के हर तरह के कैंसर को एक-सा प्रभावित नहीं करता। इसलिए इलाज की योजना बनाते समय स्थानीय वायु गुणवत्ता और मरीज के पर्यावरणीय संपर्क को भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।“

भारत में गंभीर है स्थिति

गौरतलब है कि भारत में भी वायु प्रदूषण की समस्या बड़ी विकट है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत की करीब-करीब 100 फीसदी आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है, जिसमें पीएम 2.5 स्तर डब्ल्यूएचओ की सीमा से कहीं ऊपर है। वहीं 63 फीसदी आबादी तो भारत के अपने राष्ट्रीय मानक (40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर) से भी अधिक प्रदूषित हवा में जी रही है।

भारत की करीब 40 फीसदी आबादी वहां के इंडो-गैंगेटिक क्षेत्र में रहती है, जिसमें बिहार, चंडीगढ़, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आते हैं। चिंता की बात है कि इन राज्यों में रहने वाले लोग प्रदूषण के चलते औसतन अपने जीवन के 7.6 साल खो रहे हैं।

यह भी पढ़ें
सांसों का आपातकाल: वायु प्रदूषण से काले फेफड़ों का पक्का सबूत
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

रिपोर्ट में बताया गया है कि “1998 से अब तक भारत में औसत वार्षिक पीएम 2.5 प्रदूषण 61.4 फीसदी बढ़ चुका है, जिससे जीवन प्रत्याशा में 2.1 वर्षों की अतिरिक्त गिरावट आई है। 2013 के बाद से वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण में हुई कुल वृद्धि का 44 फीसदी हिस्सा अकेले भारत से आया है।“

यह अध्ययन एक बार फिर चेतावनी देता है कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु से जुड़ा स्वास्थ्य संकट है। नतीजे दर्शाते हैं कि साफ हवा न सिर्फ बीमारी को रोक सकती है, बल्कि कैंसर से जूझ रहे मरीजों की जिंदगी भी बचा सकती है।

भारत में वायु गुणवत्ता से जुड़ी ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in